ज्ञानवापी का इतिहास और विवाद – मृदुला श्रीमाली (यूपी हैड)

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद 31 साल से अदालत में है।29 साल 4 चार महीने और 10 दिन बाद खुलें मस्जिद के बंद कमर्रों के ताले। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद 31 साल से अदालत में है. ये मामला पहली बार 1991 में अदालत में गया था. हिंदू पक्ष का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी, इसलिए यहां दोबारा मंदिर के निर्माण की इजाजत दी जाए।
2021 में 5 महिलाओं ने ज्ञानवापी पर दाखिल की याचिका – 
दिल्ली की रहने वाली राखी सिंह और बनारस की रहने वाली लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक की ओर ने वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिवीजन की कोर्ट में 18 अगस्त 2021 में एक याचिका दाखिल की।
इसमें कहा गया कि ज्ञानवापी परिसर में हिंदू देवी-देवताओं का स्थान है। ऐसे में ज्ञानवापी परिसर में मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन की अनुमति दी जाए। इसके साथ ही परिसर स्थित अन्य देवी-देवताओं की सुरक्षा के लिए सर्वे कराकर स्थिति स्पष्ट करने की बात भी याचिका में कही गई।
मां शृंगार गौरी का मंदिर ज्ञानवापी के पिछले हिस्से में है। 1992 से पहले यहां नियमित दर्शन-पूजन होता था। बाद में सुरक्षा व अन्य कारणों के बंद होता चला गया। अभी साल में एक दिन चैत्र नवरात्र पर शृंगार गौरी के दर्शन-पूजन की अनुमित होती है।
ज्ञानवापी मामले में कोर्ट का फैसला आ गया है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 17 मई के पहले दोबारा सर्वे होगा। साथ ही कोर्ट कमिश्नर नहीं हटाने का आदेश दिया है।ज्ञानवापी मामले में सर्वे कमिश्नर अजय मिश्र नहीं हटाए जाएंगे। कोर्ट ने दो और सहायक कमिश्नर नियुक्त किए हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि 17 मई से पहले सर्वे किया जाएगा।
जिलाधिकारी सर्वे की कार्रवाई सुनिश्चित कराएं: कोर्ट
संपूर्ण भाग में रकबा नंबर 9130 में सर्वे होना है। पूरे ज्ञानवापी का सर्वे होगा तहखाना  भी खोला जाएगा। सर्वे के दौरान डी जी की निगरानी ज्ञानवापी पर रहेगी। 1991 से अदालत में है काशी का ये विवाद
हिंदुओं की मांग- मंदिर बनाने की इजाजत मिले। मुस्लिम पक्ष की दलील- यहां कभी मंदिर नहीं था। ज्ञानवापी में तीसरे दिन सर्वे पूरा:हिंदू पक्ष का दावा- अंदर बाबा मिल गए, मुस्लिम पक्ष ने कहा- ऐसा कुछ नहीं। वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर का सर्वे तीसरे दिन सोमवार को पूरा हो गया। कल सिविल जज सीनियर डिवीजन रवि कुमार दिवाकर की कोर्ट में रिपोर्ट सौंपी जाएगी। सर्वे के बाद हिंदू पक्ष के पैरोकार डॉ. सोहनलाल बाहर आए तो उन्होंने बड़ा दावा किया। कहा, ‘अंदर बाबा मिल गए… जिन खोजा तिन पाइयां। तो समझिए, जो कुछ खोजा जा रहा था, उससे कहीं अधिक मिला है। अब पश्चिमी दीवार के पास जो 75 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 15 फीट ऊंचे मलबे के सर्वे की मांग उठाएंगे।’
