कविता : मैं रावण हूं ✍️ अलका शर्मा

#मैं_रावण_हूं

मैं ब्रह्मा का परपोत्र,ऋषि विश्रवा का पुत्र
दैत्यराज की जन्मा कैकसी का जाया रावण हूं।।

मैं बलवान कुंभकर्ण विष्णुभक्त विभीषण का भ्राता
मैं इंद्रविजेता मेघनाथ,अतिकाय का तात रावण हूं।।

शिव तांडव स्तोत्र से शिव की क्षमा याचना करने वाला
मैं अर्थ सहिंता का ज्ञाता मैं त्रिकालदर्शी रावण हूं।।

मायावी शक्तियों से परिपूर्ण मैं अहंकार से भरा हुआ
मैं छल, कपट, दाम, दंड,भेद से विजेता रावण हूं।।

ज्ञात मुझे था अयोध्या में विष्णु ने अवतार लिया है
मैं सीता को छल से हरके राम से बैर लेने वाला रावण हूं।।

राक्षस होकर भी ज्ञान, विज्ञान ओर पांडित्य से ओतप्रोत
मैं राम को विजय श्री का आशीर्वाद देने वाला रावण हूं।।

महाकाल का भक्त अनन्य कैलाश पर्वत को उठाने वाला
मैं सीता जगदम्बा को हृदय में बसाने वाला रावण हूं।।

अपनी बहन के कहने से हरण किया पतिव्रता सिया का
मैं बिना उसकी आज्ञा के उसे न हाथ लगाने वाला रावण हूं।।

मेरी ही नहीं सम्पूर्ण राक्षस जाति के कल्याण को सोच
मैं ईश्वर से युद्ध करने के लिए डटा रहने वाला रावण हूं।।

किन्नर, देव, गन्धर्व, राक्षस कोई नहीं टिक सकता था
मैं नर रूप में हरि के हाथो से मोक्ष पाने वाला रावण हूं।।

जीवन भर दुराचार, अत्याचार किया अगर मैंने परंतु
मैं अपनी मुक्ति का द्वार जानने वाला रावण हूं।।

प्राण रहते राम के द्वारा लक्ष्मण का गुरु बनने वाला
मैं लक्ष्मण को नीति का ज्ञान देने वाला रावण हूं।।

राम के हाथो राम बाण से राम सम्मुख अंत समय मुख से
मैं श्री राम कहते ही राम में ही विलीन होने वाला रावण हूं।।

✍️लेखिका अलका शर्मा

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