इंटरव्यू – अनिल तिवारी ‘गुरूजी’

रंगमंच की आधारशिला “गुरूजी” का साक्षात्कार

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नमस्कार दोस्तों ! आप सभी जानते हैं कि हमारी भारतभूमि पावन देवी-देवताओं की जननी मानी गयी है | यहाँ की पावन भूमि से न जाने कितने शूरवीरों व समाजसुधारकों ने जन्म लेकर अपने सुकर्मों से देश-दुनियां को उन्नत सोच के साथ उन्नत दिशारूपी श्रेष्ठ मार्गदर्शन और सर्वहित की उन्नतमानसिकता का परिचय देकर  हमारी भारतभूमि को धन्य किया है |

          इसी कड़ी में हम नाम जोड़ना चाहेगें : ऐतिहासिक शहरों आगरा उ.प्र और ग्वालियर म.प्र के गौरव व देश के महान नाटक रत्न व बहुमुखी प्रतिभा के धनी सर्वसम्माननीय बेहतरीन शख्शियत आदरणीय श्री अनिल तिवारी जी का जो किसी परिचय के मोहताज नही जिन्हें रंगमंच के ‘गुरूजी’ होने का सम्मान प्राप्त है। 

       64 वर्षीय श्री अनिल तिवारी जी जिन्होने अविवाहित रहकर अपना सम्मूर्ण जीवन रंगमंच को सौंप दिया। वह 4 दशक से पूर्णत: रंगमंच को समर्पित है। उन्हें नाट्य जगत से 170 से ज्यादा सम्मान प्रमाणपत्रों से सम्मानित किया जा चुका है | वे सात विषयों में स्नातकोत्तर व पत्रकारिता में स्नातक उपाधि प्राप्त अद्भुद मानसिक क्षमता के धनी है|
       उन्हें 1967 से अभी तक 173 से ऊपर पूर्ण व ऐकांकी नाटकों में अभिनय व निर्देशन तथा 341 नाट्य शिवरों व 22 डाक्यूमेन्ट्री शिक्षा पर आधारित फिल्में तथा 57 अलग-अलग नगरों में समाज के हर वर्ग चाहे चंबल के बीहड़ों के ग्रामीण हों या आदिम जनजाति के बच्चे सभी के साथ सामंजस्य बिठाकर कुशल संचालन करना कोई साधारण बात नही है । इससे भी चौकाने वाली बात यह है कि अनिल तिवारी जी बिल्कुल जमीन से जुड़े मिलनसार सामाजिक सौम्य स्वभाव के सभी की मदद करने वाले सादगी पसंद व्यक्ति है। 
तो, दोस्तों! प्रस्तुत है युगपुरूष आदरणीय ‘गुरूजी’ श्री अनिल तिवारी जी से बातचीत के कुछ अंश  :

आकांक्षा =   गुरूजी सर्वप्रथम आप हमें अपने माता-पिता व जन्मस्थान के विषय में कुछ बतायें ?

गुरूजी =  मैं अपने माता-पिता के विषय में यही कहूंगा कि वो ही श्वांस वो ही जीवन वो ही मेरी शक्ति जिसने मुझे हारने कभी थकने न दिया। मेरे पिताजी स्व. श्री वी के तिवारी और माँ स्व.श्री मती शीलारानी तिवारी, जन्म स्थान आगरा उ.प्र और वर्तमान में निवास ग्वालियर म.प्र  (विगत 60 वर्षों से )

आकांक्षा =  गुरूजी आपके जीवन का कोई  सपना जो आपने देखा हो ?

गुरूजी =   मेरी बचपन से एक ही अभिलाषा थी कि थियेटर में इतना काम किया   जाये कि देश का प्रत्येक नागरिक हम सभी को शक्ल से पहिचाने और सरकार भी हमें एक सम्माननीय दृष्टि  से देखे और थियेटर की मेहनत को भी  पद्म अवार्ड से नवाजे। काम तो जीतोड़ किया पर इस राह में आकर पता चला कि यहाँ काम से ज्यादा चमचागीरी,परसन्टेज, एप्रोच का काम से ज्यादा
महत्व है। 
       मैं एक सच्चा कलाकार बस इन तीजों से हार गया और वो बनावटी कमतर लोग बहुत आगें निकल गये। 

आकांक्षा=  आज के समय में रंगमंच के भविष्य को कहाँ पाते हैं आप?

