कविता : बाँसुरी हूँ मैं तुम्हारी



दृष्टि का विस्तार करके ध्यान से देखो मुझे 

तुम सदा पाओगे मुझको, वावरी हूँ मैं तुम्हारी ।







बिन तुम्हारे मैं अधूरी, और मुझ बिन तुम सदा ।

सृष्टि विधि की यह अनूठी, औ' रहेगी सर्वदा ।

सृष्टि का आधार है यह, सब करें पालन इसे

साँवरे हो तुम हमारे, साँवरी हूँ मैं तुम्हारी ।

तुम सदा पाओगे मुझको, वावरी हूँ मैं तुम्हारी ।।




देह ही केवल नहीं मैं, भावना से मैं भरी हूँ।

झर रही हूँ मैं निरन्तर, शुभ्र निर्मल निर्झरी हूँ ।

लोक हित में है समर्पित, पूर्ण यह जीवन हमारा

युग करों से भर उठा लो,  गागरी हूँ मैं तुम्हारी ।

तुम सदा पाओगे मुझको वावरी हूँ मैं तुम्हारी ।।




सप्त स्वर आनंद भरते, रागमय जीवन हुआ ।

भर दिया मधुरिम स्वरों से, प्रेम से जिसने छुआ ।

झर उठे संगीत सरिता, कान में मधुरस घुले

अरुण अधरों में सजा लो, बाँसुरी हूँ मैं तुम्हारी ।

तुम सदा पाओगे मुझको, वावरी हूँ मैं तुम्हारी ।।




शुभ्र तारे साथ लेकर, द्वार पर आओ कभी ।

मैं प्रतीक्षारत रहूँगी, नींद में होंगे सभी ।

स्निग्ध सुरभित श्याम कुंतल, को विखेरे राह में

हूँ खड़ी मुझको निहारो, विभावरी हूँ मैं तुम्हारी ।

तुम सदा पाओगे मुझको, वावरी हूँ मैं तुम्हारी ।।









  ✍️श्याम सुन्दर  श्रीवास्तव 'कोमल'

                           व्याख्याता-हिन्दी

       अशोक उ०मा०विद्यालय, लहार

              जिला-भिण्ड (म०प्र०)
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