इंटरव्यू दस्तक : नवाब शादाब अली बहादुर ऑफ बांदा स्टेट

नमस्ते दोस्तों 🙏 आइये आज आपको रूबरू करातें हैं देश की उन महान शख्शियत से जिनके पूर्वजों का नाम भारतवर्ष के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा गया है |जोकि, किसी परिचय के मोहताज़ नही है |

जिनका नाम है सर्वसम्माननीय नवाब शादाब अली बहादुर ऑफ बांदा स्टेट |

🙏🙏🙏

श्रीमंत बाजीराव पेशवा और मस्तानी साहिबा जी|

नवाब शादाब अली बहादुर जी

आकांक्षा- नमस्ते सर |

आपका हमारे सोसल अवेयरनेस ब्लॉग

 ‘समाज और हम’ में सहृदय ससम्मान स्वागत है|

नवाब साहब- नमस्ते आकांक्षा जी|

सवाल – सर आपका पूरा नाम ?

जवाब-  नवाब शादाब अली बहादुर ऑफ बांदा स्टेट |

सवाल- आपका जन्मस्थान माँ पिता का नाम सर?

जवाब – हमारा जन्म स्थान सीहोर म.प्र है |पिता का नाम नवाब अशफाक़ अली बहादुर और माता का नाम बेगम अंजुम जहॉ |

सवाल –  आपने कहाँ तक शिक्षा प्राप्त की है?

जवाब- हमने मास्टर ऑफ कॉमर्स और सोफ्टवेयर में डिप्लोमा किया है |

सवाल- आप इस समय कौन से बिजनिस प्रोजेक्ट से जुड़े है?

जवाब- हम गोल्ड एण्ड सिल्वर के रिसाईक्लिंग और  फॉर्मिंग से जुड़ा हूँ |

सवाल- आपके पूर्वजों के बारे में कुछ बतायें और उनकी कोई खास बात जिसे आप हमेशा याद रखते हैं?

