पूरे देश में भव्यता से हुआ भगवान श्री चित्रगुप्त जी (कलम, दवात और तलवार) का पूजन – 

प्राचीन धर्मग्रंथों में वर्णित है कि श्री सूर्य नारायण से आरोग्य, भगवान शिव से ज्ञान, लक्ष्मी मां से ऐश्वर्य, हनुमान जी से शक्ति, कार्तिकेय जी से सैन्य सफलता, भैरव जी से निडरता और गणेश जी से मंगल व यश की कामना की जाती है।बिल्कुल ठीक उसी प्रकार जो सभी के दृढ़ लेखनी की इच्छा-कामना को सहज ही पूर्ण करते हैं, उनका नाम है श्री चित्रगुप्त जी जोकि समस्त ब्रह्मांड के जीवों के शुभ व अशुभ कर्मों का लेखा – जोखा लिखते हैं और सृष्टि के प्रथम न्यायाधीश धर्मराज कहलाते हैं। 

 ऐसे तो चित्रांश सहित कितने ही जन भगवान श्री चित्रगुप्त की नित्य आराधना किया करते हैं, पर हर वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को इनका वार्षिक उत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जाता है।

पद्य पुराण, स्कन्द पुराण, ब्रह्मपुराण, यमसंहिता व याज्ञवलक्य स्मृति सहित कितने ही धार्मिक ग्रंथों में भगवान चित्रगुप्त का विवरण आया है। श्री चित्रगुप्त जी की उत्पत्ति सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी की काया से हुई है। ब्रह्मा जी की काया से संबंध होने के कारण इस वंश को कायस्थ कहा गया। 

चित्रगुप्त जी की उत्पत्ति की एक और कथा है कि देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए समुद्र मंथन किया था, तो उसमें कुल 14 रत्नों की प्राप्ति हुई। उसी में लक्ष्मी जी के साथ श्री चित्रगुप्त जी की भी उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि श्री चित्रगुप्त जी ने ज्वालामुखी, चण्डी देवी व महिषासुर मर्दिनी की पूजा-अर्चना और साधना कर एक आदर्श कायम किया। देवलोक में श्री चित्रगुप्त की प्रतिष्ठा ‘धर्मराज’ के रूप में है।

ऐसे तो वैदिक काल से ही चित्रगुप्त जी की पूजा-अर्चना का भाव देखने को मिलता है, पर भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग अर्थात् गुप्तकाल से चित्रगुप्त की आराधना व्यापक रूप में होने लगी। उत्तर, दक्षिण, पूरब व पश्चिम भारत में विराजमान चार धामों के समान श्री चित्रगुप्त जी के चार धामों का भी उल्लेख आता है, जिनमें उज्जैन, कांचीपुरम, अयोध्या और पटना का नाम शामिल है। इन स्थानों पर चित्रगुप्त के प्राचीन आराधना स्थल विराजमान हैं। इसके अलावा खजुराहो, प्रयागराज, हैदराबाद, वाराणसी, भोपाल, रीवा, भरमौर, नई दिल्ली, मैहर, गुना, गया, बक्सर, भोपाल, कानपुर, जबलपुर, ग्वालियर, शिवपुरी, जगन्नाथपुरी, गोरखपुर आदि नगरों में भी चित्रगुप्त मंदिर स्थापित हं। कहीं इनका स्वतंत्र देवालय है, तो कहीं देवी मां, शिवशंकर या सूर्य नारायण के मंदिर में संयुक्त रूप से विराजमान हैं। चित्रगुप्त मुक्ति, भुक्ति, मोक्ष व यश के चतुर्मणि हैं, जिनकी आराधना कभी निष्फल नहीं जाती।

सामान्य रूप से चित्रगुप्त का आशय होता है, जो सबके हृदय मेें गुप्त रूप से उपस्थित हैं। आज आवश्यकता है कि हम अपने हृदय के चित्रगुप्त को जाग्रत करें, स्वयं भी पढ़ें और पूरे देश को शिक्षा के आलोक से दीप्तिमान करें। यही इस पर्व का मूल संदेश भी है जो कार्तिक शुक्ल यम द्वितीया के दिन अटूट श्रद्धा और अदम्य विश्वास के साथ पूरे देश में मनाया जाता है।

चार धामों के समान श्री चित्रगुप्त जी के चार धामों का भी उल्लेख आता है, जिनमें उज्जैन, कांचीपुरम, अयोध्या और पटना का नाम शामिल है। इन स्थानों पर चित्रगुप्त के प्राचीन आराधना स्थल विराजमान हैं। 

(आप सभी को भगवान चित्रगुप्त पूजन की हार्दिक बधाई और ढे़र सारी शुभकामनाएं, भगवान श्री चित्रगुप्त जी की कृपा सभी पर सदा बनी रहे।) 

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