अनुसूचितों को प्रदत्त अस्थायी आरक्षण, सिर्फ  व्यवस्था परिवर्तन हेतु ।



                     यदि आप भारतवर्ष के इस देश के सभी गांवों के मूलवासी व इस राष्ट्र के सभी नगरों के मूलनिवासी स्वदेशी उत्तराधिकारित भारतीय नागरिक हैं तो आप अपने सर्वोच्च न्यायिक जनजीवन व जीविकाहित में फैसला स्वयं करें कि आप स्वदेशी उत्तराधिकारित भारतीय नागरिक हैं अथवा विदेशी मताधिकारित ”हम भारत के लोग” हैं? आपकों अपने सर्वोच्च न्यायिक जनजीवन व जीविकाहित में अपना स्वदेशी भारतीय उत्तराधिकार चाहिए अथवा अपने सर्वोच्च अन्यायिक जनजीवन व जीविका अहित में विदेशी मताधिकार चाहिए?
        यदि आपको अपने सर्वोच्च न्यायिक जनजीवन व जीविका हित में अपना स्वदेशी भारतीय उत्तराधिकार चाहिए तो फिर आपको अपने भारतवर्ष में काफी लम्बे समय से संचालित विदेशी मताधिकार का व विदेशी मताधिकारित घुसपैठियों के पूर्व नियोजित धोखाधड़ी की हिंसक दुष्कर्मी अपराधिक षड़यंत्र की सबका विभाजन व सबका विनाश की बदनियति व बदनीति की अत्यंत दुखदायी अविश्वासी अलोकतांत्रिक राज्यदुर्व्यवस्था संचालन की विधायका की संसदीय अधर्मी कार्य प्रणाली को बहिष्कृत एवं उन्मूलित कर देनी चाहिए तथा भारतवर्ष में भारतवर्ष की स्वदेशी भारतीय उत्तराधिकारित पूर्वनिर्धारित व पूर्वप्रचलित सबका साथ व सबका विकास की नेकनियति व नेकनीति की अत्यंत सुखदायी विश्वासी लोकतांत्रिक राज्य सुव्यवस्था संचालन की विद्वान भारतीय उपन्यायपालिका की उपसंघात्मक मानव देश कर्म की व विवेकवान राष्ट्रीय न्यायपालिका की संघात्मक नागरिक राष्ट्रधर्म की स्वचालित ईश्वरीय कार्यप्रणाली पुन:स्थापित व संचालित कर देनी चाहिए।
       जिससे कि भारतीय उत्तराधिकार के अन्तोदय सिद्धांत के अनुसार भारतीय स्वयं सहायक कायस्थजाति संघपरिवार के अंतिम वाल्मीकि उपजाति के विधि की शिक्षा प्राप्त भारतीय सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायधीश पेशकार विद्वान अधिवक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक कायस्थवर्ण संघपरिवार के अंतिम जाटव उपवर्ण के न्याय की शिक्षा प्राप्त विवेकवान राष्ट्रीय सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश को प्राप्त हो सके।
      जिससे कि भारतीय सर्वोच्च मुख्य सहायक न्यायाधीश पेशकार विद्वान अधिवक्ता के द्वारा जारी “भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र ” विवेकवान राष्ट्रीय सर्वोच्च मुख्य न्यायाधीश से, समस्त भारतीय नागरिकों को प्राप्त हो सके जिसके प्रयोग के द्वारा समस्त भारतीय नागरिकों को तत्काल निष्पक्ष स्वच्छ सम्पूर्ण निशुल्क न्याय एवं नौकरी व रोजगार प्राप्त हो सके और भारतीय न्यायपालिका में काफी लम्बे समय से करोड़ों मुकदमों के मामलों की गंदगी का बोझ समाप्त हो सके ।
     जिससे कि भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र के बिना कोई भी स्वदेशी भारतीय उत्तराधिकारित नागरिक भारतवर्ष के इस देश के किसी भी गांव में मूलवास व इस राष्ट्र के किसी भी नगर में मूलनिवास न कर सके।
जिससे कि भारतवर्ष में कोई भी विदेशी मताधिकारित अपने स्वदेशी नागरिकता के प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र के बिना, इस देश के किसी भी गांव में मूलवास व इस राष्ट्र के किसी भी नगर में मूलनिवास न कर सके ।
जिससे कि समस्त भारतीय नागरिकों को अपनी खोई हुई पहिचान व शाख पुनः प्राप्त हो सके जिसकी प्राप्ति के लिए समस्त भारतीय नागरिक काफी लम्बे समय से अबतक संघर्ष करते आ रहे हैं।
