जंग-ए-आजादी के प्रथम क्रांतिवीर मंगल पाण्डेय

स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव पर राष्ट्रीय धर्मिता के निर्वहन में चंदौली जनपद के वरिष्ठ नागरिक रंगकर्मी, एवं चिंतक कृष्णकांत श्रीवास्तव ने अपनी कलम से पिछले अंकों में मुंशी प्रेमचंद, बनारस की बेटी लक्ष्मीबाई, मदन मोहन मालवीय, चंद्रशेखर आजाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, बाल गंगाधर तिलक, बलिदानी भगत सिंह आदि पर प्रस्तुत कीर्ति स्तंभ एक सराहनीय प्रयास रहा है। यह कीर्ति माला चलती रहेगी ऐसा हमारा विश्वास है। इस अंक में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सूत्रधार मंगल पांडे की अमर गाथा पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है।
(संपादक)

कलम इनकी जय बोल

__कृष्ण कांत श्रीवास्तव, वरिष्ठ रंगकर्मी, रचनाधर्मी, साहित्यकार, व्यंग्यकार, गीतकार, समाज सेवक

पूरी शहीद गाथा जहां लिखित तुम्हारी हो,
अश्रुत युगों की गूढ़ गाथा छिपी सारी हो,
उस तहख़ाने तक तुम पहुंचाओ हमें,
अपना रहस्य सब खोल के दिखलाओ हमें,
“मारो फिरंगी को” का नारा देने वाले भारत के प्रथम क्रांतिवीर मंगल पांडे के जीवन को उपयुक्त पंक्तियों के माध्यम से कर रहे हैं हम प्रस्तुत।
मंगल मस्ती में चूर चलल
पहिला बागी मसहूर चलल
गोरन का पलटनि का आगे
बलिया के बांका शूर चलल।
                 (नारायण सिंह)
ब्रिटिश हुकूमत से भारत की आजादी के लिए आंदोलन करने का सर्वप्रथम श्रेय अमर शहीद मंगल पांडे को है। मंगल पांडे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम क्रांतिकारी थे जिन्होंने ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया और नारा दिया “मारो फिरंगी को”।
क्रांति की चिंगारी भड़काने वाले मंगल पांडे हमारे ऐसे नायक है जिन्होंने गुलामी की नींद में सो रहे देश को झकझोर कर जगा दिया। इस चिंगारी की आग पूरे देश में  ऐसी फैली की उसे दावानल बनकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव को हिला कर रख दिया।
ब्रिटिश हुकूमत की दमनकारी नीतियों से मंगल पांडे के मन में आक्रोश भरा पड़ा था। नई एनफील्ड राइफल में प्रयुक्त होने वाले कारतूसो में गाय और सुअर की चर्बी की अफवाह ने इस आक्रोश को और भड़का दिया।
29 मार्च 1857 की शाम, बैरकपुर छावनी के परेड ग्राउंड में मंगल पांडे ने हुंकार भरी-
“निकलि आव पलटुन
निकलि आव हमार साथ….
फिरंगी यहां पर हैं। तुम तैयार क्यों नहीं हो रहे हो। इन गोलियों को भरने से हम धर्म भ्रष्ट हो जाएंगे। धर्म के खातिर उठ खड़े हो।
मंगल पांडे ने हुंकार भरी-
“मारो फिरंगी को…।”
अंग्रेज अधिकारियों की हत्या करने के आरोप में हुआ मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल।
मिली फांसी की सजा।
ब्रिटिश हुकूमत के इस फैसले से भारतीय जनता के मन में असंतोष की भावना कितनी प्रबल थी इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जल्लादों ने भी मंगल पांडे को फांसी देने से साफ इनकार कर दिया।
मुकर्रर तारीख से दस दिन पहले ही गुपचुप तरीके से दे दी गई फांसी तीस वर्षीय भारत के लाल मंगल पांडे को।
मंगल पांडे द्वारा लगाई गई इस छोटी सी चिंगारी ने पहले विद्रोह, फिर महाविद्रोह, फिर राष्ट्रीय विद्रोह का रौद्र रूप धारण कर लिया।
“घर-घर में ऐसन आग लागलि
भारत के सूतल भागि जगालि अंगरेजन केनपलटनि सारी
बैरक से भाग चलें।”
ब्रिटिश हुकूमत को लगने लगा कि भारत उनके हाथ से निकलता जा रहा है।
लिखित भारतीय इतिहास में इतने विशाल विदेशी विरुद्ध संयोजन को खोजना असंभव है जिसमें बहुत से लोग, बहुत से प्रांत शामिल हो।
यह स्वतंत्रता युद्ध भारत में लगातार एक वर्ष तक निरंतर चला। सभी प्रदेशों में एक ही समय में चला जिसका उद्देश्य था विदेशी शासक शक्ति को अपमानित करना तथा उसे देश से बाहर निष्कासित करना। ऐसा इससे पूर्व कभी भी नहीं हुआ था। भारत में इस क्रांति के सूत्रधार थे भारत के प्रथम क्रांतिवीर के रूप में विख्यात मंगल पांडे।

