कहानी – मुआवजा लेखक –  सुधीर ओखदे   ऑल इंडिया रेडियो

              भवन दूर से ही निपट सरकारी नजर आ रहा है। भारी बिल्डिंग पर जगह-जगह पलस्तर उखड़ा हुआ। रंग-रोगन को किसी जोगन की तरह तरसती इमारत पान के पीकों की पच्चीकारी से सुसिज्जत किसी सरकारी कर्मचारी की तरह निर्विकार और अकर्मण्य प्रतीत हो रही है।

    प्रवेश फाटक कील-कील बिखर चुका है और फटकिया-सा नजर आने लगा है। लेकिन अभी भी अटका है वहाँ अपनी अस्मिता दर्शाने कांग्रेस की तरह।

     प्रवेश द्वार के उपरांत थोड़ा आगे जाने पर सामूहिक शिवांबु की तीव्र गंध नाकों को भेदती-सी नजर आती है। परंतु नाक सामान्य जनमानस की तरह हर गंध को आत्मसात करने को तत्पर। देश की राजधानी से कैसी भी गंध आए, भारतीय जनमानस उसे आत्मसात करने का आदी हो ही जाता है।

एक बड़ा-सा हॉल, जिसके चारों तरफ लकड़ी की कुर्सियाँ और लकड़ी के ही टेबल लगे हैं। टेबल पर पड़े कपड़े की डिजाइन स्याही और अन्य दागधब्बें की शिकार नजर आ रही है।

      अभी उस हॉल में मात्र तीन कर्मचारी नजर आ रहे हैं जिनमें से एक कर्मचारी के दोनों पैर टेबल पर पड़े हैं। इनका नाम दीपकबाबू है। दूसरा कर्मचारी दो टेबलों को जोड़कर गहन निद्रा में लीन है इनका नाम प्रकाश बाबू है। तीसरा कर्मचारी अपेक्षाकृत मुस्तैद नजर आ रहा है। वह कुर्सी पर सीधा बैठा है और तम्बाखू मल रहा है। इन्हें लोग उज्जवलबाबू के नाम से जानते हैं।

      तीनों के चेहरों पर गहन वितृष्णा के भाव नजर आ रहे हैं। लगता है तीनों आपस में इतनी घृणा करते हैं कि यदि रिश्वत में साझेदारी का बँधन न होता तो कभी एक छत के नीचे न बैठे होते।

     अचानक किसी की पदचाप सुनाई देती है और तीनों बाबुओं के मुँह से एकाएक “धुत! धुत! भाग ! भाग ! चल ! चल ! हट ! हट !” ऐसी आवाजें निकलने लगती हैं। इन आवाजों को सुनकर पदचाप थम जाती है।

  उज्ज्वलबाबू तम्बाखू मलते-मलते ही सिर झुकाकर कहते हैं, “जब से साली फटकिया टूटी है कुत्ते तो बिना रोक-टोक राजनीतिक पार्टी का दफ्तर समझ कर घुसे चले आते हैं।”

      प्रकाशबाबू तनिक निद्रा से बाहर आने का प्रयत्न करते हुए कहते हैं, “क्या पता ससुरा कोई कुत्ता ही था कि कोई आदमी सरकारी काम से यहाँ आया था ?”

दीपकबाबू टेबल पर रखे अपने दोनों पैरों को हिलाकर बोलते हैं, “कुत्ता था या आदमी। अब कोई नहीं है, मुझे तो इसी बात की खुशी है।”

      “क्यों दीपकबाबू, वह परसों की नीली साड़ी वाली तो नहीं आई थी ? कुत्ते को भगाने के चक्कर में कहीं हमने उसे ही तो नहीं भगा दिया?” प्रकाशबाबू छेड़ते हुए पूछते हैं।

       नीली साड़ी वाली की बात आते ही तीनों चौकन्ने होकर बैठ जाते हैं। तिहाड़ जेल में वर्षों से बंद कैदियों के सम्मुख जब किसी स्त्री की चर्चा निकलती है तो जैसे भाव उन कैदियों के चेहरों पर होते हैं कुछ वैसे ही भाव इन तीनों के चेहरों पर नजर आने लगते हैं।

“क्यों दीपकबाबू, वह मुआवजा केस निपटा दिया था कि अभी भी लटकाए हो?” इस बार उज्ज्वल बाबू अपना मुँह खोलते हैं।

       इतने जल्दी मुआवजा पा जाएगी तो मस्ती नहीं सूझेगी साली को। हम तो सोच के बैठे हैं, पंद्रह परसेंट से नीचे तो इस बार बात ही न करूँगा। रेल यात्रा में मजा साला वह करे और दुर्घटना में मरे तो मुआवजे का काम हमारे सर। इस बार संवेदना को मैंने ब्रिटिश राज की तरह दफन कर दिया है।”

     “ब्रिटिश राज ? अरे इतनी दूर क्यों जाते हैं। हमारे राज पर आपका भरोसा खत्म हो गया है क्या ? “प्रकाशबाबू की इस बात पर तीनों खिलखिलाकर हँसते हैं।

   “आप ठीक कहते हैं उज्ज्वलबाबू। हम भी यही सोचते हैं। इस बार जब वह आएगी तो हम उसको अंदर के कमरे में इंटरटेन करेंगे। उसे चाय पिलाएंगे, नाश्ता कराएंगे, जरूरत पड़ी तो खाना खिलाएंगे, फिलिम दिखाएंगे। हो गया अब आपका मन शांत।”

