” लेख– सकारात्मक सोच का अभाव समाज में बढ़ते सामूहिक आत्महत्या की वज़ह”

महेश तिवारी

स्वतंत्र टिप्पणीकार

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लेखन

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हम आधुनिक हो रहें हैं। धर्म को विज्ञान चुनौती दे रहा है। हम क़सीदे भी पढ़ रहें वैज्ञानिक युग में जीने का। पर इन सब के भंवर में शायद हमारे सोचने-समझने, तर्क-वितर्क करने और आत्मचिंतन करने की प्रक्रिया को बिसार चुके हैं। पहले दिल्ली का बुराड़ी, फ़िर उसके उपरांत झारखंड का हजारीबाग और अब जाकर पुनः झारखंड राज्य के कांके थाना इलाके के रसंडे में एक ही परिवार के सात लोगों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली है। यह सामूहिक आत्महत्या की झारखंड में दूसरी हालिया घटना है। इसके पहले दिल्ली के बुराड़ी में 11 लोग एक ही परिवार के फंदे पर लटक गए थे, और हजारीबाग में छह लोग। ऐसे में एक के बाद एक सामूहिक आत्महत्या की घटनाएं समाज को स्तब्ध और हैरान कर रहीं हैं। अब झारखंड के रसंडे इलाक़े में हुई आत्महत्या को भले पहले जांच के घेरे में रखा जाएं। फ़िर निष्कर्ष पर पहुँचा जाएं, कि यह हत्या है या आत्महत्या। पर कुछ सवाल अब ऐसे ज्वलन्त उठ रहे, जिसके जवाब ढूढ़ने होंगे। अगर समाज में आश्रय लेती सामूहिक आत्महत्या की प्रवृत्ति पर लगाम लगानी है, तो।

वैसे देखें, तो हजारीबाग के मामले में भी पुलिस तंत्र ने यहीं कहा था, कि पहले शिनाख़्त होगी, फ़िर निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है, कि छह लोगों ने सामूहिक आत्महत्या की या हत्या हुई। पर हजारीबाग वाले मामले में जो तीन सुसाइड नोट्स मिलें थे। वो यह बताने के लिए काफ़ी था, कि हमारे समाज की स्थिति अब दयनीय होती जा रही। हजारीबाग आत्महत्या मामलें में जो सुसाइड नोट्स मिली थी, उसमें आत्महत्या का कारण बीमारी, कर्ज़ और दुकान बंद हो जाने जैसे थे। वैसे हमारे देश में प्रायः किसानों की आत्महत्या की खबरें सुनने को मिलती थी, पर अब सामूहिक आत्महत्या ने उसमें एक नया भयावह और डरावना अध्याय जोड़ दिया है। इतना ही नहीं ये तीन तो वर्तमान दौर में सामूहिक आत्महत्या की बड़ी घटनाएं हुई हैं, इसके अलावा ऐसी छोटी छोटी घटनाएं तो आएं दिन देश के विभिन्न कोनों में घटती रहती हैं। फ़िर वह चाहें उत्तरप्रदेश का कुशीनगर जिला हो। जहां के कुबेरस्थान थाना क्षेत्र के अंतर्गत कुछ समय पूर्व पिता और उसके दो बेटियों का शव फंदे से लटका मिला। या देश की मायानगरी मुंबई।

जो भले विकास के चकाचौंध में नहाई हो, पर सामूहिक आत्महत्या की आंच से वह भी अछूता नहीं। कुछ समय पहले की ही बात है, कि मुंबई के कफपरेड इलाक़े में एक परिवार के तीन लोगों ने आत्महत्या कर ली। वहीं बांद्रा में भी एक ही परिवार के चार लोगों ने एक साथ जान दे दी थी। अब हम अगर बात बढ़ती सामूहिक आत्महत्याओं की करेंगे। तो इसके पीछे एकाध कारण मालूम नहीं पड़ेगा। अनगिनत पहलुओं को स्पर्श करना पड़ेगा। आधुनिक होते समाज की कुंठित और रूढ़िवादी सोच का पर्दाफाश तो होगा ही। विकास और आधुनिकता का पाठ पढ़ाने वाले सियासतदां की नीतियां भी बेपर्दा होंगी। हम ज़्यादा विस्तार में न जाकर सामूहिक आत्महत्या के दो-चार मामलों को आधार बनाकर ही देखते हैं, कि आख़िर इन आत्महत्याओं के पीछे क्या कारण हो सकता है। तो पहले ज़िक्र अहमदनगर जिले के पोखरी बालेश्वर गांव की। जहां पर एक पिता ने अपनी दो नाबालिग बच्चियों का गला दबाकर हत्या करने के बाद ख़ुद भी आत्महत्या इसलिए कर लिया, क्योंकि इक्कीसवीं सदी के आधुनिक होते न्यू इंडिया के वावजूद बच्चियों का भरण-पोषण करने में वह अपने आप को अक्षम पा रहा था।