जीवन परिचय-

जन्म- 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था। कुछ स्थानों पर इस संदर्भ में इनका जन्म स्थल फैजाबाद जिले के अकबरपुर तहसील के सूरहूपुर गांव में बताया जाता है।
पिता- श्री दिवाकर पांडे।
माता- श्रीमती अभय रानी।
परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मंगल के माता-पिता इतने सक्षम नहीं थे कि वे मंगल को स्कूली शिक्षा प्राप्त करा सकें। अतः मंगल ने किसी प्रकार की स्कूली शिक्षा ग्रहण नहीं की। इनको बचपन से पहलवानी करने का बड़ा शौक था। शरीर हष्ट-पुष्ट था और भुजाएं लंबी एवं बहुत शक्तिशाली थी।
परिवार का जीवकोपार्जन करने के लिए मंगल को युवा अवस्था में ही अंग्रेजी फौज में नौकरी करनी पड़ेगी। उन दिनों ब्रिटिश भूराजस्व नीति के कारण ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी और ग्रामीण युवा बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेना में भर्ती हो रहे थे।
ब्रिटिश सेना की एक ब्रिगेड के कहने पर केवल 22 साल की उम्र में 1849 ईस्वी में मंगल ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फेंट्री की 5वीं कंपनी में भर्ती हो गए। क्योंकि ये परेड करने में बहुत कुशल थे और बहुत तेज परेड किया करते थे, इसलिए इन्हें पैदल सेना में सिपाही बनाया गया। मंगल पांडे की नियुक्ति कोलकाता से कुछ दूरी पर स्थित बैरकपुर सैनिक छावनी में हुई। इनका सिपाही नंबर 1446 था। मंगल पांडे अपना कार्य पूरी निष्ठा और लगन से करते थे। वे बहुत महत्वाकांक्षी थे और भविष्य में बड़ा काम करने का सपना हमेशा देखा करते थे।

