लघुकथाएं : लेखक – सुमन कुमार

(1.) फ़र्क़ की संवेदना 
 
  “लीजिए लीजिए- आइए जी! खाइए पकौड़े। इस बारिश में कुछ चटपटा तो बनता है।” “सही कह रही हो- इस मौसम में चटपटे तो…भई, वाह! इसी तरह चार-पांच दिन बारिश हो तो क्या मज़ा! और बरसो भगवान!” एक बड़ी बिल्डिंग में रह रहे पति-पत्नी बतिया रहे थे।
       इधर- एक मड़ई में रह रहा दंपती झख़ रहा था। “हे भगवान! कब मेघ छूटेगा। छप्पर से चू रहे पानी… घर में बाढ़-सी आ गई है। चूल्हा-चौंका ठंडा पड़ा है। फसल सब डूब गई है। अब छूटो भगवान…!”
     मैं उस बिल्डिंग से उतरता उस मड़ईसे होकर गुज़र रहा था। सोच रहा था- इस फ़र्क़ की संवेदना एक कैसे होगी?”

 

(2.)                 _____धोती____

  अभी-अभी पैसेंजर ट्रेन में दो हांफ़ते हुए युवक चढ़े थे। उनकी नज़रें सीटें खोज रही थीं कि उकड़ू बने बैठ धोती-कुरता वाले बुज़ुर्ग पर टिक गईं- “ऐ बुढ़उ! जाइए उधर। बढ़िए…।” बोलते ही एक ने उन्हें धकेल दिया। वे ख़ुद को संभालते हुए अपनी धोती साफ़ करने लगते हैं। “हुंहऽऽऽ…अरे! अरे!! उधर झाड़िए। जाइए उधर। मैली-कुचली धोती… जाइए उधर झाड़िए। सीट भी गंदा कर दिया। कैसे-कैसे लोग बैठ जाते हैं।” अगल-बगल के यात्री भी उन्हें दुत्कारने लगते हैं और उनकी धोती पर तरह-तरह की बातें बनाने लगते हैं।
    एकाएक सिग्नल न मिलने के कारण ट्रेन रूकती है। थोड़ी देर में पटरी के उस पार लोगों का जमावड़ा…। बुज़ुर्ग भी पास आकर देखते हैं। एक नंगी लाश पड़ी थी। लोग नाक-मुंह ढंके हिल-डुल रहे थे। कुछ देर चुप रहने के बाद बुज़ुर्ग अपनी धोती खोल, लाश को ढंक देते हैं। सैकड़ों आंख़ें फ़ट उस धोती पर छितड़ जाती हैं!

 

 (3.)  आज की दुनिया

‘होईsss..होईsss.होईsss…।’ जाम में फंसे एंबुलेंस की आवाज़ सड़क पर गूंज रही थी। पर, कोई साइड देने को तैयार नहीं। सबको अपनेअपने जाने की पड़ी थी। गाड़ियां जैसे रेंग रही थीं। इधर मरीज़ की धड़कनें तेज होती जा रही थीं। बेचारा एकदम से छटपटाने लगा था। साथ बैठे परिजन एकदम से घबरा उठे। उन्हें इस जाम में कुछ सूझ न रहा था। एक ने नीचे उतरकर जोरजोर से गुहार लगाई”अरे! कोई रास्ता दो। हमारा आदमी मर जाएगा भाई कैसी यह व्यवस्था है और कैसे तुम लोग हो? दयाधरम कुछ भी नहीं..?” परिजनों की इस दुहाई के बाद भी भीड़ पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। आख़िर जैसेतैसे करके एंबुलेंस अस्पताल पहुंचा। पर, रोगी मर चुका था। परिजन दहाड़ मारकर रो रहे थे। पत्नी का तो कुछ पूछो ही नहींवह प्रत्यक्षत: मृत पति को लेकर विलाप ज़रूर कर रही थी। परपरोक्षतउसके मूल में आज की दुनिया और आज का फ़ैशन था!

सुमन कुमार, पाटलिपुत्र विश्वविद्यालयपटना
कवि, कथाकार, चित्रकार
पत्र, पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित।

पत्राचार – सी/ओ – नरेश रायएस/ओ- बालकिशुन रायदेवी स्थान मोहनपुर, पुनाईचक, न्यू कैपिटलपोस्ट- एल0 बी0 एस0 नगरपटना
800023 (बिहार)

 

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