मोक्ष की नगरी काशी में ईसाइयों ने बदला अंतिम संस्कार का तरीका, लाश को जलाने के बाद कब्र में दफना रहे सिर्फ राख


वाराणसी: कोरोना महामारी ने मोक्ष की नगरी काशी में अंतिम संस्कार करने की धार्मिक परंपराओं और सदियों पुरानी रीति-रिवाजों को भी बदल दिया है। दूसरे शहरों की तरह इस जानलेवा महामारी ने वाराणसी शहर में भी कई लोगों की जान ली है। इसमें ईसाई समुदाय के भी कई लोग शामिल है। लेकिन मृतकों के परिवार वाले अब उन्हें दफन नहीं कर रहे हैं। इसके बजाय, वे गंगा के घाटों पर शवों का अंतिम संस्कार करने और अस्थियों को कब्रगाह में ले जाने की हिंदू परंपरा को अपना रहे हैं। मरने वालों को बिना ताबूत में रखे घाटों पर दाह संस्कार किया जा रहा है।

कोरोना की दूसरी लहर से डेढ़ महीने में 30 मौतें
बनारस ईसाई कब्रिस्तान बोर्ड के सचिव फादर विजय शांतिराज ने सोमवार को टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि कोरोना वायरस की दूसरी लहर की शुरुआत के बाद से, शहर में कम से कम छह शवों का अंतिम संस्कार किया गया और राख को दफनाने के लिए चौकाघाट में स्थित ईसाई कब्रिस्तान ले जाया गया। उन्होंने बताया, “वाराणसी में ईसाई आबादी 3,000 से अधिक है। आमतौर पर, समुदाय में प्रति माह एक या दो मौतें होती हैं, लेकिन पिछले 45 दिनों में जब कोविड के मामले बढ़ने लगे तो 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई। इनमें से कई मौतों के कारणों का पता नहीं चल सका है।”

फादर शांतिराज ने कहा, “जब ईसाई समुदाय में किसी की मृत्यु होती है, तो शव को दफनाने से पहले ताबूत में रखकर घर में और बाद में चर्च में प्रार्थना की जाती है। हालाँकि, आजकल, एहतियाती उपायों के रूप में हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि सुरक्षा के लिए और संक्रमण के किसी भी संभावित प्रसार को रोकने के लिए कम से कम व्यक्ति एक दूसरे के संपर्क में आए। “कुछ लोग संक्रमित हो गए और कोविड से मर गए, और उनके परिवारों ने हमसे सलाह ली क्योंकि वे शव को दफनाने के पक्ष में नहीं थे। हमने सुझाव दिया कि शवों का अंतिम संस्कार किया जा सकता है और राख को दफनाया जा सकता है।”

अब तक छह ईसाई परिवार अपने परिजनों के शवों को अस्पताल से सीधे हरिश्चंद्र घाट पर सीएनजी श्मशान ले गए और उनका अंतिम संस्कार किया। फादर शांतिराज ने कहा कि राख को इकट्ठा किया गया और प्रार्थना के बाद उस राख को दफनाया गया। उन्होंने कहा, “मुझे अपने जीवन में इससे पहले का कोई उदाहरण याद नहीं है, जब शवों का अंतिम संस्कार किया गया और राख को दफनाया गया।”

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