जानिए! अघोरी क्यों नहीं जाते कुम्भ –

कुंभ की शुरूआत हो चुकी हैं और नागा साधुओं को कुंभ में हमेशा ही देखा जाता रहा हैं। नागा साधु कुंभ के दौरान भारी तादाद में आते हैं। इस कुंभ के मेले में नागा साधुओं को अपने अखाड़ों में ही देखा जाता हैं। वही कई सारे लोग इन नागा साधुओं से मिलने आते हैं।

वही इनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और अपनी समस्या का हल पाते हैं। मगर ज्यादातर लोग नागा साधु और अघोरी साधु को एक ही समझ लेते हैं। मगर ये अलग अलग होते हैं और इनमें कई सारे अंतर भी होते हैं।

इनकी वेशभूष से लेकर इनके तप करने के तरीके, रहन—सहन, साधना और इनकी साधु बनने की प्रक्रिया में बही काफी अंतर देखा जा सकता हैं।

भले ही दोनों साधारण साधुओं की तुलना में अलग दिखते हैं। मगर भयावह रूप लोगों को दुविधा में ला देखता हैं यही एक खास वजह कि लोग नागा और अघिरोयों को एक समझ लेते हैं। तो आइए जानते हैं इनके बीच के अंतर के बारे में—

नागा और अघोरी साधु दोनो को ही साधु बनने के लिए बहुत कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता हैं। दोनों साधुओं की परीक्षा को 12 साल का वक्त लगता हैं।

अघोरी की कठिन साधना – 

1-अघोरी मूलत: तीन तरह की साधनाएं करते हैं। शिव, शव और श्मशान साधना। शिव साधना में शव (मुर्दा) के ऊपर पैर रखकर साधना की जाती है। शव साधना शव पर बैठकर की जाती है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और शराब चढ़ाई जाती है।

2-तीसरी होती है श्मशान साधना। इसमें शवपीठ (जहां शवों को जलाते हैं) की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल व मावा चढ़ाया जाता है। 

3- अघोरी बाबा बहुत हठी होते हैं, अगर किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा करते हैं। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। 

4- अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, लेकिन उनका मन शांत होता है। अघोरी गले में धातु की बनी नरमुंड की माला पहनते हैं।

5-अघोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। इसलिए अघोरी श्मशान में रहना ही ज्यादा पंसद करते हैं। वे यहीं अपनी कुटिया बनाते हैं। 

6-अघोरियों की कुटियां में एक छोटी सी धूनी हमेशा जलती रहती है। जानवरों में वो सिर्फ कुत्ते पालना पसंद करते हैं। 

7-अघोरी गाय का मांस छोड़ कर बाकी सब खा सकते हैं। मल से लेकर मुर्दे का मांस तक। प्यास लगने पर खुद का मूत्र भी पी लेते हैं।

8-अघोरी बाबा आम लोगों से कोई संपर्क नहीं रखते। ना ही ज्यादा बातें करते हैं। वे अधिकांश समय अपना सिद्ध मंत्र ही जाप करते रहते हैं।

9- मान्यता है कि अघोरी पराशक्तियों (आत्मा) को भी अपने वश में कर सकते हैं। ये साधनाएं भी वे श्मशान में ही करते हैं। 

      वही अंतर यह हैं,कि नागा साधु बनने के लिए नागा आखाड़ों में परीक्षाएं ली जाती हैं। लेकिन अघोरी बनने के लिए श्मशान में तपस्या करनी पड़ती हैं। वही नागा बनने के लिए सबसे पहले एक गुरु का निर्धारित करना पड़ता हैं।

         नागा और अघोरी दोनों ही पूरे तरीके से परिवार से दूर र‍हकर पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। इन दोनों को ही साधु बनने की प्रक्रिया में अपना श्राद्ध करना होता है और इस वक्‍त ये अपने परिवार को भी त्‍याग देने का प्रण लेते हैं। परिजनों और बाकी दुनिया के लिए भी ये मृत हो जाते हैं। अपनी तपस्‍या के लिए फिर कभी अपने परिवार वालों से नहीं मिलते।

यह गुरु नागा अखाड़े का कोई भी बड़ा विद्वान हो सकता हैं। उसकी देखरेख करके ही उसकी सेवा करके कठिन परिश्रम से ही नागा साधु के अगे पड़ाव पर पहुंचा जा सकता हैं।

