कविता : लेखक ✍️रंगनाथ द्विवेदी

मेरी एै परदेश के चाँद

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बहुत उदास होगी इस महिने मेरी गुलमुहर!
तड़प रही होगी————
एक-एक पल उस खिड़की को खोले,
जिस खिड़की से———–
अपने ब्याह की पहली सुबह उसने देखा था,
बिल्कुल अपने गुलाबी साड़ी की तरह——-
डालो पे खिली गुलमुहर।
उस प्रेम के सुबह की वे रोमानियत,
जब बड़े प्यार से कहां था उसे मैने——–
कि तुम लाख तको लेकिन मै न तकुंगा,
खिड़की के उस तरफ क्योंकि,
मेरे बहुत करीब खड़ी है————-
मेरी जिंदगी और मेरी गुलमुहर।
ये फिर वही सिजन है————
जब अपनी शाखो पे खिलती है गुलमुहर,
उसने फिर खोली होगी वे खिड़की अलसुबह,
और तक रही होगी अपनी नम और भीगी आँखो से,
शायद उसकी टीस और विरह पे मुस्कुरा रही होगी———
अबकी गुलमुहर।
एै परदेश के चाँद उससे कहना,
कि मेरी यादो में खिलती है और साँस-साँस जीती है—–
मेरी गुलमुहर।
-रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
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