भारत की सम्प्रभुता पर हमला बर्दाश्त नहीं✍️ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना, न्यूज एडीटर सच की दस्तक नेशनल मैग्जीन

(ईंट का जवाब पत्थर से नहीं पहाड़ से) 

__आकांक्षा सक्सेना, 
न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक 
आज, 14 फरवरी 2019 को एक बार फिर जम्मू-कश्मीर के पुलवामा जिले में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। 42 जवानों के शहीद होने की खबर है और 40 से ज्यादा घायल हुए हैं। यह कायराना हमला जम्मू-कश्मीर के अवंतीपोरा के गोरीपोरा इलाके में हुआ है। जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सीआरपीएफ जवानों को उस वक्त निशाना बनाया जब उनका काफिला जम्मू-कश्मीर जा रहा था। काफिले में सैनिकों के 70 वाहन थे। 
जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने सैनिकों के काफिले पर गोलीबारी करने के साथ ही कार के जरिए आत्मघाती हमला किया। आईआईडी ब्लास्ट में 40 सैनिक शहीद हो गए।  बताया जा रहा है कि यह धमाका इतना जबरदस्त था जिसकी आवाज पांच किलोमीटर तक सुनी गई और काफिले में चल रहे कई वाहन इसकी चपेट में आ गए हैं। सूत्रों के मुताबिक यह आतंकी हमला 18सितंबर 2016 में ऊरी में हुए हमले से भी बड़ा बताया जा रहा है और आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने इस हमले की जिम्मेदारी ली है। इसी तरह उरी हमले से पहले 02 जनवरी 2016 को सुबह साढ़े तीन बजे पठानकोट एयरबेस पर भी आतंकी हमला हुआ था। इस आतंकी हमले में छह आतंकवादी शामिल थे। आतंकी हमले के बाद 65 घंटे तक चले सेना के ऑपरेशन में सभी आतंकवादियों को मारा गिराया गया था। हालांकि, इस हमले में देश के सात वीर जवान शहीद हो गए थे और 37 जवान घायल हुए थे।
इस पुलवामा आत्मघाती हमले के पीछे जैश के आतंकी आदिल अहमद डार के हाथ होने की बात सामने आ रही है। इससे पहले 12 फरवरी को भी सुरक्षा बलों की पुलवामा जिले के रतनीपुरा इलाके में आतंकियों से मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने एक आतंकी को मार गिराया था। हालांकि मुठभेड़ के दौरान एक जवान भी शहीद हो गया था, जबकि एक अन्य जवाब गंभीर रूप से घायल हुआ था। इससे पहले 06 फरवरी को भी पुलवामा जिले में सुरक्षाबलों और आतंकियों के बीच हुई मुठभेड़ में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) का एक स्वयंभू जिला कमांडर मारा गया था।
इस हमले के बाद जम्मू-कश्मीर समेत देश के अन्य हिस्सों में अलर्ट घोषित और नेट सुविधा बंद कर दी गई है। मालूम हो कि भारतीय खुफिया एजेंसियां पिछले कुछ महीनों से आतंकी हमलों को लेकर लगातार अलर्ट जारी कर रही हैं। खुफिया एजेंसियों के इनपुट पर सुरक्षा एजेंसियों ने गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2019) से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर व दिल्ली समेत देश के अलग-अलग हिस्सों से 10 से ज्यादा संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार भी किया था। हालांकि उरी और पठानकोट हमलों के बाद देश के भीतर सेना और अर्धसैनिक बलों ने हर आतंकी वारदात का मुंहतोड़ जवाब दिया है। 
यही वजह है कि इन हमलों के बाद आतंकियों के हर मंसूबे नाकाम हुए हैं। सुरक्षा बलों ने केवल जम्मू-कश्मीर में ही 2018 में तकरीबन 230 आतंकियों को मारने में सफलता प्राप्त की है। सुरक्षा बलों की इस कार्यवाही का ही नतीजा है कि आतंकी घटनाओं के लिए बेहद संवेदनशील माने जाने वाले जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले को पिछले महीने आतंकवाद मुक्त जिला घोषित किया गया था।
कहा जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर में सेना के ऑपरेशन से आतंकी बौखलाए हुए थे, मौका पाकर उन्होंने सेना के काफिले पर कायरानाम आत्मघाती हमला कर दिया। यह पहली बार नहीं है जब जम्मू-कश्मीर में आतंकियों ने सेना के जवानों पर इस तरह का फिदायनी हमला किया है। इससे पहले 2001-2002 में भी आतंकियों ने इसी तरह का फिदायनी हमला किया था। 
इस हिंसा पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हमारे बहादुर सैनिकों का यह बलिदान व्यर्थ नहीं जायेगा। देश शहीद सैनिकों के परिवारों के साथ कंधे  से कंधा मिलाकर खड़ा है। इस आत्मघाती आतंकी हमले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनएसए अजीत डोबाल से बातचीत की है। तथा जैश को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने की लिखित मांग की। वहीं, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का कहना है कि आतंक के खिलाफ पूरा देश एकजुट है और जनरल वी• के• सिंह ने ट्वीट किया कि एक सिपाही और भारतीय नागरिक होने के नाते ऐसे कायराना हमले से मेरा खून खौलता है। जवानों के खून के एक-एक बूंद का बदला लिया जाएगा।
