विश्व शांति के प्रयास जरूरी है। _डॉ. याहया दाबुश, यमन

सचमुच में आज मनुष्य विनाश के कगार पर खड़ा मृत्यु की गोद में धड़ाधड़ चला जा रहा है। मनुष्य ने मनुष्य को अपने स्वार्थों से जकड़ लिया है। उसे आज कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। उसे केवल स्वार्थ दिखाई दे रहा है। वह इस स्वार्थ की पूर्ति के लिए आज भयानक और कठिन से कठिन अस्त्र-शस्त्रों को होड़ लगाए जा रहा है। आज इसीलिए मनुष्य सर्वविनाश के लिए अणुबम, परमाणु बम आदि बना बनाकर के अपनी अपार शक्ति का परिचय दे रहा है। यह अशान्तमय और भयानक वातावरण का निर्माण करने में लगा हुआ सब कुछ भूल चुका है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है। इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व एक बहुत बड़ी अशान्ति के दौर में पहुंच चुका है।

विश्व शान्ति के लिए हमें प्रयास करना चाहिए कि हम भौतिकता के बने जंगल से आध्यात्मिकता के सपाट मैदान की ओर लौट आएँ। इस अर्थ में हमें अपने पुरातन काल के ऋषियों और मुनियों के अलौकिक और दिव्य जीवन संदेश को समझना होगा। उनका हमें अनुसरण करना होगा। विश्व शान्ति के प्रयास में हमें महान दार्शनिकों और महात्माओं के जीवन सिद्धान्तों और आचरणों को अपनाना होगा। उनके अनुसार चलना होगा। इसके परिणामों को हमें समझ करके दूसरे को इससे प्रभावित करना होगा, तभी विश्वशान्ति का सार्थक और ठोस प्रयास होगा।

आज यह सौभाग्य का विषय है कि विश्व के कई बड़े राष्ट्र विश्व शान्ति के प्रयास की दिशा में प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं। प्रथम विश्वयुद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के भयंकर परिणामों और इससे प्रभावित आज के जीवन स्वरूपों पर भी विचार किए जा रहे हैं। इसके लिए कई ठोस और प्रभावशाली कदम उठाए गए हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना इसी दृष्टिकोण का परिणाम है। इससे पारस्परिक झगड़े और संघर्षों को हल किया जाता है। इसी तरह का कुछ और उद्योग और प्रयास विश्व स्तर पर होना चाहिए। विश्व के जो पिछड़े और दुखी राष्ट्र हैं, उनको हर प्रकार की सुविधाएँ प्रदान करने के लिए हमें विश्व स्तर पर कोई संयुक्त संस्था की स्थापना अवश्य करनी चाहिए।

यह विडम्बना ही है कि उन्नत औद्योगिक समाज से ही गम्भीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं । विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने कई क्षेत्रों में चमत्कार कर दिखाया है, लेकिन बुनियादी मानव समस्याएं वैसे की वैसी ही बनी हुई हैं । साक्षरता दर में अभूतपूर्व तरीके से वृद्धि हुई है, इसके बाबुजूद सार्वभौमिक शिक्षा से अच्छाई आने की अपे क्षा मानसिक अशान्ति और असन्तोष में वृद्धि हुई है ।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि दिन-प्रतिदिन हमारे भौतिक विकास में वृद्धि हो रही है और प्रौद्योगिकी उन्नत हो रही है । लेकिन यह काफी नहीं है; क्योंकि हम सुख-शान्ति लाने या दु:खों से निजाद पाने में कामयाब नहीं हुए है । हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि हमारी प्रगति और विकास में कोई गम्भीर कमी है और यदि हम वक्त रहते इस कमी को दूर नहीं करेंगे तो मानवता के भविष्य के लिए इसके घातक परिणाम निकल सकते हैं ।

मैं विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विरुद्ध बिकुल नहीं हू; क्योंकि इन्होंने मानव जाति के विकास भौतिक सुख और कल्याण में अमूल्य योगदान किया है । इनसे हमें अपनी दुनिया को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिली है । लेकिन यदि हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर आवश्यकता से अधिक बल देंगे तो मनुष्य ज्ञान और समझ के उन पहलुओं से विमुख हो सकते हैं, जो हमें ईमानदारी और परोपकार की ओर ले जाते हैं ।

हालांकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में असीमित भौतिक सुख के निर्माण का सामर्थ्य है, लेकिन वे विश्व सभ्यता को आकार देने वाले सदियों पुराने आध्यात्मिक और लोकोपकारी मूल्यों का स्थान नहीं ले सकते । विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अभूतपूर्व लाभ से कोई भी व्यक्ति इनकार नहीं कर सकता । लेकिन बुनियादी मानव समस्याएं वैसे की वैसी ही बनी हुई है ।

Written by_✒️Dr. Yahya Dabush, Famous journalist in Iraq.

Director of the Office of International Newspapers, the Danish Media Network

Director of the Media Corporation office in Iraq.Al-Rai Today newspaper, London.

And Arab and international newspapers.

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