मुस्लिम पक्ष सर्वे से संतुष्ट-
उधर, मुस्लिम पक्ष के वकील ने हिंदू पक्ष के दावों का खारिज किया। वकील ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं मिला। हम सर्वे से संतुष्ट हैं। कल, यानी 17 मई को कोर्ट में रिपोर्ट सौंपी जाएगी। बता दें कि एडवोकेट कमिश्नर के नेतृत्व में वादी-प्रतिवादी पक्ष के 52 लोगों की टीम सुबह 8 बजे परिसर में एंट्री की। करीब 10:30 बजे सर्वे खत्म हुआ। हिंदू पक्ष के पैरोकार डॉ. सोहनलाल ने कहा कि नंदी जिसकी प्रतीक्षा कर रहे थे वह शिवलिंग मिल गए। इतिहासकारों ने जो लिखा था, वह सही था। जैसे ही बाबा मिले वैसे ही अंदर हर-हर महादेव का उद्घोष हुआ। डीएम कौशलराज शर्मा ने कहा कि सर्वे को लेकर अगर किसी ने कोई बात कही है या किसी बात का दावा किया है तो यह उनकी व्यक्तिगत राय हो सकती है। कोर्ट कमिश्नर द्वारा रिपोर्ट पेश करने के बाद कोई भी बात कोर्ट की ओर से ही बताई जाएगी। किसी की निजी बात या राय पर किसी को कोई ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।
सर्वे के दौरान क्या-क्या हुआ –
सूत्रों के हवाले से खबर आई कि सर्वे में शामिल एक व्यक्ति को अंदर की खबर लीक करने के आरोपों में हटाया गया है। सर्वे के तीसरे दिन पर CM योगी खुद नजर रखे रहे, प्रमुख सचिव गृह अवनीश अवस्थी से उन्होंने जानकारी ली। ज्ञानवापी के गुंबद की वीडियोग्राफी हुई। इसकी बनावट की हाई लैंस कैमरे से फोटोग्राफी भी की गई। कल भी इसका सर्वे किया गया था। ज्ञानवापी के 500 मीटर के दायरे में पब्लिक की एंट्री बैन रही। चारों तरफ से आने वाले रास्तों पर पुलिस-पीएचसी का पहरा रहा। सर्वे के तीसरे दिन ज्ञानवापी की सुरक्षा बढ़ा दी गई। 16 लेयर की सुरक्षा रही। पहले दिन 10 लेयर, जबकि दूसरे दिन 12 लेयर की थी। विसेन के नेतृत्व में ही पिछले साल 5 महिलाओं ने कोर्ट में परिसर का सर्वे कराने की याचिका दायर की थी। मंगलवार को कोर्ट में सौंपी जानी है रिपोर्ट।
17 मई, यानी मंगलवार को सर्वे की रिपोर्ट वाराणसी कोर्ट में सौंपी जानी है। अब तक के सर्वे में जो कुछ मिला है एडवोकेट कमिश्नर अजय मिश्र इसकी रिपोर्ट बनाएंगे। सर्वे में जो भी वीडियोग्राफी-फोटोग्राफी हुई है उसकी चिप परिसर के बाहर निकलने से पहले ही अफसरों को सौंप दी जाती थी, ताकि उसके लीक होने का संभावना न हो। ज्ञानवापी विवाद मामले में आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी सुनवाई है। एक विवाद से जुड़ी 3-3 याचिकाएं दाखिल हैं। 6 याचिकाओं पर सुनवाई होनी है।
काशी विश्वनाथ दर्शन के लिए गेट नंबर-1 पर लंबी लाइन। सर्वे के दौरान ज्ञानवापी के पास वाले गेट नंबर-4 से काशी विश्वनाथ मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया। ऐसे में गोदौलिया के दशाश्वमेध की ओर जाने पर गेट नंबर-1 से श्रद्धालुओं की एंट्री दिलाई गई। गेट नंबर एक से लेकर गोदौलिया चौराहे तक करीब 400 मीटर लंबी लाइन देखी गई। एक किलोमीटर के दायरे में करीब 1500 पुलिस और पीएचसी के जवानों की ड्यूटी लगाई गई। 500 मीटर के दायरे में सुरक्षा में जवान मुस्तैद रही, छतों पर फोर्स तैनात कर दी गई। आसपास की दुकानों को सर्वे होने तक बंद रखा गया।
