टीवी-मोबाईल छीन रहे हैं बचपन – ‘प्रणामी’ सतीश

स्मार्ट फोन, कंप्यूटर और टीवी किस प्रकार  बालमन को निष्क्रिय  कर रहे हैं, उनका बचपन छीन रहे हैं, रचनात्मकता छीन रहे हैं, यहां तक कि शारीरिक और मानसिक विकास को कुंद कर रहे हैं? इसका जीता- जागता उदाहरण शिक्षा विभाग में तैनात एक शिक्षिका के सात वर्षीय बेटे में देखने को मिला।
बीआरसी पर ट्रेनिंग के दौरान एक अध्यापक ने प्यार से बेटे का सिर सहला दिया। अध्यापक का इतना करना था कि बेटे ने मोबाईल फेंक मारा, पानी की बोतल तोड़ दी, जूते-कपडे़ आदि सभी फेंक दिए और बुरी तरह चिल्लाते हुए शिक्षिका को मारने-पीटने लगा। अध्यापक महोदय सहम गए कि पता नहीं उनसे क्या गलती हो गई। किसी प्रकार शिक्षिका ने बेटे को फिर से मोबाइल थमाकर शांत किया।
बच्चे के इस प्रकार के व्यवहार पर शिक्षिका ने बताया कि “बच्चों के साथ खिलाने के बजाय मैं इसे टीवी, मोबाईल पर व्यस्त रखती थी, जिसका खामियाजा यह हुआ कि आज मानसिक और मनौवैज्ञानिक चिकित्सक को दिखाना पड़ रहा है।” मसलन अकेलेपन के शिकार के साथ-साथ बालक का मानसिक विकास भी कुंद हो गया। 
यह अकेले शिक्षिका के बेटे की समस्या नहीं बल्कि आज भारत का अधिकांश बालवृंद कुछ इसी प्रकार की समस्याओं से ग्रसित है। जिसको मोबाईल, टीवी, इंटरनेट ने अपनी गिरफ्त में काफी हद तक जकड़ा हुआ है। कहावत है कि हम सब अनुसरण द्वारा सीखते हैं। फिर बालक तो है ही अनुकरणीय, जो देखता अथवा सुनता है उसी से सीख लेता है। बालक मोबाईल-टीवी से सीख भी रहा है। क्या सीख रहा है ये आप और हम सबको मालूम ही है।
पहले दादा-दादी, नाना-नानी बच्चों को परियों की, भूतों की, राजकुमारों आदि की कहानियां सुनाया करते थे। जिसमें एक सीख होती थी, संस्कार होते थे। लेकिन मोबाईल, टीवी आदि के किसी भी प्रोग्राम में कोई सीख, कोई संस्कार न के बराबर है। यहां तक कि कई बार तो ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर पेश कर दिया जाता है, जिससे न सिर्फ बालक बल्कि बड़े-बड़े भी भ्रमित होते हैं। 
चिकित्सक कहते हैं कि “अत्यधिक मोबाईल, टीवी का प्रयोग न सिर्फ आंखों के लिए बल्कि मस्तिष्क के लिए भी घातक है। इसके अत्यधिक प्रयोग से बालक न सिर्फ चिड़चिड़े स्वभाव के हो रहे हैं अपितु मस्तिष्क से निष्क्रिय भी होते जा रहे हैं।” चिकित्सक आगे कहते हैं कि “छह वर्षों तक के बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित होता है, इसके लिए उनका रचनात्मक विकास जरूरी है।”
अपने देश के हालात यह हैं कि बालक प्रतिदिन छह घंटों से उपर मोबाईल, टीवी के साथ समय बीता रहा है। आंकड़ों पर गौर करे तो अमेरीका में बालक 3.5, फ्रांस में 3.16, जर्मन में 2.66, स्पेन में 3.03, चीन में 2, चेक गणराज्य में 2.70, स्वीडन में 3.11, पोलैंड में 2.96, इंडोनेशिया में 3.63, थाइलैंड में 3.43, तुर्की में 3.30 घंटे प्रतिदिन मोबाईल पर समय बीताते हैं। जबकि अपने देश के बालक 5.45 घंटे व्यतीत कर उपरोक्त सभी देशों में शीर्ष पर हैं।
विकसित शहरों के मां-बाप के हालात यह हैं कि वे प्रतिदिन अपने बच्चों के साथ मात्र तीन या चार मिनट ही बात कर पाते हैं। सप्ताह में मुश्किल से आधा घंटा। जबकि बालक फोन-टीवी पर प्रतिदिन औसतन छह घंटों से अधिक चिपका रहता है। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम बालक में कौन से संस्कार, कौन सी रचनात्मकता, कौन सी क्रियाशीलता का रोपण कर रहे हैं?

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