जवाब- हमारे पूर्वज श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रथम एवं कुँवर मस्तानी जुदेव साहिबा थे | हमें फ़क्र है कि जिनका मैं आंठवी पीढ़ी का वंशज हूँ | हमारे पूर्वजों का बेहद गौरवशाली इतिहास रहा है यह कि, आज से 300 साल पहले परिवारवालों की राजनीति एवं पूना के कट्टर पंडितों ने श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी के पुत्र कृष्णराव का जनेेेऊ संंस्कार करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि, यह बच्चा शुद्ध ब्राह्मण नही है क्योंकि, इसकी माँ मस्तानी साहिबा एवं इसकी नानी मुसलमान है |  यही कारण था कि श्रीमंत बाजीराव पेशवाजी ने मजबूरन अपने पुत्र कृष्णराव का नाम बदल शमशेर बहादुर कर दिया और उन्हें मुस्लिम घोषित कर दिया | श्रीमंत बाजीराव पेशवा जैसा कौन ऐसा दिलेर योद्धा हुआ होगा जो इतनी ऊँची और न्यायसंगत सोच रखते थे | देश के इतिहास में दर्ज यह एक अकल्पनीय कदम था | मस्तानी साहिबा के पिताजी हिन्दू महाराजा छत्रसाल जी थे जोकि प्रणामी पंथ एवं धर्म सम्प्रदाय के मानने वाले एवं उनके प्रचारक और स्वामी प्राणनाथ जी के अनन्य भक्त थे | इस पंथ सम्प्रदाय में हिन्दु – मुस्लिम मान्यताओं को गंगा-जमुनी तहज़ीब की तरह मिला-जुला कर माना जाता है | जिसका पूरा प्रभाव मस्तानी साहिबा के ऊपर बचपन से ही पड़ा | वह भगवान श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं और बहुत कम आयु में ही श्री कृष्ण जी की आराधना और भजन में डूब कर मस्त हो नाचने लग जायां करतीं थी | उनकी इस महान भक्ति को देख महाराजा छत्रसाल जी टोका करते थे कि अगर इतना मस्त हो भजनों पर नाचोगी तो लोग मस्तानी कहनी शुरू कर देगें | यही वज़ह थी जो उनका नाम मस्तानी पड़ गया | इसके साथ ही वह मुस्लिम धर्म की मान्यताओं को भी मानतीं थीं जिस कारण कट्टर पंडितों को तीन साल के कृष्णराव को शुद्ध ब्राह्मण न मानने  बहाना मिल गया | इसके पीछे परिवार की यह राजनीति थी कि, कृष्णराव को आगें चलकर श्रीमंत बाजीराव पेशवा अपनी गद्दी एवं पेशवाई का उत्तराधिकारी न बना दें क्योंकि वह अपनी पहली पत्नि से ज्यादा अपनी दूसरी पत्नि मस्तानी साहिबा एवं पुत्र कृष्णराव को बहुत प्रेम करते थे और करें भी क्यूँ न क्योंकि मस्तानी साहिबा गुणों की खान थीं| वह बेहतरीन तलवारबाज़ और घुड़सवार तथा अच्छीं भालेबाज़ भी थीं पर उनकी यह खूबियां समय के साथ दबा दीं गयीं | उनका विवाह श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी के साथ उनके सरदारों की मौजूदगी में 15 वर्ष की आयु में सन् 1729 में सम्पन्न हुआ था | वह जितनी महान कृष्ण भक्त थीं उतनी ही महान देशभक्त भी थीं | और उनके पुत्र शमशेर बहादुर जी में भी कर्तव्यनिष्ठा और देशभक्ति की भावना उन्हें विरासत में मिली थी | वह बिल्कुल हू ब हू बाजीराव पेशवा जी की तरह दिखते थे | उनके बहादुरी के किस्से दूर-दूर तक फैले थे | शमशेर बहादुर साहिब 14 जनवरी 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में अफगानी बादशाह अहमदशाह अब्दाली से वीर मराठों की ओर से बहुत बहादुरी से लड़े और शहीद हो गये तब उनकी उम्र महज़ 27 वर्ष थी | इसके बाद उनके पुत्र नवाब अली बहादुर प्रथम अंग्लो मराठा युद्ध 1803 में लड़े और नवाब बांदा के नाम से बुंदेलखण्ड में बांदा रियासत में राज करते रहे |1857 में इनके परपोते नवाब अली बहादुर द्वितीय अपने रिश्तेदार शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का बहुत ख्याल रखते थे एवं उनकी मेहमान नवाज़ी महीनों तक करते थे और उनका पूरा खर्च उठाते थे तथा नवाब अली बहादुर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई नवाब अली बहादुर को राखी बांधती थीं |  वह उन्हें अपना भाई मानती थीं | जब झाँसी पर अंग्रेजों ने हमला किया तब वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी ने राखी रखकर खत लिखा”भैया अपनी बहन की राखी की रखो लाज”राखी का वास्ता देकर जब मदद मांगी तो नवाब बांदा तुरन्त अपनी फौज लेकर रानी की मदद के लिये गये | इस बात की सजा अंग्रेजों ने यह दी कि बांदा रियासत के नवाब को इंदौर के पास मऊ में नज़रबंद कर दिया गया और उनका पूरा खजाना जप्त कर लिया जोकि 1947 जब तक देश आजाद न हो गया, इन्दौर में ही रहे | फिर उनके वंशज नवाब सैफ़ अली बहादुर (political Pensioner) सीहोर शिफ्ट हो गये | हल हाज़िर नवाब अशफाक़ अली बहादुर भोपाल में रहते हैं |

हम अपने पूर्वजों की वफादारी के सामने नतमस्तक हैं कि उन्होने अपनी राखी बहन के लिये और देश के लिये अपना सर्वस्व नौक्षावर कर दिया पर अंग्रेजों से हाथ नही | मिलाया | हमें फ़ख्र है कि हम ऐसे महान वफादार पूर्वजों के वंशज हैं |हमने अपने पूर्वजों से रिश्तों को जान देकर भी निभाना सीखा है और हमारे खून में पैसा और सत्ता का कोई लोभ नही है|

सवाल – अभी हाल ही में सुना गया किसी फिल्म को लेकर काफी बवाल मचा था..क्या था वह मामला? फिल्म में कौन सी वो चीज गलत दिखाई जो आपको बहुत बुरी लगी?आखिर! सच क्या है ?