विजय शंकर बोले- हमें हमारे 100 फीट के ज्योतिर्लिंग आदिविश्वेश्वर चाहिए।
प्राचीन मूर्ति स्वयंभू ज्योतिर्लिंग लॉर्ड विश्वेश्वरनाथ के वाद मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने ‘दैनिक भास्कर’ से सोमवार को कहा कि हमें हमारे 100 फीट के आदिविश्वेश्वर चाहिए। उनको आक्रमणकारियों ने जमीन में दबा कर ऊपर से मसाला डाल दिया था। इसीलिए, हमने अदालत में मांग की थी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से रडार तकनीक से पूरे ज्ञानवापी परिसर का सर्वे कराया
अब तक सर्वे में क्या-क्या हुआ। सर्वे के पहले दिन यानी 14 मई को ज्ञानवापी परिसर के 50% हिस्से का सर्वे हुआ था। उस दिन 4 घंटे के सर्वे के दौरान 4 तहखानों को खोला गया था। तहखानों की साफ-सफाई कराई। इसके बाद टीम ने उसकी वीडियोग्राफी करवाई। दीवारों की नक्काशी चेक की।दूसरे दिन 15 मई को परिसर का 30% और सर्वे हुआ। इस दिन भी 4 घंटे सर्वे हुआ था। ज्ञानवापी परिसर के ऊपरी बने हुए कमरों, गुंबद, छत और दीवारों की वीडियोग्राफी कराई गई थी। इसके अलावा, दरवाजों की नक्काशी का भी हाई लैंस वाले कैमरे से पिक्चर ली गई थी।
हिंदू पक्ष बोला- दावा मजबूत हुआ, मुस्लिम पक्ष का कहना- कुछ नहीं मिला। अब तक के सर्वे में क्या-क्या मिला है। इस बारे में कोई पुष्ट जानकारी नहीं है। हालांकि, रविवार को सर्वे करके बाहर निकले हिंदू पक्ष के वादी ने अपने हक में दावा किया था। उन्होंने कहा था कि हमारा दावा दिनों-दिन और भी मजबूत होता जा रहा है।
दूसरी तरफ सर्वे करके बाहर आए मुस्लिम पक्ष के वकील ने मीडिया से तीन बार ऊंची आवाज में कहा था- कुछ नहीं मिला, कुछ नहीं मिला, कुछ नहीं मिला…। इतना कहते हुए वह चले गए। उधर, अफसरों का कहना है कि वकीलों का कहना है कि सर्वे जब तक पूरा नहीं हो जाता है, इस पर कुछ कमेंट करना उचित नहीं है।
अब जानते है पूरा विवाद – क्या अयोध्या के बाद अब काशी की बारी है? ऐसा इसलिए क्योंकि कुछ दिनों से वाराणसी में हलचल तेज है। कारण है काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद। काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद फिलहाल अदालत में है। पिछले साल अगस्त में 5 महिलाओं ने वाराणसी की स्थानीय अदालत में एक वाद दायर किया था। इसमें महिलाओं ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में स्थित श्रृंगार गौरी मंदिर समेत कई विग्रहों में पूजन-दर्शन की इजाजत देने और सर्वे कराने की मांग की थी। इसी वाद पर अदालत ने यहां सर्वे करने की इजाजत दी थी। कोर्ट के आदेश पर अब सर्वे हो चुका है, लेकिन इससे काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को हवा मिल गई है।काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का केस 31 साल से अदालत में है। जबकि, ज्ञानवापी मस्जिद का इतिहास 350 साल से भी ज्यादा पुराना है. सबसे पहले जानते हैं कि ये पूरा मामला क्या है?
क्या है विवाद की जड़?