जैश-ए-मोहम्मद के इस कायरानाम हमले को लेकर सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक, हर भारतीय घरों में शोक की लहर के साथ ही आक्रोश है। साथ ही एक सवाल भी कि आखिर! कब तक यूँ घरों के चिराग बुझते रहेगें? पूरे देश में एक बार फिर आतंक को लेकर गुस्सा और आक्रोश व्याप्त है , साथ ही सवाल भी कि आखिर! कब तक। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि सैनिकों की शहादत को हिंदुस्तान कब तक सहता रहेगा? क्या पाक को उसके इस नापाक हरकत के लिए सबक नहीं मिलना चाहिए? सच तो यह है कि सांप काम ही है डसना तो ऐसे हमले बीच-बीच में होते रहेंगे क्योंकि जानवर की पूँछ सीधी होनी से रही। यही बात हम सबको समझनी होगी और इस पर निंदा और भर्त्सना के बजाए एक सोची-समझी ठोस योजना के मुताबिक़ इन आतंकवादियों का सामना करना होगा। हमें ईंट का जवाब पत्थर से नहीं बल्कि पूरे पहाड़ से देना होगा क्योंकि भारत की सम्प्रभुता पर हमला अब बर्दाश्त नहीं। जब हम राजनैतिक दलों जैसे महबूबा मुफ्ती के मुंह से ‘कश्मीरियत’ व पत्थरबाजों के लिए ‘बच्चों’ शब्द का प्रयोग करते सुनते हैं तो समझ आता है कि आतंक की जड़ें कितनी गहरी हैं। 
अब करना तो यह चाहिए कि भारत को पाकिस्तान से हर तरह की कनेक्टिविटी बंद कर देनी चाहिए चाहे वह पानी हो, चाहे वह इंटरनेट हो या किसी तरह की यात्रा हो। क्योंकि जब वह अचानक ऊरी, पुलवामा जैसी कायराना हरकत कर सकता है तो कभी अचानक न्यूक्लियर अटैक भी कर सकता है और सरकार को सोचना होगा कि कब तक हम यूँ हाथ पर हांथ रखें अपने वीर सपूतों के सामने दोषी नजरों से पछतावे के आँसू रोते रहेगें। हमें भी अचानक वो कर देना चाहिए जिसके कि पाक लायक है। नेहरू के समय में राष्ट्र को वीटो मिल रही थी पर नेहरू ने वह वीटो चीन को सौंप कर अपने ही पांव काट दिये और वह दिन कौन भूल सकता है जब उस चीन ने वीटो मिलते ही तुरंत ही भारत पर हमला कर दिया था। हमें किसी को मौके से पहले ही चौके की रणनीति अपनानी होगी। 
क्योंकि, जब तक हमारे देश में आतंकवादियों के हिमायती जयचंद जैसे भितरघातियों पर सुरक्षा एजेंसियों की शनि दृष्टि नहीं पड़ेगी तब तक खुद को सुरक्षित मानना बहुत बड़ी भूल होगी। जब पता चलता है कि गाड़ी भर बारूद था तो समझ आता है कि रगों में गद्दारी का नमन कितना घुला होगा। सरकार को चाहिए कि पूरे देश में अवैध रूप हो या किसी रूप, बारूद को बेन कर दिया जाये और इंटरनेट प्रणाली पर नजर रखी जाये और इन पत्थरबाजों व अमन और चैन के दुश्मनों को किसी भी मानवाधिकार के तहत बख्शा न जाये। क्योंकि पीठ पर वार करने वाले पर सामने से वार करने में सोचना क्या। 
जैसा की अपेक्षित था, हर टीवी चैनल पर चीखना-चिल्लाना और बहस आरम्भ हो गयी। पर बे-मकसद की इन बहसों से इतना तो पता चलता है कि जहां एक ओर आतंकवादी और भारत को तोड़ने में संलग्न जयचंदों जैसी शक्तियां अपने मकसद को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं, वहीं हम सब एक भ्रांति में जी रहे हैं कि हमला तो वहां हुआ। 
दिल्ली या देश के अन्य चकाचौंध वाले नगरों में रह रहे लोगों को लगता है कि यह समस्या सिर्फ कश्मीर की है (या उन प्रदेशों की है जहाँ नक्सलवादियों की गोलियां चलती है) और उनके लिए यह सिर्फ एक बहस का मुद्दा है। इस कारण समझदार लोग सरकार के सिर ठीकरा फोड़कर अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं। 
आश्चर्य की बात है कि कई बुद्धिजीवी और नेता भी चाहते हैं कि हम इस भ्रान्ति में उलझे रहें ताकि उनकी राजनीति की दुकानें बिना किसी अवरोध के चलती रहे। पर हमारा हित इस भ्रान्ति से बाहर निकलने में है। हमें समझना होगा कि यह समस्या पूरे देश की समस्या है। यह हमला सिर्फ़ वहां नहीं यह हमारे अस्तित्व पर हमला है। 
यह जागने का समय है सजग होने का। निंदा करके इन घटनाओं को भुला देना हमारी सबसे बड़ी कमज़ोरी रही है। हमें सजग होना होगा। हम सजग होंगे तभी सरकार सजग होगी और एक बड़ी क्रांति होगी जिससे शांति और समृद्धि के नये सूर्य का उदय हो सकेगा। 
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