नागा साधुओं के दर्शन अक्‍सर हो जाया करते हैं, मगर अघोरी कहीं भी नजर नहीं आते। ये केवन श्‍मशान में ही वास करते हैं। जबकि नागा साधु कुंभ जैसे धार्मिक समारोह में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लेते हैं और उसके बाद यह वापस हिमालय की ओर चले जाते हैं।

लंदन में ‘स्कूल ऑफ अफ्रीकन एंड ओरिएंटल स्टडीज़’ में संस्कृत पढ़ाने वाले जेम्स मैलिंसन बताते हैं, “अघोर दर्शन का सिद्धांत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान हासिल करना है और ईश्वर से मिलना है तो शुद्धता के नियमों से परे जाना पड़ेगा।” ऑक्सफ़र्ड में पढ़ाई करने वाले मैलिंसन एक महंत और गुरु भी हैं लेकिन उनके समुदाय में अघोरी समुदाय की प्रक्रियाएं वर्जित हैं।

कई अघोरी साधुओं के साथ बातचीत के आधार पर रिसर्चर मैलिंसन कहते हैं, “अघोरियों का तरीका ये है कि स्वाभाविक वर्जनाओं का सामना करके उन्हें तोड़ दिया जाए। वे अच्छाई और बुराई के सामान्य नियमों को ख़ारिज करते हैं। आध्यात्मिक प्रगति का उनका रास्ता अजीबोगरीब प्रक्रियाओं, जैसे कि इंसानी मांस और अपना मल खाने जैसी चीज़ों से होकर गुज़रता है। लेकिन वो ये मानते हैं कि दूसरों द्वारा त्यागी गई इन चीज़ों का सेवन करके वे परम चेतना को प्राप्त करते हैं।”

खोज कहती है… 

मिनेसोटा आधारित मेडिकल कल्चरल और एंथ्रोपॉलिजिस्ट रॉन बारेट ने इमोरी रिपोर्ट के साथ इंटरव्यू में बताते हैं, “अघोरी उन लोगों के साथ काम कर रहे हैं जिन्हें समाज में अछूत समझा जाता है। एक तरह से लेप्रसी ट्रीटमेंट क्लीनिकों ने श्मशान घाट की जगह ले ली है। और अघोरी बीमारी के डर पर जीत हासिल कर रहे हैं।”

किताब क्या कहती है-

अघोरियों पर एक किताब ‘अघोरी: अ बायोग्राफ़िकल नॉवल’ लिखने वाले मनोज ठक्कर बताते हैं कि लोगों के बीच उनके बारे में भ्रामक जानकारी ज़्यादा है। वह बताते हैं, “अघोरी बेहद ही सरल लोग होते हैं जो प्रकृति के साथ रहना पसंद करते हैं। वह किसी तरह की कोई डिमांड नहीं करते हैं।”

“वह हर चीज को ईश्वर के अंश के रूप में देखते हैं। वह न तो किसी से नफ़रत करते हैं और न ही किसी चीज को खारिज करते हैं। इसीलिए वे किसी जानवर और इंसानी मांस के बीच भेदभाव नहीं करते हैं। इसके साथ ही जानवरों की बलि उनकी पूजा पद्धति का एक अहम अंग है।” “वे गांजा पीते हैं लेकिन नशे में रहने के बाद भी अपने बारे में उन्हें पूरा ख्याल रहता है”

अघोरी नहीं जाते कुम्भ-

अघोरी भीड़भाड़ से दूर एकांत में तांत्रिक साधना में तल्लीन रहते हैं यह उनकी दीक्षा में शामिल है। 

खास बात-

 ख़ास बात यह है कि जब अघोरियों की मौत हो जाती है तो उनके मांस को दूसरे अघोरी नहीं खाते हैं। उनका सामान्य तौर पर दफनाकर या जलाकर अंतिम संस्कार किया जाता है।

मान्यता – 

मान्‍यता है कि नागा साधु के दर्शन करने के बाद अघोरी के दर्शन करना भगवान शिव के दर्शन करने के बराबर होता है।नागा और अघोरी दोनों के ही पास अद्भुत शक्तियां होती हैं। नागा साधु ईश्‍वर की विशेष कृपा के साथ मनुष्‍यों को ज्ञान की बातें बताते हैं। जबकि अघोरी कुम्भ में न जाकर श्मशान के बासी होते हैं। वह अपनी तांत्रिक सिद्धि के द्वारा मनुष्‍यों की समस्‍याओं का निवारण करते हैं।। 

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