कविता : जो खेतों से राजपथों तक 

जो खेतों से राजपथों तक 


जो धरती की माटी लेकर 

माथे , तिलक लगाते हैं।

जो खेतों से राजपथो तक

श्रम के गीत सुनाते हैं।

ये, श्रम के सच्चे सेनानी

इनका है चट्टान, वचन ।

हे !मजदूरों  तुम्हें नमन 

हे!श्रमवीरो तुम्हें नमन।।


जिनका स्वेद  ,गिरे धरा पर 

वो चंदन बन जाता है।

चट्टानों को काट काट जो 

गीत विजय के गाता है ।

संघर्षों में ,तपकर  भी जो

भीतर जिंदा रखे लगन ।

हे! मजदूरों तुम्हे नमन 

हे!श्रमवीरों तुम्हें नमन ।।


जो मांटी को सींच  रहे

अपने खून ,पसीने से

खूब संवरती धरती अपनी

श्रम  के इसी नगीने से ।

जिनके भीतर ही जलती है 

सूरज जैसे कोई अगन ।

हे! मजदूरों तुम्हें नमन 

हे!श्रमवीरों तुम्हे  नमन। ।

जिनका जीवन भीअर्पित

राष्ट्र के निर्माणो में 

आंखों में विश्वास दिखा है

मेहनत जिनके प्राणों में।

यह माटी के सच्चे सैनिक 

जो रखते खुशहाल वतन ।

हे! मजदूरों तुम्हें नमन 

हे!श्रमवीरो तुम्हें  नमन ।।

जो रहते हैं ,बुनियादो में

चकाचौंध से ,कोसों दूर 

अपना केवल फर्ज निभाते 

श्रम में जीने वाले शूर।

देश के खातिर ढला हुआ 

जिनका है, फौलाद बदन ।

हे! मजदूरो तुम्हे  नमन 

हे! श्रमवीरों  तुम्हे नमन। ।

✍️सतीश उपाध्याय 
छत्तीसगढ़ 
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