सच की दस्तक : एक अनूठा दस्तावेज़ लेखक – अवधेश कुमार ‘अवध’ गुवाहाटी, असम

एक अच्छी पत्रिका होने का आशय है जो अतीत की समृद्ध नींव पर उज्ज्वल भविष्य के लिए वर्तमान में महल खड़ा करा सके। वाराणसी से प्रकाशित सच की दस्तक एक ऐसी ही पत्रिका है जो कला, साहित्य, संस्कृति व सामाजिक सरोकार से अभिप्रेरित करती है। ‘अटल की यादें’ को मुख पृष्ठ पर उद्भाषित करता हुआ अगस्त -2018 का अंक मुझे प्राप्त हुआ। संपादक श्री ब्रजेश कुमार की संपादकीय ने मन्त्रमुग्ध कर बाँधे रखा। 72 सालों की आज़ादी के बाद भी हम मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराई को उखाड़ने में सक्षम नहीं हो सके। स्वच्छ राजनीति के भीष्म पितामह, महापुरोधा, अजातशत्रु व कवि श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी को श्री ब्रजेश कुमार की भावभीनी श्रद्धांजलि शोकसंतप्त करती है।

‘इंसानियत सिर धुनती रही’ के अन्तर्गत आकांक्षा सक्सेना ने मुजफ्फर नगर की हृदय विदारक घटना के माध्यम से नारी शोषण को आकड़ेवार सामने रखा है। अंकित दुबे ने वाट्सअप्प ग्रुप पुलिस मित्र को संचालित करने वाले कांटेबल नीरज सिंह और अभिषेक पाण्डेय द्वारा रक्तदान और जन सहयोग के मिसाल पर अपनी लेखनी ‘संकटमोचक बनी पुलिस’ शीर्षक में बाखूबी चलाई। प्रभाकर कुमार मिश्रा का आलेख “अनुच्छेद 35/A में फँसा कश्मीर” प्रायोजित इतिहास पर आलोक डालते हुए एक आम भारतीय की छटपटाहट को व्यक्त करता है। डॉ. शिव कुशवाहा ‘शाश्वत’ की कविता द्वय ‘ विहान का उदय’ और ‘वजूद’ इतिहास से मनमानी छेड़छाड़ और सकारात्मक सोच से सम्पन्न है तो अवधेश कुमार ‘अवध’ की कविता ‘मंजिल’ गीता के कर्म सिद्धान्त का आह्वान करती है। सुमन कुमार के ‘उठते सवाल’ में अभावग्रस्त बचपन की व्यथा है।
‘चुनाव तो नेक व एक सिस्टम का ही करना जरूरी’ के अन्तर्गत राकेश प्रकाश सक्सेना ने संविधान को सही ठहराते हुए अम्बेदकर जी के हवाले से इसके सदुपयोग और दुरुपयोग पर सवाल उठाया है। महेश तिवारी ने आम जन की समस्या ‘उदासीनता की हद : सड़क के गड्ढे’ के माध्यम से उठाते हुए विकास के खोखले दावे को सिरे से नकार दिया है। आकांक्षा सक्सेना की ‘जरूरत’ संस्कार की जकड़न में अकाल मरती जरूरतों को नई दिशा देने के पहल की एक सफल कहानी है। रिया ने ‘आजादी देश की नई सुबह’ में चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि हम अभी भी अपनों के गुलाम बने हुए हैं जिससे बाहर निकलना होगा। ‘सड़कों पर उमड़ता राष्ट्रवाद’ में अनुराधा जैन ने और ‘स्वतन्त्रता दिवस के बदलते मायने’ में कुशाग्र जैन ने अनियन्त्रित परिवर्तन एवं बाजारू प्रदर्शन के प्रति चिंता व्यक्त किया है।
पूर्वांचल का जायका ‘लौंगलता’ बनाने का तरीका पढ़कर मुँह में स्वाभाविक रूप से पानी आ जाता है। धानापुर की खूनी क्रांति और दस दिवसीय आजादी के संदर्भ में डॉ. अशोक मिश्रा का लेख ‘अगस्त क्रांति के मतवालों ने फिरंगियों के कर दिए दाँत खट्टे’ सराहनीय है। संजय दुबे की लेखनी आजादी प्राप्ति के बाद सेनानियों और उनके परिजनों को नज़र अंदाज करने पर सवाल खड़े करती है ‘गोरी सेना के सिपाही की मौत’ शीर्षक में। राजनीति के सितारे करुणानिधि को श्रद्धांजलि, मेघालय के प्रमुख त्यौहार, गर्मियों में चेहरे की देखभाल, खेल और फिल्म संबंधी जानकारी भी पठनीय व ज्ञानवर्द्धक है। पाकिस्तान के नए प्रधानमन्त्री द्वारा ’30 भारतीय कैदियों की रिहाई’ स्वागत योग्य है।
मात्र दो वर्ष की छोटी अवधि में ‘सच की दस्तक’ ने स्थानीय से अन्तरराष्ट्रीय विषयों को अतीत से सम्भावित भविष्य तक इतने सलीके से संजोया है जो प्रशंसनीय और गौरवशाली है। सर्वांगीण पक्षों को बेबाकी से समावेशित करती इस कालजयी पत्रिका से अपेक्षा और कामना है कि भविष्य में और ऊँचे सोपान तय करे।

पता-
(Mr. Awadhesh Kumar)
Engineer, Plant
Max Cement, GVIL
4th Floor, LB Plaza
GS Road, Bhangagarh
Guwahati -781005 (Assam)

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