अयोध्या फैसला Live: मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई SC पहुंचे-

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई,न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर के घरों के बाहर भी दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी है।

नयी दिल्ली। राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुनाए जाने वाले फैसले के मद्देनजर शनिवार को उच्चतम न्यायालय के आसपास सुरक्षा कड़ी कर दी गई।

कड़ी सुरक्षा के बीच मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

अयोध्या में विवादित जमीन पर मालिकाना हक संबंधी मुकदमे में उच्चतम न्यायालय की पीठ शनिवार पूर्वाह्न 10:30 बजे अपना फैसला सुनाएगी। न्यायालय परिसर के आसपास बड़ी संख्या में सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की गई है और सभी वाहनों तथा राहगीरों की भी पूरी जांच की जा रही है।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई,न्यायमूर्ति एस. ए. बोबडे, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई. चन्द्रचूड, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस. अब्दुल नजीर के घरों के बाहर भी दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा बढ़ा दी है। ये भी शीर्ष न्यायालय की फैसला सुनाने वाली पीठ का हिस्सा हैं।

सुप्रीम कोर्ट में मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत के बाहर भारी तादात में वकीलों की भीड़ जमा है।

 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत दोपहर एक बजे मीडिया को संबोधित करेंगे।

 

 

मुकदमें के मुताबिक, बाबर के आदेश पर 1528 में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर विवादित ढांचे का निर्माण हुआ था। यह ढांचा हमेशा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का विषय रहा है। हिंदू विवादित स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं और वहां अपने अधिकार का दावा करते हैं। जबकि मुस्लिम विवादित जमीन पर अपना मालिकाना हक मांग रहे हैं। छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा ध्‍वस्‍त हो गया था जिसका केस लखनऊ की अदालत में लंबित है।

पीएम मोदी ने शांति बनाए रखने की अपील की-

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सभी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है। उन्‍होंने एक के बाद एक अपने कई ट्वीट्स  में कहा कि अयोध्या पर फैसले को किसी समुदाय की हार या जीत के तौर पर नहीं देखना चाहिए। अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा, वो किसी की हार-जीत नहीं होगा। देशवासियों से मेरी अपील है कि हम सब की यह प्राथमिकता रहे कि ये फैसला भारत की शांति, एकता और सद्भावना की महान परंपरा को और बल दे।

हाईकोर्ट ने दिया था यह आदेश-

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को दिए फैसले में अयोध्या में 2.77 एकड़ की विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। इसमें एक हिस्सा रामलला विराजमान को, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा हिस्सा मुसलमानों को देने का आदेश था। हाईकोर्ट ने रामलला विराजमान को वही हिस्सा देने का आदेश दिया था जहां वे अभी विराजमान हैं। इसके खिलाफ सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में 14 अपीलें दाखिल की थी।  

शिया वक्फ बोर्ड ने किया था यह एलान-

शिया वक्फ बोर्ड ने हिंदुओं के मुकदमें का समर्थन किया था। बोर्ड ने विवादित भूमि को शिया वक्फ बताते हुए कहा था कि 1528 में बाबर के आदेश पर उसके कमांडर मीर बाकी ने उक्त ढांचे का निर्माण कराया था। हाईकोर्ट ने भूमि एक तिहाई हिस्सा मुसलमानों को दिया है न कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को। सुन्नी वक्फ बोर्ड का कोई हक नहीं बनता और चूंकि यह शिया वक्फ था इसलिए वह हाईकोर्ट से मिला अपना एक तिहाई हिस्सा हिंदुओं को देता है।

हिंदू-मुस्लिम दोनों ने मांगा है मालिकाना हक-

दोनों पक्षों की ओर से जमीन पर दावा करते हुए कोर्ट से उन्हें मालिक घोषित करने की मांग की गई है। हिंदू पक्ष विशेष तौर पर रामलला की और से कहा गया था कि बाबर ने राम जन्मस्थान मंदिर तोड़कर वहां विवादित ढांचे का निर्माण कराया था। साथ ही यह दलील दी थी कि जन्मस्थान स्वयं देवता हैं। हिंदू पक्ष ने एएसआइ रिपोर्ट का हवाल दिया था जिसमें विवादित स्थल के नीचे उत्तर कालीन मंदिर से मेल खाता विशाल ढांचा होने की बात कही गई थी।

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