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद काफी हद तक अयोध्या विवाद जैसा ही है। हालांकि, अयोध्या के मामले में मस्जिद बनी थी और इस मामले में मंदिर-मस्जिद दोनों ही बने हुए हैं. काशी विवाद में हिंदू पक्ष का कहना है कि 1669 में मुगल शासक औरंगजेब ने यहां काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनाई थी। हालांकि, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां मंदिर नहीं था और शुरुआत से ही मस्जिद बनी थी।
इस मामले में हिंदू पक्ष की तीन बड़ी मांगें हैं…
– पहलीः अदालत पूरे ज्ञानवापी परिसर को काशी मंदिर का हिस्सा घोषित करे।
– दूसरीः मस्जिद को ढहाने का आदेश जारी हो और मुस्लिमों के यहां आने पर प्रतिबंध लगे।
– तीसरीः हिंदुओं को यहां पर मंदिर का पुरर्निर्माण करने की अनुमति दी जाए।
अब जानिए, इस विवाद में कब-कब क्या हुआ?
– 1919 : स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से वाराणसी कोर्ट में पहली याचिका दायर हुई। याचिकाकर्ता ने ज्ञानवापी परिसर में पूजा करने की अनुमति मांगी।
– 1998 : ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमान इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। कमेटी ने कहा कि कानून इस मामले में सिविल कोर्ट कोई फैसला नहीं ले सकती। हाईकोर्ट के आदेश पर सिविल कोर्ट में सुनवाई पर रोक लगी। 22 साल तक ये केस पर सुनवाई नहीं हुई।
2019 : स्वयंभू ज्योतिर्लिंग भगवान विश्वेश्वर की ओर से विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी जिला अदालत में याचिका दायर की। इस याचिका में ज्ञानवापी परिसर का सर्वे आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से कराने की मांग की गई।
– 2020 : अंजुमान इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने ज्ञानवापी परिसर का एएसआई से सर्वे कराने की मांग वाली याचिका का विरोध किया। इसी साल रस्तोगी ने निचली अदालत का रुख भी किया, जिसमें मामले की सुनवाई फिर से शुरू करने की मांग की। रस्तोगी ने दलील दी कि क्योंकि हाईकोर्ट ने स्टे को नहीं बढ़ाया है, इसलिए इस मामले की सुनवाई फिर से शुरू होनी चाहिए।
काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के बीच विवाद का केस एक कानून से कमजोर पड़ सकता है. ये कानून है प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट, जिसे 1991 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार लेकर आई थी।
कानून कहता है कि आजादी के समय यानी 15 अगस्त 1947 के वक्त जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था, वो हमेशा उसी रूप में रहेगा। उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता।
– हालांकि, हिंदू पक्ष का कहना है कि इस मामले में ये कानून लागू नहीं होता, क्योंकि मस्जिद को मंदिर के अवशेषों के ऊपर बनाया गया था और उसके हिस्से आज भी मौजूद हैं। वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इस कानून के तहत इस विवाद पर कोई भी फैसला लेने की मनाही है।
– 1991 के इस कानून में अयोध्या विवाद को छूट दी गई थी।अयोध्या विवाद आजादी से पहले से चला आ रहा था, इसलिए इसे छूट थी। अयोध्या मामले में 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था। इस फैसले में यहां राम मंदिर बनाने की इजाजत दे दी थी।
ताजा विवाद ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी और अन्य देवी-देवताओं की रोजाना पूजा-अर्चना को लेकर है। 18 अगस्त 2021 को 5 महिलाएं ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मां श्रृंगार गौरी, गणेश जी, हनुमान जी समेत परिसर में मौजूद अन्य देवताओं की रोजाना पूजा की इजाजत मांगते हुए कोर्ट पहुंची थीं। अभी यहां साल में एक बार ही पूजा होती है।