जवाब- ये फिल्म थी बाजीराव मस्तानी जो तथाकथित डाईरेक्टर एण्ड प्रोड्यूसर संजयलीला भंसाली ने बिना हमसे जानकारी लिये परामर्श लिये काल्पनिक मनोरंजन हेतु पैसा कमाने वास्ते बना डाली | यह फिल्म नही बल्कि देश के गौरवशाली इतिहास के साथ भद्दा मजाक था | इसमें महान देशभक्त श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी जोकि अटक से लेकर कटक तक मराठा सल्तनत की हुकूमत खड़ा करने वाले मराठा सल्तनत के प्रधानमंत्री के साथ – साथ महान योद्धा भी थे | उनकी दोनों पत्नियों तथा उनको खुद नाचते दिखाया | वो सरासर गलत है | मस्तानी साहिबा उनकी दूसरी ब्याहता पत्नी थी | उनसेे चोरी-चोरी मिलने का सवाल ही नही उठता | फिल्म में दिखाया कि बेशकीमती शादी के तोहफे शनिवारवाढ़ा में गया और बहू कहीं और ऐसा नही हुआ | सच यह है पेशवा जी के द्वारा मस्तानी महल शनिवारवाड़ा में ही बनवाया गया था और सब एक साथ एक जगह रहते थे | जहाँ हमारी तीन पीढ़ियाँ रहीं | दूसरी बात यह है कि फिल्म में दिखाया कि मस्तानी साहिबा बाजीराव जी से मदद मांगने जातीं हैं | यह बात बिल्कुल झूठ है| तथा महाराजा छत्रसाल जी ने कवि भूषण के हाथों 100 दोहों का संदेश भेजा था जिसकी दो मशहूर पक्तियाँ इस प्रकार हैं-

जो गति ग्राह गजेन्द्र की, सो गति भई है आज |
बाजी जात बुंदेल की, राखो बाजी लाज ||

      इसी पद्यबद्ध पत्र द्वारा श्री मंत बाजीराव पेशवा जी से मदद की गुहार लगाई थी | वो बंखश खान इलाहाबाद का मुगल सूबेदार था, की कैद में थे | यह न दिखाकर सब मनगड़ंत दिखाया तथा मस्तानी साहिबा पीछे से पूना चली जाती हैं | ऐसा इतिहास में कभी नही हुआ| सच तो यह है कि श्रीमंत बाजीराव पेशवा जी से मस्तानी साहिबा का मस्तानी महल छतरपुर में बकायदा प्रणामी धर्म से विवाह हुआ था और बतौर सम्मान उनको बेशकीमती तोहफे भी दिये गये थे | उनका कन्यादान और डोली को रवाना उनके पिता छत्रसाल जी ने ही किया था | यह है हमारे पूर्वजों का सही इतिहास | हमारा खानदान एक गंगा जमुनी तहज़ीब और भाईचारे की पहिचान है | जिसें हम स्वयं प्रमाणित करते हैं | क्योंकि हम इस महान रियासत के वंशज हैं और हमारे खून में झूठ और धोखे की मिलावट नही है | 

        इस फिल्म में हमारे पूर्वजों का चरित्रहनन किया गया जो बर्दाश्त के बाहर था बस इसलिये गुस्सा फूट पड़ा क्योंकि इतिहास कोई मनोरंजन की चीज नही बल्कि यह एक महान धरोहर है |

सवाल- देश में कोई नया कानून बनाने का मौका मिले तो कौन सा कानून बनाना चाहेगें?