गुरूजी  =    अब ये हाल है कि जो  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) पास आउट है और  एप्रोच, पैसा व मीडिया में अच्छी पकड़ रखते हैं तो आप रंगमंच के क्षेत्र में आयें वर्ना जीवन बर्बाद कर  बैठे ।सरकार थियेटर के लिये एनएसडी पर पैसा खर्च करती है और यहाँ का विद्यार्थी फिल्मों में अपना कैरियर तलाश करता है यानि एनएसडी बेमानी हो गयी है  ।
अब तो सांस्कृतिक विभाग रंगमण्ड़लों के नाम पर करोड़ों लुटा रहा है और ये रंगमण्डल कुकुरमुत्ते के तरह उग रहे है। इधर सरकारी तंत्र में परसन्टेज का खेल चल रहा और उधर रंगमंच के नाम पर मिली ग्राण्ट को ठिकाने लगाया जा रहा। ये हाल है तो आप ही समझो रंगमंच कहाँ जा रहा। 

आकांक्षा = आप सभी के बीच गुरूजी नाम से फेमस है कोई खास कारण ?

गुरूजी =   कोई खास कारण तो नही मैं तो बस ईमानदारी से थियेटर पढ़ाता हूँ और सभी बच्चों का मेरे प्रति  सम्मान  व अपनापन है। 

आकांक्षा = आपने रंगमंच में अपना पहला कदम कब रखा ?

गुरूजी = 1967 में

आकांक्षा = आपने निर्देशन का कार्य कब से प्रारम्भ किया ?

गुरूजी =  1971 में तब मैं सिर्फ 16वर्ष का
               था। 

आकांक्षा = गुरूजी आपके मुख्य प्रेरणास्त्रोत कौन थे ?

गुरूजी = मेरे मातापिता जी और मेरे नाट्यगुरू राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एन.एस.डी) के डाईरेक्टर बी.एम शाह
थे। 

आकांक्षा = मुख्य नाटक जिनका आपने निर्देशन किया?

गुरूजी = वैटिंग फोर गोदो (सैमुअल वैकेट)
               फन्दी (डा.शंकर शेष )
                जुलूस (बादल सरकार)
                मिस्टर अभिमन्यु ( दया प्रकाश)
               सैक्रीफाइज ( रवीन्द्र नाथ टैगोर)
                कोठा (डा.निशेष )
                अंधों का हाथी ( शरद जोशी)
                पोस्टर
                अभिज्ञान शाकुन्तलम् (कालीदास)
                अमर सिंह राठौर (नत्था राम गेड)
                 नौटंकी,
                खूबसूरत बला (पारसी शैली)

आकांक्षा = गुरूजी आपकी कोई निजी संस्था भी है ?

गुरूजी =  हाँ, निर्देशन प्रारम्भ करने बाद नाट्य संस्था प्रतिशोध का गठन किया और इस संस्था से लगभग 80 पूर्णांकीय नाटकों का निर्देशन भी किया। इसके अलावा 200 से ऊपर छोटे बड़े नाटकों का निर्देशन किया और सभी के सहयोग से करीब 355 ज्यादा नाट्य शिवरों का संचालन भी किया ।

आकांक्षा = वर्तमान में क्या कार्य चल रहा है गुरूजी ?

गुरूजी = अभी वर्तमान में नाटक हानुष की रिहर्सल चल रही है। ये नाटक भीष्म साहनी द्वारा रचित है। भीष्म साहनी एक ख्याति प्राप्त लेखक होने के साथ पूर्व फिल्म अभिनेता बलराज साहनी के छोटे भाई भी थे ।

आकांक्षा =    गुरू जी आप स्वंय को किस प्रकार से परिभाषित करना चाहेगें ?           

गुरूजी =   मैं कला  सहेजने  वाला कलाकार बनाने  निकला, मैं इंसान में एक इंसान जगाने निकला , मैं रंगमंच के लिये बना, उसे पहिचान दिलाने निकला, सत्य की राह पर चला इसीलिये तन्हा सा निकला। 

आकांक्षा = रंगमंच से जुड़ रहे युवाओं को क्या संदेश देना चाहेगें ?

गुरूजी = आज के युवा रंगकर्मियों के लिये यही कहूंगा कि वैसे तो रंगमंच के फील्ड में आओ नही और यदि आओ तो सेवाभाव से तथा सरकारी ग्रान्ट की ओर मत देखो क्योंकि रंगमंच रोटी नही दे सकता।  यदि फिल्मों में जाना है तो रंगमंच की ओर मत देखो जिम जाओ पर्सनाल्टी बनाओ थियेटर में अपना समय मत गंवाओ। 

आकांक्षा = गुरूजी हम आपको सैल्यूट करते हैं और आपका सहृदय ससम्मान धन्यवाद करते हैं कि आपने इतनी व्यस्तता के बावजूद अपना कीमती समय हमें दिया।

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