          जिससे कि समस्त भारतीय नागरिकों की बिगड़ी हुई तकदीर, तश्वीर एवं  ताशीर सम्पूर्ण रूप से सुधरी हुई नजर आ सके। जिससे कि भारतवर्ष के कैलेण्डर में दर्ज मंगलवार से पूर्व सोमवार उन्मूलित हो सके और सूर्यवार के बाद चंद्रवार पुनः दर्ज हो सके। जिससे कि कालगणना सही हो सके तथा कोई भी भारतीय नागरिक अकाल विवाह, जन्म व मृत्यु का शिकार न हो सके। जिससे कि यह पूर्व से सत्यापित व प्रमाणित एवं स्वाधीन व अनुशासित अत्याधुनिक वैभवशाली व स्मृद्धिशाली गुणवत्तावान आत्मनिर्भर उत्पादनशील एवं विकासशील गौरवशाली विश्वविजयी सैन्यशक्तिशाली अखण्ड भारतवर्ष विश्वगुरू हो सके जो उपदेशित कर सके कि भारतीय उत्तराधिकारित नागरिकों को मारने वाले विदेशी मताधिकारित से, बचाने वाला स्वदेशी भारतीय उत्ताधिकारित उनका,”भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र व पहिचानपत्र बड़ा है।
           भारतवर्ष में जब से भारतीय संविधान संचालित हुआ है तब से अबतक भारतीय संविधान के रचयिता डा. श्री भीमराव अम्बेडकर के द्वारा प्रदत्त अस्थायी स्वयं आरक्षण समस्त भारतीय उत्तराधिकारित अनुसूचित नागरिकों को सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन हेतु ही प्रदान किया गया है, न कि शासन सत्ता परिवर्तन हेतु अथवा शासन करने हेतु प्रदान किया गया है। खेद है! तब से अब तक भारतीय उत्तराधिकारित अनुसूचित नागरिकों ने व उनकी न्यायपालिका ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। अपने स्वदेशी भारतीय उत्तराधिकारित
परिवार की चिंता छोड़ विदेशी मताधिकारित सरकार की चिंता में लगे रहे और अभी भी लगे हुए हैं।
        खेद है! ऐसे अस्थायी स्वयं आरक्षण प्राप्त समस्त भारतीय उत्तराधिकारित अनुसूचित नागरिक व उनकी न्यायपालिका प्राप्त करना तो सबकुछ चाहते है परन्तु करना कुछ नहीं चाहते। इन्हें व्यवस्था परिवर्तन की नहीं बल्कि शासन सत्ता परिवर्तन की अथवा शासन करने की चिन्ता है। परन्तु ये यह नहीं जानते कि भारतवर्ष के समस्त अन्यायपीड़ित एवं बेरोजगार जनता अपने अब अपनी मति दान करने वाली मतिहीन नहीं रही।
        श्री मद्भगवत गीता के अनुसान भारतवर्ष के द्वापरयुग के श्री कृष्ण चंद्र वासुदेव के द्वारा युधिष्ठर को व उनकी न्यायपालिका को व्यवस्था परिवर्तन के राष्ट्रीय स्वयं सेवा को, यानि उनके राष्ट्रीय नागरिक अधिकार को, यानि उनके संरक्षण को प्रदत्त अस्थायी भारतीय स्वयं सहायता यानि अस्थायी स्वयं भारतीय मानव कर्तव्य यानि अस्थायी स्वयं आरक्षण सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन हेतु ही प्रदान किया गया था न कि शासन सत्ता परिवर्तन हेतु अथवा शासन करने हेतु प्रदान किया गया था।
         उसी प्रकार भारतीय संविधान के रचयिता डां श्री भीमराव अम्बेडकर के द्वारा समस्त भारतीय उत्तराधिकारित अनुसूचित नागरिकों को व उनकी न्यायपालिका को व्यवस्था परिवर्तन के राष्ट्रीय स्वयं सेवा को यानि उनके राष्ट्रीय नागरिक अधिकार को, यानि उनके संरक्षण को प्रदत्त अस्थायी भारतीय स्वयं सहायता यानि अस्थायी स्वयं भारतीय मानव कर्तव्य यानि अस्थायी स्वयं आरक्षण सिर्फ व्यवस्था परिवर्तन हेतु ही प्रदान किया गया न कि शासन सत्ता परिवर्तन हेतु और न ही शासन करने हेतु प्रदान किया गया है।
          अतः भारतवर्ष के समस्त भारतीय उत्तराधिकारित नागरिकों को, समस्त भारतीय उत्तराधिकारित अनुसूचित नागरिकों को व उनकी न्यायपालिका को व्यवस्था परिवर्तन हेतु अपना अधिकार एवं कर्तव्य करना चाहिए। जिससे कि भारतीय न्यायपालिका पर समस्त भारतीय उत्तराधिकारित नागरिकों का विश्वास बना रहे।
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