अमूल्य “बौद्यिक-सम्पदा” की चोरी रोकने : प्रशासन के कान में गरम तेल कैसे डालें ?

डा० राम श्रीवास्तव (frramshrivastavs@gmail.com)
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कुछ समय के लिये मेरा पोस्टिंग शासकीय महाविद्यालय बागली, जिला देवास मे प्राचार्य के पद पर हुआ था । इस दौरान “कावडियॉ की पहाडियों “ का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिये में बागली के इर्द गिर्द जंगलों में घूमता रहा । यहॉ मुझे पता चला कि बागली के घने जंगलों में वनविभाग और संबन्धित प्रशासकीय अमले की सॉठ गॉठ से वनस्पतिशास्त्र की “टेक्सोनामी” नामक विषय के जानकार लोगों की टीम चारों तरफ घूम रही थी ।यह टीम छॉट छॉटकर पेड पौधों की जडों को बटोर रही थी, पेड के तनों की छाल निकाल रही थी , इसके व्दारा कुछ पेडों के पत्ते फूल और फल भी इकठ्ठे किये जा रहे थे । उनके फोटो खींचे जा रहे थे, जीप में रखे माइक्रोस्कोप से उनका बारीकी से अध्ययन करने के लिये स्लाईडें तैय्यार हो रही थी । इन्दौर के सियागंज की तेल गली में स्थित “भरत शाह एण्ड कम्पनी “ के मार्फत यह काम कराया जा रहा था, इस कार्य में एक एन जी ओ चलाने वाले वाटर हार्वेस्टिंग के नाम से बागली में डेरा डालकर पडे बॉटनी के प्रोफेसर बैनर्जी की भूमिका भी बेहद संदेहास्पद दिख रही थी । भरत शाह एण्ड कम्पनी इन बहुमूल्य वनस्पति की सम्पदा के सेम्पल जड़ों आदि का पाऊडर बना कर किसी अज्ञात अमेरिकन ऐजन्सी को बेच रही थी । 

इस जानकारी को मैंने तुरन्त अपने गोपनीय पत्र क्रमॉक ५१४ दिनॉक ११-१०-१९९६ को कलेक्टर देवास को भेजा , साथ ही शंका जाहिर की कि यह सब काम अवेद्य तरीके से किया जारहा है, और इन चिकित्सीय उपयोग के इस क्षेत्र में पाये जाने वाली वनस्पति सम्पदा को हमारे देश से चुराकर विदेशों में स्मगलिंग करके बैंचा जा रहा है । फिर इनसे बनी दवाईयों का विदेशों मे पेटेन्ट करा लिया जावेगा, और इस प्रकार बनी हमारी अपनी दवा को हमें ही महंगे दामों मे विदेशी कम्पनियों व्दारा हमें ही बेचा जायेगा । राष्ट्र हित में प्रकरण की जॉच करके आवश्यक कार्यवाही के लिये मैंने अपनी ‘आफिसियल पोजीशन” में लिखी यह रिपोर्ट पेश कर दी ।मैंने इस गोपनीय रिपोर्ट की प्रति क्षेत्र के विधायक महोदय , श्याम होलानी जी और पुलिस अधिकारी महोदय को भी दी । मैंने अपना दायित्व एक जिम्मेदार सरकारी अधिकारी के तौर पर पूरा निभाया । पर लगता है प्रशासन के लिये यह एक अजीब किस्म का प्रकरण था , इस कारण न तो उन्होने मुझसे रिपोर्ट के संम्बंध में कोई विस्तृत जानकारी मॉगी न किसी प्रकार की जॉच की । एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे को रद्दी की टोकरी में फैंक दिया गया ।

आज जब मैंने “नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ साईन्स कम्युनिकेशन एण्ड इन्फरमेशन रिसोर्स” (NISCAIR) भारत , के अध्यक्ष डा० विनोद गुप्ता की रिपोर्ट देखी तो मुझे ज्ञात हुआ हमारे देश के ५००० साल पुरानी “इन्टेलेक्चुअल सम्पति” की जानकारी पॉच अन्तर्राय्ट्रीयभाषाओं के “डेटाबेस” में पंजीवद कर दिया गया है । जिससे दुनिया का कोई देश हमारी बौद्यिक सम्पदा का स्वंय की सम्पति के रूप में पेटेन्ट न करा