इन पांच याचिकाकर्ताओं का नेतृत्व दिल्ली की राखी सिंह कर रही हैं, बाकी चार महिलाएं सीता साहू, मंजू व्यास, लक्ष्मी देवी और रेखा पाठक बनारस की हैं।
26 अप्रैल 2022 को वाराणसी सिविल कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी और अन्य देव विग्रहों के सत्यापन के लिए वीडियोग्राफी और सर्वे का आदेश दिया था।
कोर्ट के आदेश के बावजूद मुस्लिम पक्ष के भारी विरोध की वजह से यहां 6 मई को शुरू हुआ 3 दिन के सर्वे का काम पूरा नहीं हो पाया। इस मामले में 10 मई को फिर से सुनवाई होगी। माना जा रहा है कि इस सुनवाई में कोर्ट ज्ञानवापी मस्जिद के सर्वे की नई तारीख देने वाला है।
मुस्लिम पक्ष सर्वे के लिए मस्जिद के अंदर जाने को गलत बता रहा है। हिंदू पक्ष का कहना है कि शृंगार देवी के अस्तित्व के प्रमाण के लिए पूरे परिसर का सर्वे जरूरी है।
मान्यता: औरंगजेब ने मंदिर तोड़ ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई – 
मान्यता है कि 1669 में औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर का एक हिस्सा तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि 14वीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तान ने मंदिर को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी।कुछ मान्यताओं के अनुसार अकबर ने 1585 में नए मजहब दीन-ए-इलाही के तहत विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी।मस्जिद और विश्वनाथ मंदिर के बीच 10 फीट गहरा कुआं है, जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है। इसी कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम पड़ा। स्कंद पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था। शिवजी ने यहीं अपनी पत्नी पार्वती को ज्ञान दिया था, इसलिए इस जगह का नाम ज्ञानवापी या ज्ञान का कुआं पड़ा। किंवदंतियों, आम जनमानस की मान्यताओं में यह कुआं सीधे पौराणिक काल से जुड़ता है।
मस्जिद का आर्किटेक्चर ताजमहल जैसा
ज्ञानवापी मस्जिद हिंदू और मुस्लिम आर्किटेक्चर का मिश्रण है। मस्जिद के गुंबद के नीचे मंदिर के स्ट्रक्चर जैसी दीवार नजर आती है।माना जाता है कि ये विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा है, जिसे औरंगजेब ने तुड़वा दिया था। ज्ञानवापी मस्जिद का प्रवेश द्वार भी ताजमहल की तरह ही बनाया गया है।मस्जिद में तीन गुंबद हैं, जो मुगलकालीन छाप छोड़ते हैं। मस्जिद का मुख्य आकर्षण गंगा नदी के ऊपर की ओर उठी 71 मीटर ऊंची मीनारें हैं। ज्ञानवापी मस्जिद का एक टावर 1948 में आई बाढ़ के कारण ढह गया था।मस्जिद को मंदिर के अवशेष पर बनाने को लेकर विवाद
मंदिर-मस्जिद को लेकर कई बार विवाद हुए हैं, लेकिन ये विवाद आजादी से पहले के हैं। 1809 में जब हिंदुओं ने विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के बीच एक छोटा स्थल बनाने की कोशिश की थी, तब भीषण दंगे हुए थे।
1991 में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशजों ने वाराणसी सिविल कोर्ट में याचिका दायर की। याचिका में कहा कि मूल मंदिर को 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़कर मस्जिद बनवाई।याचिका में कहा गया कि मस्जिद में मंदिर के अवशेषों का इस्तेमाल हुआ इसलिए यह जमीन हिंदू समुदाय को वापस दी जाए। याचिका के मुताबिक केस में प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट 1991 लागू नहीं होता, क्योंकि मस्जिद को मंदिर के अवशेषों से बनाया था।
1998 में ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी अंजमुन इंतजामिया इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची। कमेटी ने कहा कि इस विवाद में कोई फैसला नहीं लिया जा सकता, क्योंकि प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट के तहत इसकी मनाही है। इसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
