माँ दुर्गा स्तुति – शरद नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं। – टीम सच की दस्तक


या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै …….

 या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप में स्थित हैं, उनको नमस्कार, नमस्कार, बारंबार नमस्कार है।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण माता की स्तुति में कहते हैं- 

 

त्वमेव सर्वजननी मूलप्रकृतिरीश्वरी। 

त्वमेवाद्या सृष्टिविधौ स्वेच्छया त्रिगुणात्मिका॥ 

कार्यार्थे सगुणा त्वं च वस्तुतो निर्गुणा स्वयम्‌। 

परब्रह्मास्वरूपा त्वं सत्या नित्या सनातनी॥ 

तेजःस्वरूपा परमा भक्तानुग्रहविग्रहा। 

सर्वस्वरूपा सर्वेशा सर्वाधारा परात्पर॥ 

सर्वबीजस्वरूपा च सर्वपूज्या निराश्रया। 

सर्वज्ञा सर्वतोभद्रा सर्वमंगलमंगला॥। 

तुम्हीं विश्वजननी मूल प्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो। यद्यपि वस्तुतः तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो। तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो। परम तेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने हेतु शरीर धारण करती हो। तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो।तुम सर्वाबीजस्वरूप, सर्वपूज्या एवं आश्रयरहित हो। तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकार से मंगल करने वाली एवं सर्व मंगलों की भी मंगल हो। 

          नवरात्रि पर्व पर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक महाशक्ति भगवती देवी की उपासना करने से यह निर्गुण स्वरूपा देवी पृथ्वी के सारे जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश रूप से उत्पत्ति, पालन और संहार कार्य करती हैं।

 

ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥

 

        श्री दुर्गा चालीसा

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।

नमो नमो अम्बे दुःख हरनी ॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।

तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला ।

नेत्र लाल भृकुटी बिकराला ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे ।

दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लय कीना ।

पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा तुम जग पाला ।

तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशनहारी ।

तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुन गावें ।

ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रूप सरस्वती का तुम धारा ।

दे सुबुधि ऋषि-मुनिन उबारा ॥

धर्‍यो रूप नरसिंह को अम्बा ।

परगट भईं फाड़ कर खम्बा ॥

रक्षा करि प्रहलाद बचायो ।

हिरनाकुश को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग जानी ।

श्री नारायण अंग समानी ॥

क्षीरसिन्धु में करत बिलासा ।

दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।

महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी धूमावति माता ।

भुवनेश्वरि बगला सुखदाता ॥

श्री भैरव तारा जग-तारिणि ।

छिन्न-भाल भव-दुःख निवारिणि ॥

केहरि वाहन सोह भवानी ।

लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर-खड्‍ग बिराजै ।

जाको देख काल डर भाजै ॥

सोहै अस्त्र विविध त्रिशूला ।

जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोट में तुम्हीं बिराजत ।

तिहूँ लोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दैत्य तुम मारे ।

रक्तबीज-संखन संहारे ॥

महिषासुर दानव अभिमानी ।

जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा ।

सेन सहित तुम तेहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब-जब ।

भई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमर पुरी अरू बासव लोका ।

तव महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।

तुम्हें सदा पूजें नर-नारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावै ।

दुख-दारिद्र निकट नहिं आवै ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।

जन्म-मरण ता कौ छुटि जाई ॥

योगी सुर-मुनि कहत पुकारी ।

योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप कीनो ।

काम-क्रोध जीति तिन लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।

अति श्रद्धा नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप को मरम न पायो ।

शक्ति गई तब मन पछितायो ॥

शरणागत ह्‍वै कीर्ति बखानी ।

जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।

दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो ।

तुम बिन कौन हरे दुख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावैं ।

मोह-मदादिक सब बिनसावैं ॥

शत्रु नाश कीजै महरानी ।

सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥

करहु कृपा हे मातु दयाला ।

ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला ॥

जब लग जिओं दया फल पावौं ।

तुम्हरो यश मैं सदा सुनावौं ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।

सब सुख भोग परमपद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी ।

करहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

॥इति श्रीदुर्गा चालीसा समाप्त ॥

        श्री दुर्गा मन्त्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥

ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट्‍ स्वाहा ॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी ।

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनी ।

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणी ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।

क्रां क्रीं क्रूं कालिकादेवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ॥5॥

                      ☀️जय माता की☀️

       माँ दुर्गा आरती

जय अम्बे गौरी मैया जय मंगल मूर्ति ।
तुमको निशिदिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिव री ॥टेक॥

मांग सिंदूर बिराजत टीको मृगमद को ।
उज्ज्वल से दोउ नैना चंद्रबदन नीको ॥जय॥

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजै।
रक्तपुष्प गल माला कंठन पर साजै ॥जय॥ 

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्परधारी ।
सुर-नर मुनिजन सेवत तिनके दुःखहारी ॥जय॥

कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती ।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत समज्योति ॥जय॥

शुम्भ निशुम्भ बिडारे महिषासुर घाती ।
धूम्र विलोचन नैना निशिदिन मदमाती ॥जय॥

चौंसठ योगिनि मंगल गावैं नृत्य करत भैरू।
बाजत ताल मृदंगा अरू बाजत डमरू ॥जय॥

भुजा चार अति शोभित खड्ग खप्परधारी।
मनवांछित फल पावत सेवत नर नारी ॥जय॥

कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती ।
श्री मालकेतु में राजत कोटि रतन ज्योति ॥जय॥

श्री अम्बेजी की आरती जो कोई नर गावै ।
कहत शिवानंद स्वामी सुख-सम्पत्ति पावै ॥जय॥

 

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