लुप्त होती सर्कस कला –

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सरकार की बेरूखी और हाइटेक हो चुके समाज के कारण सर्कस अब लुप्तप्राय हो चुके हैं, लेकिन जो इक्का-दुक्का बचे भी हैं, वह भी मृतप्राय समान हैं। अब से तीन-चार दशक पूर्व तक अकेले अपने देश में ही साढ़े तीन सौ से अधिक सर्कस हुआ करते थे, लेकिन आज आधा दर्जन भी नहीं बचे हैं।
दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करने वाला सरकस कलाकार आज भुखमरी की कगार पर हैं। नया कलाकार सर्कस की ओर रूख नहीं कर रहा है। जब से सर्कस में जानवरों पर प्रतिबंध लगा है तब से तो सर्कस मालिक और कलाकार रसाताल में पहुंच गए हैं। अब हालात यह हैं कि जानवरों और प्रशिक्षित कलाकारों के अभाव में सर्कस कला दम तोड़ चुकी है।


पूर्व में जब किसी नगर या ग्राम में सर्कस होता था तो लोग सपरिपार सर्कस देखने जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है, गांव या नगर में सर्कस करने वाले बहुत ही कम देखने को मिलते हैं। आज अधिकतर सर्कस का कारोबार लगभग ठप्प हो चुका है।


सत्तर के दशक में सर्कस की पृष्ठभूमि पर बनी राजकपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ ने खूब वाह वाही लूटी थी। तब जमाना दूसरा था आज दूसरा है।
सर्कस कलाकार अपनी जान की परवाह किए बगैर लोगों का मनोरंजन करते हैं। लेकिन हैरानी तब होती है जब उनकी जान की कीमत दो वक्त की रोटी से ज्यादा कुछ नहीं होती। वर्षों काम करने के बाद भी ये कलाकार मुश्किल से अपना घर चला पाते हैं। आर्थिक तंगी के चलते ये कलाकार अब व्यवसाय का अन्य विकल्प तलाशने को मजबूर हैं।


‘बीना कमल’ सरकस चला रहे दिलदार हुसैन वारसी दिल में संताप लिए रूंधे गले से बताते हैं कि अब वो जमाना नहीं रहा, जब सरकस और कलाकार को इज्जत मिलती थी। दो वक्त का पेट भरने लायक भोजन और तन ढकने को कपड़ा आराम से मिल जाता था। लेकिन आज भूखों मरने की स्थिति है।
दिलदार हुसैन को सरकस कलाकारी विरासत में मिली है। उनके वालिद साहब सर्कस में रिंग मास्टर थे। हलांकि उनके वालिद नहीं चाहते थे उसके पुत्र भी सर्कस में काम करें। लेकिन दिलदार पर सर्कस का ऐसा नशा चढ़ा कि इस काम को रोजी रोटी का जरिया बना लिया। इतना ही नहीं सरकस कलाकार से शादी भी रचाई, जो अब सर्कस में उसका सहयोग करती है। दिलदार ने देश के नामचीन ‘भारत’, ‘ग्रेट बांबे’, ‘अपोलो’ जैसे आदि सर्कसों में काम किया।


जब से सरकार द्वारा सर्कस में जानवरों पर प्रतिबंध लगाया गया, सर्कसों की हालत बद से बदतर होती चली गई। सर्कस मालिकों ने तो दूसरा व्यवसाय अपना लिया। जबकि कलाकार सड़कों पर आ गया। दिलदार जैसे कुछेक कलाकारों ने जोड़तोड़ कर छोटा मोटा अपना सर्कस खड़ा तो कर लिया, लेकिन मोबाइल युग के आने से आज मुफलिसी का शिकार बनकर रह गए। उनकी हालत सांप छछूंदर वाली हो गई।
दिलदार बताते हैं कि साहब खानाबदोश वाला जीवन है। पांच-छह घंटे हाड़ तोड़ काम करने के बाद भी पेट भरने लायक रोटी मयस्सर नहीं होती। बच्चों की तालीम, उचित चिकित्सा तो दूर की बात है। कलाकार न होने के कारण पूरे परिवार को ही सर्कस के छोटे-मोटे आइटम दिखाकर पेट भरने लायक जुगाड़ करना पड़ता है।

दिलदार को स्वयं ही एनाउंसर, टिकट विक्रेता, रिंग मास्टर, कलाकार, मालिक आदि का रोल प्ले करना पड़ता है। दस वर्षीय बेटा और भाई जोकर, पत्नी चाकूबाजी और बारह वर्षीय बेटी जिमनास्ट के करतब दिखाती है।
सर्कस के साज़ो सामान की हालत यह है कि तमाम तंबू फटा हुआ है। पैबंद पर पैबंद सर्कस की मुफलिसी साफ बयान करते हैं। कुर्सियां टूट-फूट चुकी हैं, करतब दिखाने का सामान या तो जंग खा चुका है अथवा गल चुका है। कलाकार पैसों से ज्यादा दर्शकों से तारीफ़, वाहवाही, उत्साहवर्द्धन का भूखा होता है। यही कारण है कि रिंग में करतब दिखाते वक्त दिलदार के भाई, पत्नी, पुत्री, पुत्र और स्वयं के चेहरे पर कोई उत्साह, उमंग, खिलखिलाहट दिखाई नहीं देती। सभी के चेहरों पर मुर्दानगी सी उदासी छाई रहती है।


दिलदार के तंबू में झांकते ही घोर गरीबी का साम्राज्य दिखाई देता है। चारपाई टूटी पड़ी हैं। ओढ़ने-बिछाने के कपड़े अस्त-व्यस्त और पुराने होकर फटे हैं। खाने के नाम पर एक दो पॉलिथीन में थोड़ा सा आटा, दाल, चावल, चीनी और डब्बे में कुछ चायपत्ती रखी है। एक ओर दो-चार बरतन, गैस सिलेंडर और चूल्हा है।


दिलदार की नम आंखों से ऐसा महसूस होता है कि जैसे वे सरकार को कोस रही हो, कभी लगता जैसे हाइटेक हो चुके समाज के प्रति उनमें घोर विषाद हो……..!!! दिलदार के गालों पर आंसू लुढ़क आते हैं। कंधे पर पड़े साफे से आंखें पौंछते हुए भर्राए गले से इतना ही कह पाता है, “साहब, अाज ऐसी कलाकारी को कोई पसंद नहीं करता। हां, नौटंकी को हजारों, लाखों दर्शक मिल जाएंगे। अब तो ये सब तामझाम बेच-बाचकर कहीं चाय की दुकान खोलूंगा, उससे कम से कम परिवार का पेट तो पाल सकूंगा।”

कहने को तो प्रतिवर्ष 19 मई को सर्कस डे मनाया जाता है, लेकिन अपने देश में इस डे पर सर्कस जैसी कलाओं का गला घोटा जा रहा है।
वहीं इसी दुनिया में चीन, अमेरिका जैसे देश भी हैं जो इस कला को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सर्कस अकादमी संचालित कर रहे हैं। रूस ने तो एक कदम और आगे आकर अपने सभी प्रमुख शहरों में सर्कस केंद्र तक बनाए हुए हैं। लेकिन अपने देश में ऐसी कलाओं की न तो कोई कद्र है और न ही क़द्रदान।

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