बंगाल में 10 हिन्दूओं को ज़िंदा जला दिया

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में होली के बाद आग की होली खेली गई. जिसमें रामपुरहाट इलाके में सोमवार की रात 10 से 12 घरों का दरवाजा बंद कर 10 लोगों को जिंदा जला दिया गया. अब इस पूरे घटना की जांच एसआईटी करेगी.

West Bengal News : पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता की हत्या के बाद बड़ी वारदात को अंजाम दिया गया है. सोमवार की रात 10 से 12 घरों में दरवाजे को बंद कर घरों में आग लगा दी गई. आग में झुलसकर 10 लोगों की मौत हो गई. सभी 10 मृतकों के शव उनके घरों से बरामद हुए हैं, जिसमें 8 लोगों के शव एक ही घर  से बरामद हुए हैं. आरोप लगाया जा रहा है कि इन सभी को घरों में बंद कर जिंदा जलाकर मारा गया है. ये जानकारी मिल रही है कि तृणमूल कांग्रेस के नेता की हत्या का बदला लेने के उद्देश्‍य से इस घटना को अंजाम दिया गया है.

जातीय समीकरण से समझिए बीरभूम का गणित
2011 के जनगणना के मुताबिक बीरभूम की कुल संख्या 35 लाख 02 हजार 404 है, जिसमें 17 लाख 90 हजार 920 पुरूष और 17 लाख 11 हजार 484 महिलाएं हैं। बीरभूम में 62% हिंदू (जिसमें करीब 35% SC-ST) और 37% मुस्लिम आबादी है।

टैगोर ने यहां की थी शांति निकेतन की स्थापना
1901 में रविंद्रनाथ टैगोर ने बीरभूम के वोलपुर में शांति निकेतन की स्थापना की थी। 1919 में उन्होंने ‘कला भवन’ के नाम से एक स्कूल की नींव रखी थी, जो 1921 में विश्वभारती विश्वविद्यालय का एक हिस्सा बन गया।

स्थापना के बाद शांति निकेतन दुनियाभर में शिक्षा का केंद्र बनकर उभरा। - Dainik Bhaskar
स्थापना के बाद शांति निकेतन दुनियाभर में शिक्षा का केंद्र बनकर उभरा।

सत्ता बदली, लेकिन नहीं रुकी राजनीतिक हिंसा
बंगाल में राजनीतिक हिंसा की शुरुआत 1970 में कांग्रेस और माकपा के बीच सत्ता संघर्ष से हुई। नब्बे के दशक में यह और भी अधिक तेजी से बढ़ी, जो अब तक निरंतर जारी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने 2018 की अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2018 में बंगाल में 12 हत्याएं हुईं हैं।

उसी रिपोर्ट में कहा गया था कि वर्ष 1999 से 2016 के बीच पश्चिम बंगाल में हर साल औसतन 20 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। इनमें सबसे ज्यादा 50 हत्याएं 2009 में हुईं। वहीं, ममता सरकार ने 2019 से NCRB को राजनीतिक हत्या का आंकड़ा देना बंद कर दिया। पिछले 50 साल में बंगाल में कांग्रेस, CPIM और तृणमूल पार्टी सत्ता में आई, लेकिन राजनीतिक हिंसा का खेल बंद नहीं हुआ।

2021 में विधानसभा चुनाव के बाद पूरे बंगाल में पोस्ट पोल हिंसा शुरू हुई। इसमें बीरभूम सबसे अधिक सुर्खियों में था। राजनीतिक हिंसा में यहां एक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। वहीं डर से हजारों परिवार ने पलायन शुरू कर दिया था। CBI जांच के दौरान बीरभूम से कई आरोपियों को गिरफ्तार भी कर चुकी है।

पंचायत नेता की हत्या के बाद भड़की हिंसा

TMC नेता की हत्‍या के बाद फूंक डाले 40 घर, 10 लोग जिंदा जले;

दरअसल, सोमवार को टीएमसी के एक पंचायत नेता की हत्या के बाद भड़की हिंसा में 10 लोगों की मौत की खबर है। इन लोगों के घरों को आग लगा दी गई थी, जिसमें वे जिंदा जलकर मर गए। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की भी खबर है। पुलिस ने कहा कि बीरभूम जिले की बारशल ग्राम पंचायत के उप-प्रधान भादू शेख की सोमवार को हत्या कर दी गई थी। उसके बाद ही रात को यह आगजनी कांड हुआ, जिसमें 10 लोग जिंदा जल गए। भादू शेख बोगतुई गांव के रहने वाले थे।

आग हिंसा के दौरान नहीं लगी, TMC का दावा
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह आगजनी टीएमसी के एक गुट के सदस्यों की ओर से की गई है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया है। बीरभूम जिले के टीएमसी के अध्यक्ष अनुब्रत मंडल ने दावा किया कि यह आग हिंसा के दौरान नहीं लगाई गई है। उन्होंने कहा कि यह आगजनी शॉर्ट सर्किट के चलते हुई थी और उसी की वजह से घरों में आग लग गई। टीएमसी कार्यकर्ताओं की ओर से हमले की बात को खारिज करते हुए मंडल ने कहा, ‘शॉर्ट सर्किट के चलते लोगों के घरों में आग लग गई थी और उससे ही मौतें हुई हैं। सोमवार की रात को कोई हिंसा नहीं हुई थी।’

पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी की सरकार को आड़े हाथ लिया है. बीरभूम जिला के रामपुरहाट ब्लॉक में तृणमूल कांग्रेस के नेता भादू शेख की हत्या के बाद हुए नरसंहार के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेता शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन (President Rule in West Bengal) लगाने की सलाह केंद्र सरकार को दी. दूसरी तरफ, खबर है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी है.

