क्षितिज के पार !✍️कवि अमित हिंदुस्तानी

अब जब मैं वापस आ गया हूँ, उस क्षितिज के पार से, उस धरती-आकाश के संगम से, उस अंतहीन शून्य से, मै अपना अनुभव व्यक्त कर रहा हूँ, मैने देखा वहाँ निर्जन…
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अब जब मैं वापस आ गया हूँ,
उस क्षितिज के पार से,
उस धरती-आकाश के संगम से,
उस अंतहीन शून्य से,
मै अपना अनुभव व्यक्त कर रहा हूँ,
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मैने देखा वहाँ निर्जन के सिवाय कुछ न था,
न कोई रोशनी न कोई आवाज,
किसी जीव की कल्पना भी व्यर्थ थी,
पर वापस आने का कोई मार्ग न था,
तो आगे बढना मजबूरी थी,
मेरे पैर अंधेरे में पूरी तरह धँसे हुये थे,
न हाथ ही नजर आ रहे थे,
जब कभी हाथों से हाथ टकराते,
तब उनके होने का अहसास होता,
आँखे खुली हो या बंद कोई अंतर नहीं,
अंतहीन अंधकार के आगे दृष्टि का कोई मोल नही,
मैं बिना किसी सहारे के चलता रहा,
पैर शिथिल हो रहे थे,
उनमे सुन्नता अब इतनी बढ़ चुकी थी
कि अब वह मेरे शरीर का हिस्सा ही न हों, 
पर चलना ही आखिरी विकल्प था,
लगातार अथक चलता रहा, 
अब राख कुछ गुनगुनी लग रही थी,
पैरों में महसूस करने की क्षमता आ गई थी,
साँसों की ठंडक कुछ कम हो रही थी,
अँधेरें में मेरे पैरो को कुछ गीलापन महसूस हुआ,
शायद पानी के कुछ कतरे थे वहां
जिसमे सन कर राख
कीचड़ में परिवर्तित हो चुकी थी,
जब मेरे स्नायु काम करने लगे तब,
मुझे लगा कि मेरे पैरों से कुछ टकराता है,
कुछ गोलाकार कुछ नुकीला,
कुछ अजीब सा स्पर्ष,
मन मे एक अनजाना सा भय,
कंपकपी सी लग रही थी,
पर यह सर्द हवा की नही थी,
डर व सनसनी का मिश्रण था वो,
टटोलकर देखा तो कुछ माँसल सी,
गोलाकार आकृति मेरे हाथ में आ गई,
वह क्या है यह जानने का निर्रथक प्रयास,
अंधेरे में एक बार और किया,
पता नही क्या था वह,
पैरों में चुभता हुआ कुछ,
अब दिल में चुभने लगा था,
साँसे आपस में बातें कर रही थीं,
धड़कन चुप सी थी, कोई भाव नहीं,…….
किंतु 
बिना भाव के भी कोई समय हो सकता है,
यह अहसास पहली बार हुआ,
जैसे मस्तिष्क भी अनंत में हो,
चलते हुये कदम बिना किसी मंजिल के,
न कोई आशा की किरण न रोशनी की उम्मीद,
तो मैं कहाँ हूँ,
बस यही विचार उद्वेलित कर रहा था,
कहीं मैं दूसरे आयाम में तो नही,
न न ऐसा कैसे हो सकता है,
मुझे याद है कुछ देर पहले,
मैं संवेदना शून्य था,
मेरा कुटुंब व पड़ोसी,
सब व्याकुल से हो रहे थे,
कुछ विलाप कर रहे थे
तो कुछ उन्हें ढ़ाँढ़स बंधा रहे थे, 
मेरी भार्या जो हमेशा प्रेम करती थी
वह मुझे मार रही थी व रो रही थी, 
मेरे सीने पर चोट कर रही थी, 
दोनो हाथों से,  
पर मुझे दर्द जैसा कुछ नही हो रहा था, 
वह दोनो हाथों से मुझे सीने पर मारती,
जिस सीने पर सिर रखकर
वह अनगिनत बार रोई होगी, 
अनंत बार वह सोई थी मेरे सीने पर, 
जिसपर उसे बहुत अभिमान था, 
वह बार बार हाथ पटक रही थी, 
मैं वहीं पास खड़ा था पर किसी ने न देखा, 
सब मेरी उस प्रतिमूर्ति जो बेजान थी, 
उसे घेरे खड़े थे मुझसे किसी ने बात नहीं की, 
मेरे कदम रुक गये, यह क्या ? 