इससे इतर अगर बात बुराड़ी की करें, तो वहां पर कर्ज़ सामूहिक आत्महत्या की मर्ज नहीं, बल्कि धार्मिक अंधविश्वास का बोलबाला था। अब हम क्या कहें इस आधुनिक औऱ वैज्ञानिक होते युग को। जब दिल्ली जैसे क्षेत्र में लोग आज भी अंधविश्वास की अंधेरी रात में जीने को विवश हैं। फ़िर हम दूर-दराज के क्षेत्रों के विषय में क्या पूर्वानुमान लगाएं। कुछ क्षेत्र तो न्यू इंडिया के दौर में बिजली और शिक्षा की जद से बाहर हैं। फ़िर वहां की स्थिति क्या होगी। सहज परिकल्पना की जा सकती है। अभी तक सामूहिक आत्महत्या के दो कारण दृष्टिगत हो चुके हैं। ऐसे में अगर झारखंड के रसंडे में बीते दिनों में सात लोगों ने सामूहिक आत्महत्या की। तो उसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं। पर अगर वास्तविकता टटोली जाएं, तो इन सामूहिक आत्महत्याओं के पीछे सिर्फ़ कारण यह भी है, कि हमारा समाज भले ही चांद और मंगल तक पहुँच जाएं, सर्वोत्तम शिक्षा प्राप्त कर लें। पर उसमें सकारात्मक दृष्टिकोण और धैर्य की भावना क्षीण हो रही है।

ऐसे में हम तथ्यों का ओर अधिक गहन विश्लेषण बुराड़ी के परिवार का करें तो उस पूरे परिवार की पृष्ठभूमि में ऐस-ऐसे किरदार मिल जाएंगे। जिनके द्वारा उठाया गया सामूहिक आत्महत्या का कदम सामाजिक व्यवस्था को झकझोर कर रख देगा। इसके अलबत्ता कुछ ऐसे सवाल भी व्युत्पन्न होंगे। जिसके जवाब समाज और व्यवस्था को जल्द ढूंढने होंगे, नहीं तो का बरसे जब कृषि सुखाने की कहावत हमारे समाज के ऊपर भलीभूत होने लगेगी। अगर हम बुराड़ी में हुई सामूहिक आत्महत्या के 11 लोगों के चरित्र का डीएनए टेस्ट करें तो पहली बात यह निकलती है, कि यह घटना एक ऐसे परिवार में हुई जहां सब लोग मिलनसार और सहयोगी प्रवृत्ति के थे, आस-पड़ोस का सुख-दुख बांटने वाले थे। परिवार की एक बेटी ने विज्ञान में स्नातकोत्तर किया था, और बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रही थी। फिर, आत्महत्या को कैसे मोक्ष प्राप्ति का रास्ता मान लिया? तो यक्ष प्रश्न यहीं कि यह कोई तत्काल में लिया गया त्वरित फैसला नहीं रहा होगा। जो यह साबित करता है, हमारा समाज आज भी मानसिक रुग्णता और अंधविश्वास के कूपमण्डूक से बाहर नहीं निकल पाया है। भले ही आज शिक्षा का प्रतिशत कागज़ी होकर 75 फ़ीसद का आंकड़ा पार कर गया है। पर सोच आज भी समाज के एक अच्छे खासे तबक़े की उन्नीसवीं सदी की ही मालूम पड़ती है।

ऐसे में जिस समय को हम विज्ञान का युग कह रहे, अगर उस वक्त हम ऐसे धर्म का आभामंडल बना रहें जो लोगों की जान ले रहा। फ़िर शायद हम दिशा भटक गए हैं, क्योंकि अगर मानवता सबसे बड़ा धर्म कहा गया है। फ़िर हम अंधविश्वास का चोला ओढ़कर किस तरफ़ भागे जा रहें। यह सोचना होगा। गोपालदास नीरज जी ने एक पंक्ति कही थी, कि आदमी हूँ, मैं आदमी से प्यार करता हूँ। आज समाज में आस-पड़ोस की सम्वेदना भी खंडित हो चुकी हैं, इस कारण वश भी समाज में सामूहिक आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति बढ़ रहीं है। तो ऐसे में अगर इक्कीसवीं सदी के विज्ञान पर आधारित समाज में सामूहिक आत्महत्या पर लगाम लगाना है। तो ऐसी शिक्षा व्यवस्था पर जोर देना होगा, जो सही-गलत की पहचान करना सीखा सकें। समाज को अपने सोचने का नजरिया बदलना होगा। समाज से जो अपनापन दूर हो रहा, उसकी तारतम्यता पुनः स्थापित करनी होगी। छद्म धर्म-व्यवहार के नाम पर समाज को ठगने वालों की दुकान बंद करानी होगी। कर्मवादी व्यवस्था का ज़िक्र हमारे संस्कृति का आधार है, उस पर अमल करना होगा। ढोंगी कठमुल्लों और बाबाओं की फ़ौज से देश को आजाद करना होगा। इसके अलावा सरकार की नीतियों में पूर्णरूपेण फेरबदल होना चाहिए, क्योंकि नीतियां तो हैं। फ़िर भी समाज में एक बड़ा तबक़ा हत्या या सामूहिक आत्महत्या ग़रीबी के कारण कर बैठता है। इन सब के अलावा सकारात्मक सोच समाज के लोगों को ख़ुद विकसित करनी होगी। साथ में यह समझना होगा, कि भौतिक सुख ही सबकुछ नहीं हो सकता। ऐसे में जो लोग भौतिक सुख के अभाव में सामूहिक रूप से जीवनलीला समाप्त करने की फ़िराक में रहते हैं, वे एकबार भूटान के बारे में जरूर पढ़ लिया करें, फ़िर कुछ निर्णय लें।

 

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