व्यंग – प्रेम का अकाल


लेखक-जितेन्द्र देव पाण्डेय ‘विद्यार्थी’
jitendra.vidyarthi@gmail.com

एक दिन मेरे एक प्रगाढ़ प्रेमी-मित्र ने कहा, “साहब! कभी हमें भी समय दे दिया कीजिए; संसार में पढ़ने लिखने के अतिरिक्त भी काम होता है, किताबों के आलावा मित्र-सखा भी होते हैं| कभी उनसे भी मेल-मिलाप कर लिया करिए| आप तो बस अपने ही धुन में डूबे, किसी को कुछ समझते ही नहीं| श्रीमान्! ज़रा एक बार नज़र घुमा कर देखिये, आप जिन लोगों को छोड़ कर गये हैं वे आपसे मिलने के लिए कितने आतुर हैं| लोग आपको बहुत चाहते हैं, बहुत मोहब्बत करते हैं| आप एक बार आवाज़ देकर देखिये, लोगों का हुजूम आपके पीछे खड़ा होगा|” मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, “मैं कब से इतना वांटेड हो गया? आज तक कोई नेतागिरी टाइप का गुनाह भी तो नहीं किया. कभी बहुत बन-ठन कर, सज-सँवर कर भी नहीं निकला| हमेशा मैला-कुचैला रहा; भूतों-प्रेतों की तरह दाढ़ी बढ़ाए, किसी से प्यार भरी दो बातें भी नहीं की| सभ्य समाज में गवाँर की तरह रहा| इसीलिए प्रेमिका ने भी दुत्कार दिया| फिर भी लोग मुझसे ‘प्यार’ करते हैं? हे करुणामयीं! हे लीला बिहारी! ये क्या हो रहा है मेरे साथ? क्या लोग नीम-करेले को स्वार्थ सिद्धि के अलावा भी पसन्द करने लगे?” लोगों को विपत्ति में ईश्वर याद आते हैं, मैं इस सुख की घड़ी में ही याद कर बैठा|
मेरा कन्हैया भी एक्सपेरिमेंटल निकला| उसने कहा, “रे पगले! प्रेम करो तो जानों| वत्स! उद्धव मत बन| तुझे लगता है, तुझसे कोई प्रेम नहीं करता? तो एक बार ट्राय करने में क्या जाता है?” कन्हैया बोले जा रहा था, और मेरे पास उस समय सुनने के आलावा कोई चारा नहीं था| असल में जब आप भूल से किसी को ज्ञानी समझ पुकार कर, उससे मार्ग पूछने लगते हैं, तब वह अपने आपको महा ज्ञानी समझ लेता है; और यदि आपमें माद्दा है, तो वह आपको टीवी के किसी समाचार चैनल की तरह, एक ही बात को बार-बार दोहराकर ट्वेंटी फ़ोर इन्टू सेवन सुना सकता है| आपको आपका भविष्य सेट मैक्स के सूर्यवंशम की तरह दिखाता जायेगा| बहरहाल कृष्ण ने बोलना शुरू किया, “देख मैं तुझे अपना गूढ़ एक्सपीरियन्स बताता हूँ| जब मैं गोकुल से मथुरा चला आया था, तब यमुना में बाढ़ आ गई थी; और वह समय बारिश का भी नहीं था| इसका कारण पता है तुझे?” मैं विमूढ़-सा न में सर हिला दिया| लीला बिहारी उवाचा, “उसका कारण था, मेरे वियोग में वृन्दावन और गोकुल वासियों का महाविलाप|” उस भारी अश्रु प्रवाह के कारण, यमुना में नमकीन पानी भर गया था| उसके बाद पूरे द्वापरयुग में व्रज क्षेत्र का नमक यमुना किनारे ही बनता था| बाद में परीक्षित ने कलयुग को सब सौंप दिया, और कलयुग ने सारा नमक नष्ट कर दिया, नहीं तो आज उत्तर प्रदेश मन्दिर-मस्जिद के नाम पर लूटपाट, बलात्कार के आलावा, नमक के लिए भी प्रसिद्द होता, फिर वहाँ कथित स्वदेशी, किन्तु पूर्ण विदेशी डिज़ाइन की हाफ पैन्ट पहनने वाले केवल राम के लिए ही नहीं; नमक के लिए भी दंगा करते-कराते|” मैं आँखे फाड़े सुन रहा था|
मुरारी बोला, “तो तू भी एक बार देख ले बेटा| तुझे कितने प्रेम करने वाले हैं? तेरे पब्लिक रिलेशनशिप (पी आर) में कितना दम है?” फिर वह वह हँसते हुए बोला, “तुझे एक और गूढ़ और मज़ेदार रहस्य बताता हूँ| जब भी कोई औपचारिकता करे, “आप मेरे घर भी किसी दिन पधारें| मेरे साथ दो रूखी-सूखी रोटी पाएँ|” बस बेटा बिना समय गवाएँ पहुँच जा उनके निवास पर| प्रेम परखने का इससे सुन्दर अवसर कभी भी प्राप्त न होगा; क्योंकि एक तो वे महाशय मिलेंगे नहीं, और अगर मिल गये, तो भैया-भाभी जो भी हों, उन्हीं से बोल, “बहुत तेज भूख लगी है|” पुत्र! प्रेम की असलियत मटके में सर छुपाकर खुसफुसा-खुसफुसा कर बोलेगी, जिसे मात्र तेरी बेशर्मी ही सह पायेगी| मैंने बहुत किया है, तभी तो माखनचोर कहलाया|”
