लोकतंत्र का सावन वायदों की बरसात ✍️ अनुराधा सिंह

हम भारत के लोग भारत के लोकतन्त्रात्मक ढांचे में पूर्ण आस्था एवं विश्वास रखते हुये मतदान करते हैं और अपने पंचायतों, निकायों,राज्य अथवा राष्ट्र के जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र के विकास, मानव की गरिमा के विकास, राष्ट्र की प्रगति, नागरिकों में समता, आदि संवैधानिक तत्वों के आलोक में राष्ट्र के निर्माण हेतु निर्वाचित कर उन्हे सामान्य से विशिष्टअधिकार प्राप्त व्यक्ति बनाते हैं|

 

लोकतन्त्र की प्रणाली सर्वश्रेष्ठ शासन प्रणाली मानी जाती है क्योकि इसमें समस्त नागरिक समान मताधिकार का प्रयोग कर अपने जनप्रतिनिधि को निर्वाचित करते हैं इस प्रकार शासन के निर्वाचन में प्रत्यक्षतः सम्मिलित होकर नागरिक शासन में अप्रत्यक्षतः सम्मिलित होते हैं|

सत्रहवीं लोकसभा के निर्वाचन का आगाज़ हो चुका है| निर्वाचन आयोग नें इस लोकसभा के निर्वाचन हेतु सात चरणों में चुनाव तिथियों की घोषणा के साथ आदर्श आचार संहिता लागू कर दी है| आदर्श आचार संहिता नाम से ही स्पष्ट है कि इसके लागू होते ही हर राजनैतिक व्यक्ति और दल को अपना आचरण आदर्श संहिता के अनुरूप बनाये रखना होगा इसके उल्लंघन पर निर्वाचन आयोग को शक्तियॉ प्राप्त हैं|

सत्रहवीं लोकसभा के निर्वाचन के आगाज़ के साथ ही निर्वाचन रूपी सावन में राजनैतिक दलों के मॉनसून अपने प्रबल रूप में आकर मतदाताओं को लुभाने हेतु वायदों की मूसलाधार बारिश कर रहे हैं|

हर राजनैतिक दल अपने चुनावी मॉनसून में अलग अलग वायदों की बारिश कर रहा है कहीं गरीबी हटाने के वायदे, कहीं सजग चौकीदारी के रूप में भ्रष्टाचार का विरोध दर्शाते हुये सुशासन की लोकलुभावन वायदे, कहीं राष्ट्र की धर्मनिरपेक्षता को अक्षुण्ण रखने की बात, कहीं कट्टर राष्ट्रवाद, कहीं नई रीति नई नीति का भारत, तो कहीं नये सपनों का गरीबी मुक्त भारत, कहीं बेटी बचाने की बात, तो कहीं भगोड़ों के वापसी की बात, बहुतेरी बातें हर भाषण में सम्पूर्ण भारत में वायदों की जोरदार बारिश हो रही है|

 

यदि कोई पहली बार इन वायदों की बारिश में भीग रहा हो तो उसे यह लग सकता है कि इस खुशनुमा वायदों की बरसात के बाद राष्ट्र में सुशासन की जो फसल लहलहायेगी उससे गरीबी, भ्रष्टाचार, अपराध, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी सेवायें सब सही हो ही जायेंगी| पर यदि आप इस निर्वाचनी मॉनसून के वायदों की बारिश में इसके पूर्व कभी भीगे होंगे तो आप यह जानते होंगे कि यह बारिश चन्द समय की है बाकी तो सूखे का ही सामना होगा या कहीं कहीं गरज चमक के साथ विकास, सुशासन के छीटें पड़ सकते हैं|

सच्चाई यह है कि “गरीबी हटाओ” हमारे लोकतन्त्र में तीसरी पीढ़ी के वायदे की बारिश है भ्रष्टाचार से हम आज़ादी के बाद से ही निपट रहे हैं या यह कहें कि भ्रष्टाचार से लड़ते लड़ते आजादी के बाद से ही लोग निपटते जा रहे हैं पर भ्रष्टाचार का निपटारा नहीं हो पा रहा, भारत की तेईस प्रतिशत आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे का जीवन निर्वाह कर रही है, विश्व के सर्वाधिक गरीब हमारे ही देश में निवास कर रहे हैं, वहीं धनकुबेरों की संख्या भी आशा से अधिक हमारे ही देश में बढ़ रही है बहुत सी ऐसी ही विरोधाभासी बातें हैं जिन पर हम इस चुनावी सावन में वायदों की बारिश में भीगते हुये विचार कर सकते हैं, पर एक कड़वा सच तो यह है कि इस चुनावी सावन के बाद हम सबका सामना बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार आदि जैसी चमकती कड़ी धूप से ही होता है|

आखिर हमारा हर राजनैतिक दल पहली लोकसभा से हम सब भारतवासियों पर ऐसे चुनावी सावन में इन सब समस्याओं को दूर कर देने के वायदों की झमाझम बारिश करता है तब भी अभीष्ट अभी तक हमें प्राप्त क्यू नहीं हो रहा?, जिस लक्ष्य को हम पाना चाहते हैं वहॉ तक हम पहुंच क्यूं नही रहे? चुनावी सावन के वायदों की बारिश इतनी बेमानी सी क्यू हो जाती है? ऐसा शायद इसलिये है क्योकि सत्ता प्राप्त करने के बाद प्राथमिकतायें परिवर्तित हो जाती हैं, सोच में परिवर्तन हो जाता है, निश्चय बदल जाते हैं या सत्ता ऐसे ही लोकलुभावन वायदों से मिलती है| यदि यह सच है कि सत्ता ऐसे ही लोकलुभावन वायदों से मिलती है तो यह कब तक हो सकेगा कभी तो लोक जग जायेगा और तब यह वायदों की बारिश सत्ता की फसल नहीं दे सकेगी। 

यदि हमें अपनें लोकतन्त्र की श्रेष्ठता को कायम रखना है तो हमारे राजनैतिक व्यक्तियों और दलों को इस चुनावी सावन में वायदों की बारिश से सत्ता की लहलहाती फसल की अपेक्षा के साथ साथ सुशासन, भ्रष्टाचार रहित वातावरण, रोजगार, उत्तम स्वास्थ्य सुविधाओं आदि की फसल को भी उन्नत बनाने की ओर ठोस और धरातलीय काम करना होगा|

लेखिका – अनुराधा सिंह
बहराइच
उत्तर प्रदेश

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