मंगल पांडे के विद्रोह का तात्कालिक कारण-

ब्रिटिश सेना में पैदल सिपाही नंबर 1446 मंगल पांडे ने जिस कारण ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह प्रारंभ किया था उसका कारण था एक “बंदूक”।
1856 के दशक के उत्तरार्ध में ब्रिटिश सरकार ने सिपाहियों के लिए पुरानी लोहे वाली बंदूक ब्राउन बेस के स्थान पर नए एनफील्ड राइफल P53 के प्रयोग करने का निर्णय किया। यह 0.577 कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और दशकों से उपयोग में लाई जा रही ब्राउन बेस के मुकाबले में शक्तिशाली एवं अचूक थी।
इस नई एनफील्ड राइफल में इस्तेमाल होने वाली कारतूस के ऊपरी भाग पर ग्रीस युक्त एक चिकना कागज लगा हुआ था, जिसे राइफल में लोड करने से पहले मुंह से काटकर खोलना पड़ता था।
जनवरी 1857 बंगाल सेना में ये अफवाह फैली कि इस कारतूस में जो ग्रीस है वह गाय और सुअर की चर्बी है। भारतीय सैनिकों ने इसका प्रयोग करने में आपत्ति उठाई है क्योंकि यह बात हिंदू हिंदुओं के साथ-साथ मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ था। हिंदू गाय को माता मानते थे।
उसकी पूजा करते थे। इसलिए वे गौ हत्या के विरुद्ध थे। गाय की चर्बी को छूना नहीं चाहते थे। मुसलमान सूअर को घृणा की दृष्टि से देखते थे।अंग्रेज अधिकारियों ने इसकी जांच किए बिना ही तुरंत इसका खंडन कर दिया। इसलिए भारतीय सैनिकों को यह विश्वास हो गया कि चर्बी वाले कारतूसो का प्रयोग करा कर अंग्रेज सरकार उनका धर्म भ्रष्ट कराने की योजना बना रही है।
इसी तरह दूसरी अफवाह यह फैली कि भोजन में प्रयोग होने वाले आटे में गाय और बैल के हड्डियों का पाउडर मिलाया जा रहा है।
तीसरी अफवाह यह फैली कि बड़ी संख्या में यूरोपीय सैनिक भारतीय सैनिकों को मारने आ रहे हैं।
इन सबके कारण भारतीय सैनिकों के बीच कानाफूसी होने लगी कि अंग्रेज औरंगजेब की भूमिका में है और भारतीय सैनिकों को शिवाजी बनना ही होगा।
2 फरवरी 1857 को बैरकपुर छावनी में शाम की परेड के समय सेकंड नेटिव इन्फैन्ट्री के भारतीय सैनिकों ने नए एनफील्ड राइफल को चलाने के प्रति अपनी असहमति दिखाई। अंग्रेज अधिकारियों के प्रति वफादार सैनिकों ने मुखबिरी कर उन्हें खबर दी कि भारतीय सैनिक रात के समय अंग्रेजों पर हमला करने की योजना बना रहे हैं।
9 फरवरी 1857 को नई एनफील्ड राइफल पैदल सेना के बीच बांटी गई। मंगल पांडे के मन में असंतोष इतना उग्र था कि उन्होंने इसे लेने से साफ-साफ इंकार कर दिया। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज सैन्य अधिकारियों ने मंगल पांडे को बेइज्जत करते हुए यह फैसला किया कि 29 मार्च को शाम की परेड के समय मंगल पांडे से उनका हथियार छीन लिया जाएगा। वर्दी उतार ली जाएगी और उन्हें ब्रिटिश सेना से निष्कासित कर दिया जाएगा। अंग्रेज सैन्य अधिकारियों के इस फैसले से मंगल पांडे बहुत नाराज हुए। ब्रिटिश हुकूमत के प्रति असंतोष और भी उग्र हो गया।नई एनफील्ड राइफल के कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी होने की बात बाकी और सैनिक छावनियों में भी फैल गई।
मंगल पांडे की विद्रोही भावना से प्रेरित होकर 26 फरवरी 1857 को बुरहानपुर छावनी में 19वीं नेटिव इन्फैन्ट्री के सैनिकों ने नई एनफील्ड राइफल का गंभीर विरोध किया। उन्होंने नए कारतूसो का इस्तेमाल करने से साफ इनकार कर दिया। इन सैनिकों का विरोध इतना तीव्र था कि इसको दबाने के लिए अंग्रेजों को अपना तोपखाना बुलवाना पड़ा। इन्हीं दिनों बैरकपुर छावनी में सैनिकों ने टेलीग्राम ऑफिस जला दिया और अंग्रेज अफसरों के घरों पर आग वाले तीर छोड़े।
यह घटनाएं यह दर्शा रही थी कि भारतीय सैनिकों के मन में ब्रिटिश हुकूमत के प्रति कितना आक्रोश भरा था।
अंग्रेज अधिकारियों द्वारा सेना से निकाले जाने के फैसले से मंगल पांडे बहुत आक्रोशित थे। यह आक्रोश विद्रोह की चिंगारी बन उनके मन में फूटने लगी थी। 15 से 27 मार्च के बीच मंगल पांडे ने लगातार भगवान शंकर और हनुमान जी की पूजा-अर्चना की।

