चलो बातें करते हैं! श्रंखला- भाग 2✍️विकास द्विवेदी

मित्रों हमने अपनी श्रंखला के प्रथम भाग में आपको ज्योतिष और विज्ञान के विषय में इसकी आधारीय संरचना से रूबरू कराया था ,अब बात करते हैं ज्योतिष के साथ धर्म की , कि कैसे यह इसके संपर्क में आया। जैसा कि हम आपको पहले ही बता चुके हैं कि ज्योतिषीय गणना के मानकों के रूप में प्रकृति की उन इकाइयों को चुना गया जो अनवरत रूप से अपनी चाल निर्धारित किए हुए थीं ।

प्रारंभ में अन्य ग्रहों के विषय में तो नहीं, लेकिन सूर्य एवं चंद्रमा के विषय में अवश्यंभावी रूप से यह कहना अतिसंयोक्ति नहीं होगा । कि लोगों ने इन्हे समय के मानकों के रूप में सबसे उपयुक्त माना क्योंकि इनकी बदलती हुई कलाओं ने लोगों को समय के विभाजन का एक उपयुक्त माध्यम दिया। ॠतु को भी आधार अवश्य बनाया होगा, जिसकी संबद्धता इन समय रूपी मानकों से रही होगी! फिलहाल इस विषय को अल्पविराम देकर थोड़ा आगे बढ़ते हैं।

दुनिया में कई धर्मों को मानने वाले लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक की बात करना असंभव है इसलिए हमने हिंदू और मुस्लिम दो प्रमुख धर्मों का चुनाव करने का निर्णय लिया है ।ज्योतिष ग्रह और नक्षत्रों के मानकों पर गढ़ा गया विज्ञान है। प्राथमिक रूप से कहा जाए तो हमेशा ही चमत्कार को नमस्कार किया जाता है ,जो दिखा नहीं जो हुआ नहीं उसके बारे में जान लेना चमत्कार ही तो है और यही धर्म ने आलिंगन किया ज्योतिष का ।धर्म जिसका आधार ईश्वर है जो कभी नहीं दिखाई देता, ज्योतिष जो बिना घटे ही भविष्य के पन्नों की व्याख्या वर्तमान में कर दे ।और जैसे ही यह संबद्धता हुई ,हमने तमाम मानकों को प्रकृति के सम्मान में ईश्वरीय रूप में पूजना शुरु कर दिया ,और करना भी चाहिए ।

हिंदू धर्म के साथ ही उन कबीलियाई संस्कृतियों में इन मानकों को या यूं कहे कि प्रकृति के आधार स्तंभों को सम्मान देने की परंपरा प्रचलित रही। हमने सामाजिक विकास की विभिन्न अवधारणाओं के साथ अपने भाषा विज्ञान सहित अन्य विषयों में अभिरुचि दिखाई और प्रयोग करते हुए नित नए आविष्कारों का अनुसंधान किया ।

हम जैसे जैसे विकसित होते गए हमारी संस्कृति और उत्सवों का स्वरूप बदला जिसे हमने परंपरा कहा ।और ऋतु के आधार पर उचित समय का आकलन करते हुए सुविधाजनक रूप से त्योहारों की संरचना तैयार की। जो समय उचित लगा उसे प्रकृति तत्व रूपी मानकों के आधार पर एक विशेष अवसर दर्शाया और इस तरह उस युक्ति का सृजन किया गया जिसे हिंदू कैलेंडर या पंचांग के रूप में मान्यता प्राप्त है।

विकास की इस अनवरत यात्रा में तमाम तीज-त्यौहार ,उत्सव, परंपराएं इसी नक्षत्र विज्ञान पर आधारित थीं अौर हैं। इसलिए वर्तमान में जिस अंग्रेजी कैलेंडर का हम अनुसरण करते हैं उसके अनुसार प्रतिवर्ष हम अलग-अलग तारीखों पर समान त्योहार मनाते हैं ।क्योंकि यह नक्षत्र विज्ञान द्वारा सृजित तिथियों पर आधारित होते हैं । इसके साथ ही सूर्यग्रहण ,चंद्रग्रहण जैसे प्रमुख घटनाक्रम के साथ ही, चंद्रमा की विभिन्न कलाओं से होने वाली अमावस्या ,पूर्णिमा और यहां तक कि समुद्र के ज्वार-भाटे से इसकी संबद्धता का बारीक अध्ययन किया गया ।और इसके बाद सभी इकाइयों और पैमानों, जो की प्रकृतिजन्य है उनके आधार पर सांख्यिकीय अवधारणा की परिकल्पना प्रस्तुत हो सकी ।

वही मुस्लिम धर्म में तमाम तीज त्यौहार चांद को देखकर ही मनाये जाते हैं ।सूर्य का चक्कर 365 से 366 दिनों में पूरा होता है वहीं अगर चंद्रमा की बात की जाए तो यह अवधि सूर्य की कालावधि से 10 से 12 दिन कम होती है। इसलिए हर वर्ष विभिन्न त्योहार पिछले वर्ष मनाए गए त्यौहार की तारीखों से कुछ पहले आते हैं। क्योंकि यहां भी महत्व तारीख का नहीं ,बल्कि हिजरी कैलेंडर के अनुसार तय समय का होता है। जो चांद की गति पर निर्भर करता है, इस्लाम में किसी भी प्रकार की अवधारणा के आधार पर किसी भी भविष्यवाणी या कोई भविष्य कथन करना निषेध बताया गया है।

यहां पर हमारा उद्देश्य यह बताना था।कि ज्योतिष किसी भी धर्म से इतर वह सांख्यिकीय अवधारणा है जिसके आधार पर हमने विकसित होते हुए अपने समय यानी कालखंड को व्यवस्थित किया। हो सकता है अन्य धर्मों-वर्गों में इसे अन्य शब्द से निरूपित किया गया हो! किंतु मूल तत्व वही ग्रह और नक्षत्र है। अतएव किसी एक की इस पर एकाधिकार की बात बेमानी होगी।

दोस्तों! अगले लेख में हम बात करेंगे। वर्तमान की प्रमुख समस्या कोरोना और प्रकृति संतुलन के विषय में।

लेखक ✍️विकास द्विवेदी

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