आंकड़ों के हिसाब से देखें, तो बीरभूम में पिछले 21 साल में राजनीतिक हिंसा की 8 बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें 41 लोगों की जान जा चुकी है। जिनमें हिन्दू निशाने पर हैं….! यह एक सवालिया निशान है…? 

1. नानूर का नरसंहार : 11 मजदूरों को जिंदा जला दिया गया था
तारीख थी 27 जुलाई और साल था 2000। राज्य में सरकार थी वाम मोर्चे की और केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। एक विवादित जमीन पर खेती करने की वजह से CPIM कार्यकर्ताओं ने 11 मजदूरों को जिंदा जला दिया था। घटना पर केंद्र ने राज्य सरकार से रिपोर्ट तलब की थी। इस मामले में जांच के बाद 82 CPIM कार्यकर्ताओं को आरोपी बनाया गया था, जिसमें 44 दोषी करार दिए गए थे।

2010 में बीरभूम की अदालत ने किसानों को जिंदा जलाने के मामले में 44 CPIM कार्यकर्ताओं को दोषी माना था। - Dainik Bhaskar

2010 में बीरभूम की अदालत ने किसानों को जिंदा जलाने के मामले में 44 CPIM कार्यकर्ताओं को दोषी माना था।

2. पूर्व विधायक को घर से खींचकर सड़क पर मार डाला
2009 के आम चुनाव में सत्ताधारी CPIM की राज्य में करारी हार हुई, जिसके बाद तृणमूल कांग्रेस मुखर होने लगी। 30 जून 2010 को नानूर इलाके में CPIM कार्यकर्ताओं ने तृणमूल के एक कार्यकर्ता की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद 200 से अधिक तृणमूल कार्यकर्ता बंगाल के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक आनंद दास के घर के पास प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान ही उनकी मौत हो गई थी। CPIM ने आरोप लगाया कि तृणमूल कार्यकर्ताओं ने उन्हें घसीटकर मार डाला। घटना के बाद एक महीने तक इलाके में तनाव बना रहा।

इस घटना के बाद तत्कालीन CPIM के स्टेट सेक्रेटरी बिमान बोस ने बयान देते हुए कहा था कि बीरभूम में अब कानून का राज खत्म हो गया है। - Dainik Bhaskar
इस घटना के बाद तत्कालीन CPIM के स्टेट सेक्रेटरी बिमान बोस ने बयान देते हुए कहा था कि बीरभूम में अब कानून का राज खत्म हो गया है।

3. मोहम्मदपुर बाजार: आदिवासी और समुदाय विशेष के बीच झड़प में 4 की मौत, 100 घर जले
बीरभूम के सुरी क्षेत्र का इलाका है, मोहम्मदपुर। यहां पर आदिवासी और एक विशेष समुदाय की तादाद सबसे अधिक है। 22 अप्रैल 2010 को यहां पर रेत उत्खनन को लेकर आदिवासी और दूसरे पक्ष के माफियाओं के बीच हिंसक झड़प हो गई, जिसमें 4 लोगों को मौके पर ही मार डाला गया। वहीं, 100 से ज्यादा घर फूंक दिए गए। घटना के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने राज्य से रिपोर्ट तलब की थी।

4. पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा में 4 CPIM कार्यकर्ताओं की मौत
2011 में पश्चिम बंगाल में सरकार बदल चुकी थी। ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार सत्ता में थी। राज्य में पंचायत चुनाव चल रहा था। इसी दौरान मोहम्मदपुर बाजार इलाके में तृणमलू और CPIM कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प हुई। घटना में CPIM के 4 कार्यकर्ताओं की मौके पर ही मौत हो गई।

CPIM के गढ़ बीरभूम में 2011 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बड़ी सेंध लगाई। इसके बाद यहां से वाम मोर्चा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच लगातार हिंसक झड़प की खबरें आती रहीं। - Dainik Bhaskar
CPIM के गढ़ बीरभूम में 2011 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने बड़ी सेंध लगाई। इसके बाद यहां से वाम मोर्चा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच लगातार हिंसक झड़प की खबरें आती रहीं।

5. माकड़ा गांव में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच झड़प, 4 की मौत
2014 के बाद बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य अब पूरी तरह बदल चुका था। CPIM का गढ़ रहे बीरभूम में अब तृणमूल और भाजपा के बीच संघर्ष शुरु हो गया। 27 अक्टूबर 2014 माकड़ा गांव पर सियासी कब्जे की लड़ाई में भाजपा और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इसमें भाजपा के 3 और तृणमूल के 1 कार्यकर्ता की मौत हो गई।

6. दरबारपुर गांव की हिंसा: स्कूलों पर क्रूड बम फेंके, 7 की जान गई
बीरभूम में सत्ता के साथ-साथ ही अवैध खनन और रेत तस्करी का केंद्र भी बदलता रहता है। यहां CPIM और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच रेत खनन के ठेके पट्टे को लेकर विवाद हो गया। तनाव इतना बढ़ा कि दोनों ओर से बमबाजी शुरू हो गई। यहां तक कि स्कूल और कॉलेजों पर भी दोनों गुट ने बम फेंकना शुरू कर दिया। इस हिंसक झड़प में 7 लोगों की मौत हो गई।

 

Sach ki Dastak

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