सबरीमाला मंदिर की पौराणिक मान्यता-


सबरीमाला मंदिर की पौराणिक मान्यता जिनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है, आज हम आपको बताएंगे सबरीमाला मंदिर की विशेषताएं…

सबरीमाला मंदिर में इस लिए है प्रवेश वर्जित – 

दक्षिण भारत में अयप्पा भगवान के कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक केरल की सबरीमाला पहाड़ियों में स्थित है सबरीमाला मंदिर। पहाड़ी के नाम पर ही इस मंदिर का नाम पड़ा है।
          इस मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु भगवान अयप्पा के दर्शन करने आते हैं। ख़ास बात ये है कि आम जनता के लिए इस मंदिर के पट केवल नवम्बर से जनवरी तक ही खुलते हैं और इसी दौरान भगवान के दर्शन के लिए भक्त उमड़ पड़ते हैं। बाकि पूरे साल यह मंदिर आम भक्तों के लिए बंद रहता है।
           भगवान अयप्पा के भक्तों के लिए मकर संक्रांति का दिन बहुत खास माना जाता है, इसीलिए उस दिन यहां सबसे ज़्यादा भक्त पहुंचते हैं। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान परशुराम ने अयप्पा की प्राण प्रतिष्ठा की थी।
      भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी थे. इसलिए महिलाओं को उनसे दूर रहना चाहिए।

कौन थे अयप्पा..?

पौराणिक कथाओं के अनुसार अयप्पा को भगवान शिव और मोहिनी (विष्णु जी का एक रूप) का पुत्र माना जाता है। इनका एक नाम हरिहरपुत्र भी है। हरि यानी विष्णु और हर यानी शिव, इन्हीं दोनों भगवानों के नाम पर हरिहरपुत्र नाम पड़ा।
      इनके अलावा भगवान अयप्पा को अयप्पन, शास्ता, मणिकांता नाम से भी जाना जाता है। इनके दक्षिण भारत में कई मंदिर हैं उन्हीं में से एक प्रमुख मंदिर है सबरीमाला। इसे दक्षिण का पाप हर लेने वाला तीर्थस्थल भी कहा जाता है। 

 मस्जिद में रहकर अयप्पा ने की मंदिर की सेवा-

अयप्पा पांडुलम नामक ग्राम प्रमुख के यहां अनेक चमत्कार दिखाते थे। उसके बाद इन्हें एक मुस्लिम संत वेवर ने गोद ले लिया था। अयप्पा मस्जिद में रहकर मंदिर की पूजा किया करते थे।
         अयप्पा पूजा की एक अलग पद्धति है जिसमें हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी आते हैं। इनकी पूजा से पहले पूरी निष्ठा के साथ 40 दिन का व्रत करना होता है। इस व्रत में तुलसी की माला धारण करनी पड़ती है। इसके साथ ही पुरुषों को दाढ़ी और मूछें कटवाने की इजाजत नहीं होती है।

सबरीमाला मंदिर की खासियत

         यह मंदिर केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम से 175 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 पावन सीढ़ियों को पार करना पड़ता है, जिनके अलग-अलग अर्थ भी बताए गए हैं। पहली पांच सीढ़ियों को मनुष्य की पांच इन्द्रियों से जोड़ा जाता है।
      इसके बाद वाली 8 सीढ़ियों को मानवीय भावनाओं से जोड़ा जाता है। अगली तीन सीढ़ियों को मानवीय गुण और आखिर दो सीढ़ियों को ज्ञान और अज्ञान का प्रतीक माना जाता है।
       यहां से प्रवाहित सरिता पंबा को गंगा की तरह पावन और पूज्य माना जाता है।
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