2019 में विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी जिला अदालत में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के आर्कियोलॉजिकल सर्वे कराने की मांग करते हुए याचिका दाखिल की।हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर की वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद 2019 में वाराणसी कोर्ट में फिर से इस मामले में सुनवाई शुरू हुई।
2020 में अंजुमन इंतजामिया ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे कराए जाने की याचिका का विरोध किया। इसी साल रस्तोगी ने हाईकोर्ट द्वारा स्टे नहीं बढ़ाने का हवाला देते हुए निचली अदालत से सुनवाई फिर शुरू करने की अपील की।
शिव पुराण में भी है काशी विश्वनाथ मंदिर का जिक्र
काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योर्तिलिंगों में से एक है। ये मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में गंगा नदी के किनारे स्थित है। वाराणसी को बनारस भी कहते हैं, इसका प्राचीन नाम काशी था। इसीलिए विश्वनाथ मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर भी कहते हैं।यहां शिव को विश्वनाथ यानी ‘ब्रह्मांड के स्वामी’ या विश्वेश्वर यानी ‘विश्व के ईश्वर’ के रूप में पूजा जाता है।
काशी विश्वनाथ मंदिर पर कई बार हुए आक्रमण-
काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है। इस मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण में भी मिलता है।
मूल विश्वनाथ मंदिर को 1194 में मोहम्मद गोरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने तुड़वा दिया था। माना जाता है कि 1230 में गुजरात के एक व्यापारी ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।मंदिर को 1447-1458 के बीच हुसैन शाह शरीकी या 1489-1517 के बीच सिकंदर लोदी ने फिर से ढहा दिया था। कुछ मान्यताओं के अनुसार, 1585 में अकबर के मंत्री टोडरमल ने विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
विश्वनाथ मंदिर के वर्तमान स्वरूप का निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। 1983 से इस मंदिर का प्रबंधन उत्तर प्रदेश सरकार कर रही है।मंदिर का प्रमुख शिवलिंग 60 सेंटीमीटर लंबा और 90 सेंटीमीटर की परिधि में है। मुख्य मंदिर के आसपास काल-भैरव, कार्तिकेय, विष्णु, गणेश, पार्वती और शनि के छोटे-छोटे मंदिर हैं।
मंदिर में 3 सोने के गुंबद हैं, जिन्हें 1839 में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने लगवाया था। मंदिर-मस्जिद के बीच एक कुआं है, जिसे ज्ञानवापी कुआं कहा जाता है। ज्ञानवापी कुएं का जिक्र स्कंद पुराण में भी मिलता है। कहा जाता है कि मुगलों के आक्रमण के दौरान शिवलिंग को ज्ञानवापी कुएं में छिपा दिया गया था।
ज्ञानवापी केस में नया मोड़-
दो साध्वियों ने कोर्ट से की मांग, उनके वाद संख्या 761/2021 की भी वर्तमान केस के साथ सुनवाई की जाए। साध्वी पूर्णाम्बा और साध्वी शारदाम्बा ने सिविल जज सीनियर डिविजन की कोर्ट में दिया प्रार्थनापत्र। कहा – हमारा केस और वर्तमान में चल रहा वाद 693/2021 एक ही प्रकरण और उद्देश्य से संबंधित है। दोनों साध्वियों ने की मांग- हमारे वाद और वर्तमान में चल रहे वाद पर एक साथ की जाए सुनवाई। साध्वियों के वाद पर कोर्ट ने पहले से ही 6 जुलाई 2022 की डेट दे रखी है।
आज भी कोर्ट ने दोनों साध्वियों के वाद को 6 जुलाई 2022 को ही सुनने के लिये Put on Fixed Date का आदेश दिया है।साध्वियों के अनुसार वर्तमान में चल रहे वाद संख्या 693/2021 से मिलते जुलते और भी वाद न्यायालय में विचारधीन हैं, जिनकी सुनवाई एक साथ की जानी चाहिए। इसमें वाद संख्या 350/2021 रंजना अग्निहोत्री बनाम उत्तर प्रदेश सरकार भी शामिल है।
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