तीनो अश्लील हँसी हँसते हैं। तभी एक ग्रामीण-सा आदमी अंदर प्रवेश करता है। उम्र यही कोई साठ-पैंसठ के दरमियान की। मध्यम कद। कृषकाय। परेशान-सा आकर प्रकाशबाबू के सामने खड़ा हो जाता है।

   “आप उधर जाइए, यहाँ क्यों खड़े हैं। वह जो तम्बाखू मल रहे हैं वह आपको समझ लेंगे।” प्रकाशबाबू उसे उज्ज्वलबाबू की तरफ जाने का इशारा करते हैं। वह आदमी चल कर उज्ज्वलबाबू के सामने खड़ा हो जाता है। उज्ज्वलबाबू की मुख मुद्रा पर कोई परिवर्तन नहीं आता। वह निर्विकार भाव से तम्बाखू मलते रहते हैं।

“साहब!”

“पहले जहाँ गए थे, वहीं से काम करवा लीजिए। हम यहाँ पर फालतू तो नहीं बैठे हैं न ! आप लोगों को इतनी भी तमीज नहीं कि सही आदमी के पास एप्रोच करें।”

“साहब गलती हो गई, गुस्सा थूक दीजिए।”

“उज्ज्वल बाबू आप कुछ भी कहें, लोग सरकारी कर्मचारियों को यूँ ही बदनाम करते रहते हैं। अब मुझे ही ले लीजिए। मुझे तो आप लोगों से मिलकर व्यवस्था पर फिर से विश्वास होने लगा है।”

इधर प्रकाशबाबू उस बूढ़े के साथ कमरे में प्रवेश करते हैं और रूपगर्विता को उज्ज्वल बाबू के सामने देखकर उस बूढ़े को मन ही मन गालियाँ देने लगते हैं।

“सरकार कुछ कीजिए न!”

“अब आप ही बताइए, क्या करूँ ?”

“सरकार गरीब आदमी हूँ। एक बेटा था उसे भी खो चुका हूँ। बहू की बेबसी देखी नहीं जाती। अभी मेंहदी भी नहीं छूटी थी कि मांग सूनी हो गई। कुछ करो सरकार भगवान आपका भला करेंगे।”

“अब हम कैसे विश्वास कर लें कि वह तुम्हारा ही बेटा था ?”

“सरकार तो मजाक कर रहे हैं। जब मैं कह रहा हूँ कि वह मेरा ही बेटा था तो सरकार मानते क्यों नहीं कि वह मेरा ही बेटा था।”

इधर रूपगर्विता ने अपने माथे पर आई बालों की एक लट को बड़ी अदा के साथ पीछे किया और चश्मे की कमानी को अपने मोती से चमकते दाँतों के मध्य ले लिया और बिना वजह उसे होठों से दबाने लगी। फिर एकाएक वह उज्ज्वल बाबू को सम्बोधित कर कहने लगी, “मैंने विक्रम को उस दिन कितना कहा था किं इस ब्लडी भारतीय रेल से मत जाओ। पर यू नो, विक्रम भी ऐसा ही है। बिजनेस मीटिंग हो तो जो सवारी पहले जाती होगी उसी से निकल जाता है।”

“आप नहीं जाती बिजनेस‍ मीटिंग में साहब के साथ?” दीपकबाबू ने लार टपकाते हुए पूछा।

“मुझे यहाँ बिजनेस पर लगाकर गया था विक्रम। जिस कंपनीके साथ दिल्ली में उसकी मीटिंग थी उसके चेयरमैन तो यहीं थे। उन्हें भी तो कंपनी चाहिए थी।” “हाँ ! हाँ! क्यों नहीं, आज तो आप-जैसी महिलाओं ने सिद्ध कर दिया है कि पत्नी सचमुच अर्धांगिनी है। अबला नही सबला है।”

सौंदर्यवती ने गर्व के साथ अपनी गर्दन घुमाई, कार्यालय उसे चरणों पर पड़ा हुआ दिखाई दिया। लार टपकाता हुआ, गिड़गिड़ाता हुआ। उसने अपनी दृष्टि प्रकाशबाबू और उस बूढ़े की और दौड़ाई वहाँ अब भी संवाद चल रहा था।

“ठीक है सरकार, कल तो कल। लेकिन मैं जानता हूँ कि कल कभी नहीं आएगा।” बूढ़े ने एक दर्द भरी निगाह उस कक्ष पर दौड़ाई ओर धीमे-धीमे कदमों से बाहर निकल गया।

उसके बाहर जाते ही प्रकाशबाबू भी सौंदर्यवती के समीप आ जाते हैं और उसको सम्बोधित करते हुए अपने साथियों को बताते हैं, “साला बाप होकर भी दावा कर रहा था कि मृतक उसी का बेटा है। पर यह बात तो सच्ची-सच्ची मृतक की माँ ही बता सकती हैं न …”

तीनों अश्लील हँसी हँसते हैं, जिसमें रूपगर्विता भी उनका साथ देती है।

—————————————————————-

पता-

सुधीर ओखदे

इमेल- ssokhade@gmail.com

0 0 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x