कविता – कर्म ही धर्म है


मैं धार्मिक आदमी हूं
मुझे पसंद है
मिट्टी की मूर्तियां मंदिर मस्जिद-
गिरिजा गुरूद्वारा बनाना
स्तुतियां करना
धार्मिक परंपराओं को निभाना
टीवी मीडिया में दिखाना
बढ़ा चढ़ाकर बताना
किसी अन्य चीज पर कभी ध्यान न देना
बस अपने अल्लाह गाॅड भगवान में
व्यस्त रहना
शौक था अपना!
बीबी बच्चे परिवार समाज देश की
परवाह कभी नहीं किया
बस मग्न हो स्वयं में जीया।
खुदा राजी तो सब राजी था सोचता
लेकिन थी यह मेरी मूर्खता
पैदा वही किया है वही मारेगा
आएगी कोई आपदा तो बचा लेगा?
बात तो सौ फीसदी सही है
फिर सब क्यों देते हैं मुझे ताने
बात बात पर आते हैं सुनाने
पूजा पाठ के अलावे कुछ और
कर्तव्य दायित्व हैं होते
जिसके लिए कई तरह के संसाधन हैं जुटाते
बताते समझाते
पर सुन हम थे अंठियाते !
सो निकम्मा निकृष्ट की संज्ञा दे जाते
पीठ पीछे करते थे बुराई !
सदा होती थी अपनी जग हंसाई
फिर एक दिन अचानक सुनामी एक आई
मूर्त्तियां मंदिर मस्जिद बहा ले गई
सारी स्तुतियां इबादत मेरी धरी रह गई
जिन्होंने बना रखी थी नौका
लगाया मौके पर चौका
सवार हो उड़नछू हुए
देश और परिवार को बचा ले गए!
मेरी बनाई इमारतें, इबादतें, स्तुतियां
काम न आ सकीं!
बहा ले गई मेरी सारी जमा-पूंजी
डुबो दिया मेरा संसार
उजड़ गया मेरा घर बार।
अब मरकर सोच रहा हूं
वो लोग कितने अच्छे थे
जो चेताते थे,
समझाते थे
बताते थे
मजाक उड़ाते थे
कि घर परिवार संसार पर दो ध्यान
वरना एक दिन बन जाएगा श्मशान?
पर मग्न रहा मैं भगवान और भक्ति में
विश्वास इतना था उनकी शक्ति में
पर एक सुनामी ने बता दिया
सिखा दिया
ईश्वर भक्ति के साथ गृहस्थी है जरूरी
बिना इसके हर सय है अधूरी
उसकी सुरक्षा हेतु संसाधन जुटाने पड़ते हैं
आपतकाल के इंतजाम करने पड़ते हैं
वरना एक छोटी सुनामी भी
मचा सकती है हाहाकार
देखा न कैसे?
तबाह हुआ मेरा घर बार!
अब आहें भरने से क्या फायदा?
जानें आपदा में ईश्वर नहीं आते,
स्वयं हाथ गोड हैं चलाते!
अब सोचो मत
भिड़ा जुगत
सबकुछ ईश्वर पर न छोड़
मेहनत करो जी तोड़
यही सफलता का है मंत्र
अपने कर कमलों को ही मानो यंत्र
यही सत्य है
और सत्य शिव से भी सुंदर है
“सत्यम शिवम सुंदरम”
कठोपनिषद में है वर्णन।
लेखक- ✍️मो.मंजूर आलम
उर्फ नवाब मंजूर
सलेमपुर, छपरा, बिहार।
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