जवाब- हमें कानून बनाने का मौका मिले तो हम सबसे पहले देश के गौरवशाली इतिहास के साथ छेड़छाड़ करके पैसा कमाने वालों के ख़िलाफ़ कठोर दण्ड का सख़्त कानून बनाना चाहूंगा | कानून इतना सख्त हो कि जब भी कोई एेतिहासिक टीवी सीरियल या फिल्म बने तो उस राज परिवार के वंशजों से सच जाने बिना और स्वीकृति के बिना कोई फिल्म या सीरियल बनाने की कतई अनुमति न हो |

       परिणामस्वरूप हम यह कह सकते हैं कि अगर बाजीराव की स्क्रिप्ट हमसे सलाह लेकर लिखी जाती या पूज्यनीय वीरांगना रानी पद्मावती जी के वंशजों से परमीशन लेकर सच जानकर फिल्म बनाई होती तो डाईरेक्टर संजयलीला भंसाली के साथ जो हुआ वो न हुआ होता और हम दो राज परिवारों को यूँ परेशान न होना पड़ता | हमने हाईकोर्ट तक सच की लड़ाई लड़ी पर अफसोस! निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जब पता चला कि देश में ऐसा कोई कानून ही नही है जो झूठी ऐतिहासिक फिल्मों को रोक सके | यह बेहद चिंतनीय स्थिति है जरा सोचिये! अगर देश का इतिहास ही काल्पनिक फिल्मों की भेंट चढ़ जायेगा तो देश का फिर क्या भविष्य होगा ?

सवाल- आपका जीवन का क्या सपना है?

जवाब- मेरे जीवन का सपना है कि हमारे महान पूर्वजों ने जो देश के लिये कुर्बानियाँ दी हैं उनका सिला और सम्मान हमें सरकार की तरफ से हासिल हो |

सवाल- सरकार से बड़ी शिकायत क्या है आपकी?

जवाब- सरकार से यही शिकायत है कि कई राजा और नवाब जो अंग्रेजों के एजेंट थे तथा उनमें से कई देश के गद्दार थे| उनके पास आज भी उनके महल और जमीनें हैं और उनका राष्ट्रीय सम्मान भी है | तो हम 1857 के क्रांतिकारियों महानदेशभक्तों के वंशजों का क्यों नहीं | हमसे ही हमारे घर और महल क्यों छीनें

गये ?” आखिर! सरकार हमारे प्रति दोहरा रवैया क्यों अख्तियार किये हैं | उन्हें तो हमारी मदद करनी चाहिये पर ऐसा नही है | हमारा यही स्वप्न है हम सभी 1857 के जितने भी क्रांतिकारी रहे हैं जैसे मंगल पांडे, तात्या टोपे, वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई एवं हम बांदा नवाब के वंशजों को सरकार द्वारा स्वतंत्रता सेनानी प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया जाये और हमारी पुश्तैनी जमीनें हमारे घर-महल हमें वापस कर दिये जायें जिनपर हम समाजहित और राष्ट्रहित के श्रेष्ठ कार्यों को संपादित कर जरूरतमंदों को रोजगार से जोड़ सकें | जिनसे हमारे पूर्वजों की रूह को सुकून हासिल हो सके |

सवाल- आप खुद को एक लाइन में कैसे परिभाषित करेगें?

जवाब- भारत के महान देशभक्त वीर सपूतों का ऐसा वंशज जो फिरंगियों के जुल्म एवं भारतसरकार की नजरंदाजी का मारा हुआ सच्चा ईमानदार देशभक्त हूँ |

सवाल- देश की सरकार और युवा जनता से क्या कहना चाहेगें?

जवाब- देश की सरकार से यही कहना चाहूंगा कि देश के सभी महान देशभक्तों के वंशजों को सम्मानित करें और स्वंय आकर सुध लें कि हम सब किस हाल में हैं और कैसे हैं | देश के युवाओं से सप्रेम यही कहना चाहूंगा कि वह मंदिर- मस्जिद की राजनीति को ध्यान न देकर देश को विकसित बनाने की टैक्नोलॉजी एवं शिक्षा पर ध्यान दें और अपना शानदार कैरियर बनाकर राष्ट्रनिर्माण में अपना योगदान दें | हम सब भारतीय है बस यही बात आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और स्वस्थ्य भारत दे सकें |

कवरेज :

ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक

Published in  sach ki dastak national magazine  .

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