अब वह मुझे ज़ोर देकर कहने लगा, “वत्स! तू जा| अवश्य जा| देख! मैंने तो केवल दो गाँव छोड़े थे| तू तो अपना गाँव, जनपद, राजधानी, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय इतने सारे जगहों को छोड़ कर आया है| बेटा! अगर इतने सारे लोगों ने कहीं एक साथ विलाप किया, तो इस महाक्रन्दन से तो महाप्रलय समय से पहले आ जायेगा| मेरा कलकी अवतार का सपना अधूरा रह जायेगा| और तू ये भली-भाँति जानता है कि लोग मुझे इसीलिए मानते हैं, क्योंकि मैं लीलाएँ करता हूँ, और ये वाला अवतार मेरे लिए बहुत इम्पोर्टेंट है| एक्चुअली पिछले जन्म में मैंने कई गोपियों को वचन दिया है, या यूँ समझ ले डेट दिया है| उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है, तभी तो आदर्श प्रेमी बनूँगा|” मैंने पूछा, “तू तो भगवान् है, जब चाहे अवतरित हो जा, तू क्यों समय की प्रतीक्षा कर रहा है?” वह सहमते हुए बोला, “अबे पागल है क्या तू? उत्तर प्रदेश में अवतार लूँगा, वहाँ गोपियों के साथ डेट पर जाऊँगा? ओ भाई! एन्टी रोमियो स्क्वायड से पिटवाएगा क्या? अबे तू मेरा भक्त है, या दुश्मन? ऐसे कौन जानबूझकर अपने भगवान् को मौत के मुँह में धकेलता है यार? देख तू तो मेरा असली वाला भक्त है| भक्त ही नहीं तू तो अपने आपको मेरा ‘विशुद्ध, एकलौता चेला’ कहता है| मैं तेरा भगवान् होकर, तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ, मुझे एक बार फिर दुनिया में आने का मौका दे-दे| एक बार अपने सभी महाप्रेमियों से कांटेक्ट कर ले| उनसे मुलाक़ात कर ले| अगर भक्त ही भगवान् की नहीं सुनेगा तो कौन सुनेगा?”
अच्छा मैं क्या है कि कन्हैया की बात टाल नहीं पाता, अतः टिकट कन्फर्म न होने के कारण, ट्रेन में ज़ुर्माना दे-देकर अपने प्रेम-पिपासों और पिपासियों से मिलने के लिए उन सभी स्थानों पर गया जिन-जिन स्थानों को मैं छोड़ कर आया था| पहुँचने से पहले तो मैंने आधुनिक संचार साधनों के माध्यम से सबको सूचित किया| फिर पहुँचकर प्रेमभरी आवाज़ में पुकारा, हे चातकों! मैं आ गया हूँ| तुम्हारे प्रतीक्षित बंजर जैसलमेरी ज़मीन को चेरापूँजी-मोसिनराम समझकर मुसलाधार प्रेम की बारिश करूँगा| आओ! मुझसे प्रेमालाप करो| एक दिन बीता, दो दिन बीता, तीन दिन बीता मैं एक ही स्थान पर बैठा प्रेमानुयायियों की बाट जोहता रहा, परन्तु मेरे लबार प्रेमियों के काम की व्यस्तता ने जो उनके कान पकड़े कि मैं उनके सुर्यमुखों और चन्द्रमुखियों के दर्शन नहीं पा सका| मुझे लगा कि शायद सदी की सबसे बड़ी घटना उन्ही चार-पाँच दिनों में घट गयी| जैसे सूर्य-चन्द्र ग्रहण एक साथ हो गये हों| मिले कौन? अनपेक्षित बेचारे तारे| अपने इतने बड़े जीवन में, प्रेमियों का इतना बड़ा अकाल मैंने कभी नहीं देखा था|
मैंने ऊपर कन्हैया की और देखा, वह स्वर्ण-मुकुट धारण किए, होठों से मुरली चिपकाये, दही टपकाते हुए मुस्कुरा रहा था| मेरे समझ में आ गया कि जब तक किसी को मुझसे कुछ प्राप्त होने के आसार नहीं होंगे, मुझसे मिलना क्या, अँगूठा तक नहीं दिखाएँगे| तुलसीदास ने लिखा है, “भय बिनु होय न प्रीत” पर मैं उन्हीं की दूसरी बात कहता हूँ, “स्वारथ लाग करहिं सब प्रीती|” लीला बिहारी तो माना-जाना देवता है| लोग उसे साक्षात् स्वर्ग के दर्शन कराने वाला मानते हैं, साथ ही नन्दराज का बेटा, यानि वह पैसे वाला भी है| मेरे मन ने कहा, “बेटा! तुम तो भुवनेश्वर की तरह गलियों में ज़िन्दगी बिता रहे हो, तुम्हें कोई क्यों घास डालेगा? सही बात तो है “बेल को लोग काटेंगे नहीं, तो क्या पानी डालेंगे?

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