सके । 

यहॉ यह उल्लेखनीय है कि सन् १९९४ में एक अमेरिकन कम्पनी ने नीम की पत्तियों तथा निबोरी का पेटेन्ट अपने नाम करा लिया था । जबकि नीम की पत्तियों का उपयोग हजारों साल से हमारे देश में कीट नाशक के रूप में हो रहा है । इस पेटेन्ट को रद्द कराने में भारत सरकार को अमेरिकन अदालतों में १० सालों तक चक्कर काटने पडे थे । इसी प्रकार से अमेरिका में ही १९९५ में टेक्सन नामक कम्पनी ने हल्दी का पेटेन्ट “टेक्समती” के नाम से करा लिया । जबकि हल्दी एक ज्ञात ‘एण्टी आक्सीडेन्ट ‘ है और हजारों साल से भारत में ‘घाव ‘ भरने ,चोट ठीक करने आदि के रूप में उपयोग किया जाता रहा है । “अर्जुन पेड “ की छाल, जो उच्च रक्तचाप को कम करती है, हृदय की मॉस पेशियों को मजबूत करती है, क्लोरेस्टॉल नियंन्त्रित करती है , इसका भी अमेरिका में पेटेन्ट हो गया था ।” ब्राह्मी “ जड़ी बूटी का भी चिकित्सीय उपयोग करने के लिये अमेरिका में पेटेन्ट दे दिया गया था । भारत सरकार को इन पेटेन्टों को रद्द कराने मे करोडो रूपये खर्च करना पडे और सालों तक अमेरिकन अदालतों में चक्कर काटने पड़े । 

अमेरिकन पेटेन्टों के डेटाबेस का यदि आप अध्ययन करेंगे ,तो आपको पता चलेगा कि आज की तारीख में ४९८० पेड पौधे ऐसे हैं , जिनका अमेरिका में चिकित्सा के उपयोग के लिये “पेटेन्ट” स्वीकार कर लिया गया है । अब इन पौधों से रसायन निकालकर दवाई बनाने का काम सिर्फ जिसका पेटेन्ट है वही कर सकता है । भारत को भी अमेरिकन पेटेन्ट की इस अहर्ता को मानना वाध्य यानि अनिवार्य है। क्योंकि हमने अन्तर्राय्ट्रीय W T O समझौते पर हस्ताक्षर किये हैं । सबसे अचम्भे की बात यह है कि इन पेटेन्टशुदा ४९८० पौधों में से “अस्सी फी सदी “ पेड पौधे सिर्फ वही हैं जो सिर्फ भारत के हिमालय और दूसरे जंगलों मे ही पाये जाते हैं । अमेरिका में नहीं पाये जाते हैं .। अर्थात हमारे यहॉ से हमारी “बौद्यिक सम्पदा “ की खुले आम चोरी की गई है । उन पौधों से निकले रसायनों का मेडीकल उपयोग करने के लिये पेटेन्ट करा लिया गया है । हमारा प्रशासन समय रहते पूर्व सूचना मिलने के बाद भी राष्ट्र हित में इस “ इन्टेलेक्चुअल प्रोपर्टी” की रक्षा करने में पूरी तरह असफल रहा है । 

आज यह पूरी तरह से सिद्ध हो गया है कि 1742 भारतीय वृक्षों में से ९५९६ Phytochemical Extract अमेरिका मेंकर लिये गये हैं , जिनका भविष्य में उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार में होगा । यह वृक्ष सिर्फ हमारी अपनी वौध्यिक सम्पति है । अब भविष्य में हमे अपनी ही सम्पति , जिसका ज्ञान चरक शास्त्र अथर्व वेद में अंकित है , उसी ज्ञान से बनी दवाईयों को बनाने की कला अरबों रूपये खर्च करके विदेशों से खरीदना पडेगी । 

कितने दुख की बात है कि “ड्रग रेजिस्टेन्स मलेरिया” की दवाई की खोज करने वाले “डा० यूयू तू” को नोबल पुरूस्कार प्रदान किया गया है । उन्होने यह Artemisinin नामक ड्रग Antemisla annuafrom नामक भारतीय पौधे के सत्व से निकाली है । किन्तु हमारे आयुर्वेद में यही दवा kamatakenin इसी फेमिली के तीन पौधों के सत्व के मिश्रण में बनी पहिले से मौजूद है । भारत को सोने की चिडिया कहा जाता था । आज भी हम “बौद्यिक सम्पदा “के मामले में मे ‘कंचन युक्त स्वर्ण सम्पदा ‘ के धनी हैं । पर जिस तरह अंग्रेज हमारी मूर्खताओं का लाभ उठाकर सोने के लिंहासन उठाकर ले गए , आज हम अपनी अज्ञानता, नादानी और प्रशासकीय अक्षमता के कारण विदेशों के हाथ अपनी “इन्टेलेक्चुअल धरोहरों “को लुटा रहे हैं ।

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