80%लकवाग्रस्त नहीं मानी हार, देश के सबसे कम उम्र के पेटेंट धारक हैं हृदयेश्वर

कहते हैं मन के जीते, जीत है मन के हारे हार.. मन की शक्ति से सबकुछ हासिल है। इन्हीं लाईनों को सच कर के दिखाया है – 17 साल के हृदयेश्वर सिंह भाटी ने। ह्रदयेश्वर जब सिर्फ चार साल के थे तो चलते-चलते अचानक गिर पड़े और मांसपेशियों की लाइलाज बीमारी ड्यूशिन मस्कुलर डिस्ट्रोफी के शिकार हो गए।

इस बीमारी ने उनके 80 फीसद शरीर को लकवाग्रस्त कर दिया। हृदयेश्वर आज उपलब्धियों का आसमान नाप लिया है।

इस गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति भवन में उन्हें राष्ट्रीय बाल शक्ति पुरस्कार से सम्मानित करेंगे और वो दिल्ली में जनपथ में निकलने वाली राष्ट्रीय परेड का हिस्सा भी बनेंगे।अपनी पावर व्हीलचेयर पर बैठे हृदयेश्वर प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग की याद दिलाते हैं। हृदयेश्वर उन्हें प्रेरणास्नोत मानते हैं। बैठे-बैठे कुछ सोचना और फिर उस पर काम शुरू कर देना, यह हृदयेश्वर की आदत में शामिल है।

इसी के चलते वे तीन गोलाकार शतरंज बना चुके हैं और इनके पेटेंट भी उनके पास है। इसी आविष्कार ने उन्हें देश का सबसे छोटा पेटेंट धारक बना दिया है। क्योंकि सिर्फ नौ साल की उम्र में उन्होंने छह खिलाड़ियों के खेलने वाला गोलाकार शतरंज बना लिया था। इसके बाद उन्होंने 12 और 60 खिलाड़ियों के साथ खेलने वाला गोलाकार शतरंज भी बना डाला।

ऐसे मिली प्रेरणा : 

हृदयेश्वर बताते हैं कि वे अपने पिता के साथ शतरंज खेल रहे थे। कुछ दोस्त आए और वो भी खेलना चाहते थे। बस यहीं से ज्यादा लोगों के खेल सकने वाला शतरंज बनाने का आइडिया दिमाग में आया। इन आविष्कारों के कारण दुनिया भर में 100 अलग-अलग तरह के शतरंज बनने लगे। नतीजतन भारत अलग-अलग शतरंज वेरिएंट के आविष्कारों की संख्या में विश्व में शीर्ष पर पहुंच गया।

टीम सच की दस्तक राष्ट्रीय मासिक पत्रिका वाराणसी उत्तर प्रदेश की तरफ़ से हृदयेश्वर को ढ़ेर सारी बधाई और शुभकामनाएं

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