ऑस्‍कर अकादमी के प्रेसीडेंट जॉन बैली द्वारा ‘डिजिटल डिलेमा’ का हिंदी संस्‍करण लांच –

मंगलवार 28 मई को नई दिल्‍ली में एक विशेष समारोह में मोशन पिक्चर आर्टस एंड सांइसेज (ऑस्‍कर अकादमी के रूप में लोकप्रिय) के प्रेसीडेंट जॉन बैली ने अकादमी प्रकाशन ‘डिजिटल डिलेमा’ के हिंदी संस्‍करण का ई लांच किया। इस अवसर पर जाने माने फिल्‍म एडीटर तथा अकादमी की गवर्नर कैरोल लिटिलटन, एफसीएटी के अध्‍यक्ष न्‍यायमूर्ति मनमोहन सरीन, सूचना और प्रसारण मंत्रालय के सचिव अमित खरे, सीबीएफसी के अध्‍यक्ष प्रसून जोशी अकादमी के सदस्‍य उज्‍जवल निरगुडकर तथा एनएफएआई के निदेशक प्रकाश मगदम उपस्थित थे।

जॉन बैली ने अपने भाषण में कहा कि भारत की फिल्‍म बिरादरी तक पहुंचने के लिए अकादमी प्रकाशन का हिंदी में अनुवाद महत्‍वपूर्ण है। फिल्‍म संग्रह माध्‍यम में टेक्‍नोलॉजी से हुए परिवर्तनों के कारण अनेक चुनौतियां आई हैं और यह पुस्‍तक प्रारंभ से डिजिटल सामग्री के संग्रहण को समझने और नियोजन में फिल्‍मकारों को सहायता देगी। डिजिटल डिलेमा पुस्‍तक मिल्‍ट शेल्‍टन तथा ऐंर्डी मालट्ज की लिखित पुस्‍तक है और विश्‍वभर में अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया है। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का संगठन राष्‍ट्रीय फिल्‍म संग्रहालय फिल्‍म संरक्षण, सुरक्षा तथा पुन:स्‍थापन का कार्य करता है। संग्रहालय ने अकादमी के साथ प्रकाशनों के हिंदी अनुवाद के लिए समझौता किया है ताकि देश में विभिन्‍न हितधारकों को लाभ मिल सके।

अकादमी मोशन पिक्‍चर्स की कला और विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए कार्य करती है।

अकादमी की विज्ञान तथा टेक्‍नोलॉजी परिषद ने अपनी एक महत्‍वपूर्ण रिपोर्ट में यह पता लगाया कि कौन-कौन से बड़े मूवी प्रतिष्‍ठान, डिजिटल डाटा के संग्रहण और डाटा एक्‍सेस का कार्य कर रहे हैं। वर्षों बाद परिषद ने पाया कि डिजिटल संग्रहण की विश्‍वसनीयता का विषय काफी व्‍यापक है। इस पुस्‍तक में सक्षम रूप से अभिलेख तैयार करने की चुनौतियों और दीर्घकालिक दृष्टि से बड़े डाटा एक्‍सेस की चुनौतियों की चर्चा की गई है।

● भारत कथाकारों की भूमि; भारतीय फिल्‍म निर्माताओं को निजी कथाएं तेजी से बताने पर ध्‍यान देना चाहिए : जॉन बैली

सिनेमा में सहयोग की संभावनाओं का पता लगाने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज के अध्यक्ष जॉन बैली के साथ नई दिल्‍ली के सिरी फोर्ट ऑडिटोरियम में बातचीत के विषय सत्र का आयोजन किया। सत्र के बाद श्री बैली ने प्रेस के साथ बातचीत की।

सत्र में जॉन बैली ने एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज में भारतीयों की सदस्‍यता बढ़ाने की आवश्‍यकता के बारे में चर्चा की। उन्‍होंने एकेडमी में विविध सदस्‍यों की संख्‍या दोगुनी करने की एकेडमी की पहल को उजागर किया और कहा कि भारत अवसरों, चुनौतियों और विविधता को एकजुट करने का प्रतिनिधित्‍व करता है। इस बातचीत के जरिए अनेक जन संचार मीडिया संस्‍थानों से आए उभरते फिल्‍म निर्माताओं और छात्रों को न केवल एकेडमी के अध्‍यक्ष जॉन बैली बल्कि मास्‍टर सिनेमेटोग्राफर जॉन बैली से भी बातचीत का अवसर मिला। बातचीत के दौरान न केवल फिल्‍म तकनीक की अग्रणी अवस्‍था में कला की बारीकियों पर प्रकाश डाला गया, बल्कि विश्‍व स्‍तर की विषय वस्‍तु तैयार करने के बारे में भी समझ विकसित करने में सहयोग किया गया। श्री बैली ने उन पर महिला सिनेमेटोग्राफरों के प्रभाव के बारे में भी बातचीत की। भारत की कथाकारों की भूमि के रूप में सराहना करते हुए उन्‍होंने इस बात पर जोर दिया कि फिल्‍म निर्माता निजी कथाओं को तेजी से बताएं। उन्‍होंने एकेडमी के साथ गहरे सहयोग की दिशा में भारत द्वारा दिखाए गए उत्‍साह और उत्‍सुकता की भी सराहना की।

सूचना और प्रसारण सचिव अमित खरे ने भारत में बड़ी संख्‍या में प्रतिभाओं के होने और क्षेत्रीय भाषा में बनाई जा रही फिल्‍मों में तेजी का जिक्र किया। उन्‍होंने विभिन्‍न राज्‍यों के उभरते हुए फिल्‍म निर्माताओं के सामने रखे जा रहे प्रोत्‍साहनों की जानकारी दी और आशा व्‍यक्‍त की कि श्री बैली और एकेडमी के साथ जुड़ाव से दुनिया भर में भारतीय फिल्‍म निर्माताओं की कला के प्रदर्शन में मदद मिलेगी।

फिल्‍म प्रमाण पत्र और अपीलीय न्‍याधिकरण के अध्‍यक्ष न्‍यायमूर्ति मनमोहन सरीन ने सिनेमेटोग्राफर के रूप में जॉन बैली की उपलब्धियों को सर्वोत्‍कृष्‍ट बताया।

सीबीएफसी के अध्‍यक्ष प्रसून जोशी ने बताया कि किस प्रकार सिनेमा भारत में रोजमर्रा के जीवन का हिस्‍सा बन चुका है, यहां तक कि जीवन का दर्शन भी सिनेमा से ही उत्‍पन्‍न होता है। उन्‍होंने वर्तमान रुझान ‘सिनेमा लोकतंत्र’ की तरफ – भारत में प्रौद्योगिकी के जरिए सिनेमा का लोकतंत्रीकरण और उसकी बढ़ती पहुंच की जानकारी दी। उन्‍होंने भारतीय सिनेमा में भावनाओं और संगीत के महत्‍व की भी चर्चा की, जो पश्चिमी देशों के सिनेमा से हटकर है। उन्‍होंने सामूहिक रूप से सिनेमा को देखने के महत्‍व की चर्चा की और भारत के अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह जैसे उत्‍सवों का भी महत्‍व बताया।

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