क्या हुआ 29 मार्च को-

इतिहासकार रुद्रांशू मुखर्जी अपनी किताब “डेटलाइन 1857, रिवोल्ट अगेंस्ट द राज” मे लिखा है- 29 मार्च, रविवार, शाम का वक्त था। मंगल पांडे अपने तंबू से बाहर निकले। उन्होंने अपने रेजिमेंट की कोट और टोपी पहन रखी थी। पर पतलून की जगह धोती थी। वे नंगे पैर थे। उनके हाथों में भरी हुई बंदूक और तलवार थी।”
 किम.ए. बैगनर, पीजीओ टेलर, रोजी लिलवेलन जोन्स, अमरेश मिश्रा इत्यादि कई इतिहासकारों ने 29 मार्च की घटना का सिलसिलेवार वर्णन करते हुए लिखा है-
बंगाल के बैरकपुर छावनी परेड ग्राउंड मैं नई एनफील्ड राइफल का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। मंगल पांडे बंदूक और तलवार से लैस होकर अपने तंबू से निकलकर क्वार्टर गार्ड बिल्डिंग के पास स्थित परेड ग्राउंड में अपने रेजिमेंट के सामने आए और चिल्ला कर कहा –
“निकलि आव पलाटुन
निकलि आव हमार साथ।
फिरंगी यहीं पर हैं। तुम तैयार काहे नहीं हो रहे हो। इन गोलियों को भरने से हम धर्म भ्रष्ट हो जाएंगे। धर्म के खातिर तो उठ खड़े हो।”
मंगल पांडे ने हुंकार भरी –
“मारो फिरंगी को…. मारो फिरंगी को…।”
फिर परेड ग्राउंड पर हंगामा शुरू हो गया।
हंगामें की आवाज सुनकर लेफ्टिनेंट पी.एच.वो घोड़े पर सवार होकर परेड ग्राउंड पर आया। उसे अपनी तरफ आते देख मंगल पांडे ने कहा – “आज तक हमारी वफादारी देखी है अब हमारा क्रोध देखिए।”
यह कह कर मंगल पांडे ने लेफ्टिनेंट वो पर गोली चला दी जो उसके घोड़े के पैर पर लगी। घोड़ा वो को लेकर गिर पड़ा। वो ने तुरंत खड़े होकर मंगल पांडे का गोली चलाई जो उन्हें नहीं लगी। शोर-शराबा सुनकर सार्जेंट मेजर ह्यूसन भी आ गया। मंगल पांडे से उनकी बंदूक छीनने के लिए ह्यूसन जैसे ही आगे बढ़ा मंगल ने उस पर हमला कर दिया। लेफ्टिनेंट वो और मेजर ह्यूसन दोनों ने अपनी तलवारें निकाल ली। ह्यूसन ने मंगल पांडे का कोट पकड़ा और अपनी तलवार से उन पर कई वार किए। तब मंगल पांडे ने अपनी आत्मरक्षा के लिए दोनों अंग्रेज अफसरों पर अपनी तलवार से हमला किया। वहां मौजूद सभी भारतीय सैनिक यह सब देख रहे थे, पर कोई भी अंग्रेज अफसरों की मदद के लिए आगे नहीं आया। ह्यूसन ने मंगल पांडे के साथी सैनिक “जमादार ईश्वरी प्रसाद” से मंगल को पकड़ने के लिये कहा। ईश्वरी प्रसाद ने जवाब दिया- “मैं क्या कर सकता हूं।”
इसी समय कमांडिंग अफसर कर्नल एस.जी.बेलर भी आ गया। उसने वहां मौजूद सैनिकों से मंगल को गिरफ्तार करने को कहा, पर किसी भी सैनिक ने मंगल पांडे को पकड़ने की कोई कोशिश नहीं की। इतिहासकार अमरेश मिश्रा ने अपनी पुस्तक “द ट्रू स्टोरी ऑफ एन इंडियन रिवॉल्यूशनरी” में लिखा है-
“भारतीय सैनिकों ने खुलेआम विद्रोह भले ना किया हो लेकिन उनकी सामूहिक निष्क्रियता बताती है कि वे विरोध और अवज्ञा का मूड बना चुके थे। मंगल पांडे जो कुछ भी कर रहे थे उन्हें उनका पूरा समर्थन प्राप्त था। “यहां पर यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि परेड ग्राउंड पर एक अज्ञात भारतीय सैनिक ने मेजर ह्यूसन पर पीछे से अपनी बंदूक की बट से प्रहार किया था।”
