म.प्र-छत्तीसगढ़ में भाजपा विधायकों के टिकट काटने की जद्दोजहद –


विधानसभा चुनाव 2018


मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा बड़ी संख्या में अपने वर्तमान विधायकों का टिकट काटने की तैयारी में है। इनमें से अधिकतर वे विधायक हैं जो दो बार से ज्यादा एक ही सीट से लगातार चुने गए हैं। 15 वर्षों से लगातार सत्ता में बने रहने से उपजी एंटी-इनकंबेंसी से निपटने के लिए भाजपा ने यह फार्मूला निकाला है। 

पार्टी नेतृत्व का मानना है कि लोगों की नाराजगी दो स्तर पर होती है। पहली मुख्यमंत्री के नेतृत्व में चल रही राज्य सरकार से और दूसरी स्थानीय विधायक से। चूंकि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं बदला जा सकता है इसलिए काम न करने वाले विधायक का टिकट काट दिया जाएगा। इस बार आधे से अधिक विधायकों को टिकट नहीं दिए जाने की संभावना है।

पार्टी सूत्रों का कहना है कि इनमें से कुछ विधायकों की सीट बदल दी जाएगी लेकिन अकर्मण्यता की शिकायत वाले ऐसे विधायक जो अपने काम के बजाय केवल पार्टी के नाम पर ही जीत कर आते हैं, उनको इस बार मैदान में नहीं उतारा जाएगा।

इसके लिए भाजपा ने कई सर्वेक्षण कराए हैं, जिनमें उम्मीदवारों को विधानसभा में प्रदर्शन, विधायक निधि के इस्तेमाल, क्षेत्र में कराए विकास कार्य और मतदाताओं के बीच लोकप्रियता जैसे पैमानों पर कसा गया है।

चूंकि राजस्थान में पार्टी केवल पिछले पांच सालों से ही सत्ता में है, इसलिए वहां ज्यादा विधायकों के टिकट नहीं काटे जाएंगे। लेकिन वहां मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रति लोगों की नाराजगी बहुत अधिक है। साथ ही राज्य भाजपा इकाई कई धड़ों में बंटी हुई है।

हालांकि केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने बतौर केंद्रीय पर्यवेक्षक, अधिकतर नेताओं को बातचीत करने पर राजी तो कर लिया, लेकिन सीएम के प्रति नाराजगी को कम करने का मंत्र फिलहाल उनके पास नहीं है।

ऐसे पार्टी को सबसे बड़ी उम्मीद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से है जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार खत्म करने के बाद राजस्थान पर पूरा ध्यान लगाएंगे। चूंकि राजस्थान का चुनाव इन दोनों राज्यों के चुनाव के 10 दिन बाद होना है, इसलिए भाजपा को उम्मीद है कि इस दौरान प्रधानमंत्री के साथ सभी वरिष्ठ नेताओं की प्रतिदिन दो से तीन सभाओं से राजस्थान के चुनाव का मिजाज बदल सकता है।

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