मैं सोच रहा हूँ,  मै महसूस कर रहा हूँ, 
इसका आशय यह है कि मैं जीवित हूँ, 
तो वो कौन था,  जिसके लिए रोया गया, 
जो मुझ जैसा ही था पर निर्जीव,….
अचानक मुझसे अधिक महत्वपूर्ण,
मेरी प्रतिमा हो गई यह कैसे हुआ,
मेरा बेटा मेरी बेटी सब,
मुझे छोड़कर,
मेरी निर्जीव मूर्ति को मान दे रहे थे,
अब मेरा मोह टूट रहा था,
सगे संबंधी, परिवार, पड़ोसी,
सब एक जैसे निकले,
मै छिन्न-भिन्न होता जा रहा था,
मन, भाव, विचार सब खत्म हो चुके थे,
मै अनंत में लीन हो जाता इससे पहले,
ही मुझे एक साया सा दिखा,
हवा से प्रकट होता हुआ,
कुछ मीठी सुगंध फैल रही थी,
यह गंध पहली बार मुझे महसूस हुई,
संसार के किसी भी कोने में ऐसी सुगंध नही हो सकती है,
हल्की सी अचेतना लगने लगी,
मैं खोने लगा उस शून्य में,
जिसके
बारे में में बचपन से सुना था,
अब मैं खुद को स्थिर रखने का,
प्रयास भी न कर सका,
डूब गया उस विस्तार में,
जब चेतना लौटी तो अंधकार से लिपटा,
डर से सराबोर पड़ा था यहीं पर,
चलते चलते कई पहर बीते होंगे,
या शायद पूरा दिन या कई दिन,
कुछ पता नही कितना समय बीता,
बस अंधकार व सफर दो ही थे,
जिनके खत्म होने की उम्मीद ही नहीं थी,
और मैं रोशनी की उम्मीद लगाये चलता गया……. 
बिना भाव के भी कोई समय हो सकता है,
यह अहसास पहली बार हुआ,
जैसे मस्तिष्क भी अनंत में हो,
चलते हुये कदम बिना किसी मंजिल के,
न कोई आशा की किरण न रोशनी की उम्मीद
असफल प्रयास किंतु करना तो था ही,
जूझना खुद से दुष्कर होता जा रहा था,
उम्मीद हारने के एक ही क्षण पहले
उम्मीद की किरण की मुझे पर नजर आई,
तेज किरण अचानक हुए प्रकाश से मैं बच नही सका,
एक खुशी भरी चीख निकली हलक से,
और दोनो हाथ हवा में लहरा दिये मैने,
हे ईश्वर ! यह क्या ???
मेरे हाथ में वो माँसल अर्धसख्त टुकड़ा !
असंभव !
यह हो ही नही सकता !
कोई स्वयं का सिर कैसे उठा सकता है ??
तो मैं कहाँ हूँ ?
आसपास सरपट नजर दौड़ाई बेतहाशा भागते नर व मादाएं,
नग्न शरीर ! बिना सिर के सिमटते चले जा रहे थे उसी प्रकाश पुंज में,
जैसे वह कोई छिद्र हो जिसमे सब समा रहे हैं |
मै भारहीन हो रहा हूँ,
यह विचार आते ही अनजाने विचारों से रोंगटे खड़े हो गये,
और मै धीरे धीरे धीरे उठने लगा उस रक्त सने माँस के दलदल से,
और खिंचने लगा उस प्रकाश पुंज में,
निरर्थक प्रयास किया जमीन को छूने का,
हालाँकि वह दुर्गंध व रक्त से युक्त थी,
पर अब वह अधिक सुरक्षित महसूस हुई उस प्रकाश की अपेक्षा 
कोशिश की पर मै टिक न सका अपने पैरों पर,
और समाने लगा उस प्रकाश में, 
मैं पूरी सामर्थ्य से खुद को बाहर निकालना चाहता था पर !!!!!!
बस यही तक मुझे स्मरण है,
इसके बाद मैने खुद को पाया,
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पाँच अलग अलग हिस्सों में,
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पाँच तत्व मै बँट चुका था !
शायद मेरा अंत हो चुका था !
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या शुरुवात ????
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स्वरचित  
अमित  हिंदुस्तानी
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