जब लेफ्टिनेंट बेंपदे बाग को इस घटना के बारे में बताया गया तो वह अपने घोड़े पर सवार होकर परेड ग्राउंड पर आया। उसने अपनी पिस्तौल से मंगल पांडे पर गोली चलाई पर निशाना चूक गया। मंगल पांडे ने अपनी तलवार से बाग पर हमला कर उसे भी जख्मी कर दिया।
मंगल पांडे ने और अधिक हिम्मत दिखाते हुए सार्जेंट मेजर ह्यूसन और लेफ्टिनेंट बाग को मौत के घाट उतार दिया।
सहम गई धरती सारी
उसने जब संग्राम किया
बलिया के उस लाल ने जब
अकेले उन पर वार किया।
डिवीजन के कमांडिंग अफसर मेजर जनरल हियरसे से भी अपने दो बेटों के साथ परेड ग्राउंड आ गया। मंगल पांडे ने अपनी तलवार से इनको भी घायल कर दिया।
वहां उपस्थित लगभग 400 भारतीय सैनिकों में से कोई भी अंग्रेजों की मदद करने और मंगल पांडे को रोकने के लिए आगे नहीं आया। केवल एक सैनिक हवलदार शेख पलटू ने मंगल पांडे को पीछे से पकड़ने की कोशिश की। उसने ईश्वरी प्रसाद को चार सैनिक भेजने के लिए कहा। पर ईश्वरी प्रसाद ने शेख पलटू पर अपनी बंदूक तान दी। मंगल ने धक्का देकर पलटू को भी गिरा दिया।
कमांडिंग अफसर मेजर जनरल हियरसे ने अपनी पिस्तौल लहराते हुए कहा – “अगर मेरे आर्डर पर किसी सैनिक ने मार्च नहीं किया तो मैं उसे गोली से उड़ा दूंगा।”
तब कई घुड़सवार और पैदल सिपाही एक साथ मंगल पांडे की ओर बढ़े। मंगल ने अपनी बंदूक को जमीन पर रखा और उसकी नाल अपने सीने की तरफ कर, अपने पैर के अंगूठे से ट्रिगर दबा दिया।
उन्होंने अपने ऊपर गोली चला दी क्योंकि वे चाहते थे कि वे अंग्रेजों के हाथों न मरे। गोली उनके सीने,  कंधे और गर्दन को घायल करते हुए निकल गई। गोली से उनका कोर्ट जल गया और वे घायल होकर पेट के बल जमीन पर गिर गए।
“गोली के तुरत निसान भईल
जननि के भेंट परान भईल
आजादी का बलिवेदी पर
मंगल पांडे बलिदान भईल।”
अंग्रेज अफसरों ने जख्मी मंगल पांडे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया। उन्हें जख्मों के इलाज के लिए कोई दवा नहीं दी गई। एक सप्ताह बाद जब वे थोड़े ठीक हुए तो उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल की कार्रवाई शुरू हुई। मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल शुरू होने के पहले ही अंग्रेज अफसरों ने शेख पलटू का प्रमोशन कर दिया।
मंगल पांडे को मिली फांसी की सजा-
मंगल पांडे पर कोर्ट मार्शल चला। चश्मदीद गवाह के रूप में पलटू का भी बयान लिया गया। कोर्ट में किसी की अंग्रेज अधिकारी से मंगल पांडे के आचरण के बारे में कुछ नहीं पूछा गया। मंगल पांडे ने स्वयं अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह की बात स्वीकार की। उन्होंने कोर्ट से कहा- इस पूरे मामले में उनका कोई साथी नहीं था। उस वक्त गोरे अफसर पर हमला करना अपनी मौत के वारेंट पर दस्तखत करना था।
कोर्ट ने 6 अप्रैल 1857 के दिन मंगल पांडे को बैरकपुर छावनी में 29 मार्च की शाम को अंग्रेज अफसरों पर गोली चलाने, तलवार से हमला करने, दो अंग्रेज अधिकारियों की हत्या करने और साथी सैनिकों को भड़काने के आरोप में मौत की सजा सुनाई।उन्हें फांसी की सजा सुनाते हुए फांसी की तारीख तय की गई 18 अप्रैल 1857।

तय समय से पहले दी गई फांसी-

अदालत ने तय किया था कि 18 अप्रैल 1857 को सिपाही मंगल पांडे को बैरकपुर छावनी में फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा। लेकिन मंगल पांडे को फांसी दिए जाने का समाचार जैसे-जैसे जनता के बीच में फैलने लगा लोगों के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असंतोष की भावना और प्रबल होने लगी। असंतोष की भावना कितनी प्रबल थी इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बैरकपुर छावनी में फांसी की सजा देने के नियुक्त जल्लादों ने भारत मां के सपूत मंगल पांडे को फांसी देने से साफ इनकार कर दिया।
छावनी का माहौल विस्फोटक होने लगा था। ऐसे में अंग्रेजों के लिए मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ाना मुश्किल हो गया। फांसी की सजा को अमल कराना अंग्रेजों के लिए चुनौती  बन गया। उनको यह डरने सताने लगा था कि मंगल पांडे को जल्द से जल्द फांसी नहीं दी गई तो विद्रोह की जो चिंगारी मंगल पांडे ने जलाई है, वह पूरे भारत में ज्वाला का रूप ना ले ले और विद्रोह की आग न भड़क जाए। हालात बिगड़ने की आशंका के कारण अंग्रेजों ने गुपचुप तरीके से मंगल पांडे को फांसी देने का षड्यंत्र रचा।  बैरकपुर में कोई जल्लाद नहीं मिलने पर ब्रिटिश अधिकारियों ने कोलकाता से चार जल्लाद बुलाए। इस षड्यंत्र की खबर फैलते ही कई सैन्य छावनिओं में अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह भड़कने लगा। इसी वजह से आनन-फानन में अंग्रेजों ने एक फैसला लिया।
8 अप्रैल 1857 की सुबह बैरकपुर छावनी का माहौल बहुत उदास और बोझिल सा था। रेजीमेंट के सिपाही रात भर की नींद के बाद तड़के उठने की तैयारी कर रहे थे। तभी उन्हें पता चला कि सुबह ही सुबह परेड ग्राउंड में मंगल पांडे को फांसी दे दी गई है। इसके बाद पूरी छावनी में तनाव फैल गया। किसी को अंदाजा नहीं था कि मंगल पांडे को समय से दस दिन पहले ही फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा।क्योंकि उनकी फांसी की तारीख 18 अप्रैल को मुकर्रर की गई थी।अंग्रेज अफसरों में मंगल पांडे का खौफ इस कदर था कि उनकी
मौत के बाद  लाश के पास जाने से वे कतरा रहे थे।
मंगल पांडे के मित्र नक़ी अली ने 10 मई को मंगल की अस्थियों को उनके गांव जाकर उनकी मां को सौंपी।
अंग्रेजी सरकार ने मंगल पांडे की छवि को खराब करने की बहुत कोशिश की। उनको एक विद्रोही और गद्दार के रूप में पेश किया गया।
विद्रोह के निशान मिटाने के लिए 34वीं नेटिव इन्फेंट्री को भंग कर दिया गया। मंगल पांडे की फांसी के बाद पैदल सिपाही “जमादार ईश्वरी प्रसाद” को भी 21 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई।
जंग-ए-आजादी के महानायक मंगल पांडे ने जो बिगुल फूंका, उसने देश के कोने-कोने में क्रांति का रूप धारण कर लिया।
देश के नाम अमर शहीद मंगल पांडे की कुर्बानी से प्रेरित होकर 20 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कसौली में भारतीय सैनिकों ने एक पुलिस चौकी को आग लगा दी। 23 अप्रैल 1857 को मेरठ छावनी में भारतीय सैनिकों ने गंगाजल और कुरान हाथ में लेकर कसम खाई कि वे चर्बी वाले कारतूसो का विरोध करेंगे।
24 अप्रैल को मेरठ छावनी के  सैनिकों ने चर्बी वाले कारतूसो का प्रयोग करने से साफ इनकार कर दिया। 30 अप्रैल से 9 मई 1857 के बीच देश के कई इलाकों में विद्रोह हुए और अंग्रेजों के दफ्तरों को जलाया गया।
10 मई 1857 को मंगल पांडे द्वारा दिए गए नारे “मारो फिरंगी को” के साथ भारतीय सैनिकों ने खुला विद्रोह शुरू कर दिया और दिल्ली की ओर चल पड़े।
12 मई को विद्रोही सैनिकों ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया। बहादुर शाह जफर को भारत का सम्राट घोषित किया गया। शीघ्र ही इस विद्रोह ने महाविद्रोह का रूप धारण कर लिया। सैनिकों के साथ-साथ किसानों, जमींदारों और आम जनता ने भी इस विद्रोह में बढ़ चढ़कर भाग लिया और अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा संभाला। स्थान-स्थान पर अंग्रेजी राज के चिन्ह तक मिटा देने का प्रयास किया गया। अब इस विद्रोह का स्वरूप एक “राष्ट्रीय विद्रोह” हो गया। इस राष्ट्रीय विद्रोह के रौद्र रूप से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिल गई। अंग्रेजो को लगने लगा कि भारत उनके हाथ से निकलता जा रहा है।
“बढ़ते कदम, बाँधे कफन
था सामने प्यारा वतन
चलती रही थी दुश्मनों की गोलियां
रुकती नहीं फिर भी हमारी टोलियाँ।
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का श्रीगणेश करने वाले प्रथम स्वतंत्रता संग्रामी बलिदानी मंगल पांडे को राष्ट्रीय सम्मान देने के लिए पहली बार मंगल पांडे के नाम के आगे “शहीद” शब्द का प्रयोग किया गया। उनकी शहादत को याद करने के लिए 8 अप्रैल का दिन “बलिदान दिवस” के रूप में मनाया जाता है। भारत सरकार ने 1984 में एक डाक टिकट भी जारी किया।
“जिन शहीदों ने सींचा खून से प्यारा वतन।
उन शहीदों को करते आज हम
शत्-शत् नमन”
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