ट्रेन का सफर या मौत की दस्तक – ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना

(ट्रेन का जनरल डिब्बा या मौत का डिब्बा) – 
-ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना 
भारत का सबसे बड़ा सार्वजनिक उपक्रम यदि कोई है तो वह है भारतीय रेल। और भारतीय रेल का विश्व प्रसिद्ध श्लोगन है ”राष्ट्र की जीवन रेखा” (Lifeline of the Nation) आपको पता ही होगा कि हमारी भारतीय रेलवे का नेटवर्क दुनिया के टॉप-5 नेटवर्क में से एक है और करीब 18 लाख कर्मचारियों को रोजगार देने वाला सबसे बड़ा विभाग है। अब भारतीय रेल देश के कोने-कोने तक पहुंच रही है, लेकिन अपने भारत देश की पहली ट्रेन  16 अप्रैल 1853 को पहली ट्रेन चलाई गई थी और यह ट्रेन 35 किलोमीटर की दूरी पर चलाई गई और यह ट्रेन बोरीबंदर (छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से ठाणे के बीच चलाई गई थी। इस रेलगाड़ी को ब्रिटेन से मंगवाए गए तीन भाप इंजन सुल्तान, सिंधु और साहिब ने खींचा था।20 डिब्बों की इस ट्रेन में 400 यात्रियों ने सफर किया था। यह ट्रेन दोपहर 3.35 पर बोरीबंदर (छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से प्रारम्भ हुई और शाम 4.45 बजे ठाणे पहुंची। इस रेलगाड़ी ने 34 किलोमीटर का सफर तय किया था। इसके बाद 1845 में कलकत्ता में ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेल कंपनी की स्थापना हुई और 1850 में इस कंपनी ने मुंबई से ठाणे तक रेल लाइन बिछाने का काम शुरू किया था।इसके बाद भारत में 1856 में भाप इंजन बनना शुरू हुए फिर धीरे-धीरे अथक परिश्रम से रेल की पटरियां बिछाई गईं। पहले नैरोगेज पर रेल चली, उसके बाद मीटरगेज और ब्रॉडगेज लाइन बिछाई गई। 1 मार्च 1969 को देश की पहली सुपरफास्ट ट्रेन ब्रॉडगेज लाइन पर दिल्ली से हावड़ा के बीच चलाई गई गौरतलब हो कि महान वैज्ञानिक जॉर्ज स्टीफेंसन ने 1814 में भाप का इंजन बनाया, जो शक्तिशाली तो था ही, साथ ही अपने से भारी वस्तुओं को खींचने में भी सक्षम था। 27 सितंबर 1825 को भाप इंजन की सहायता से 38 रेल डिब्बों को खींचा गया जिनमें 600 यात्री सवार थे। इस पहली रेलगाड़ी ने लंदन के डार्लिंगटन से स्टॉकटोन तक का 37 मील का सफर 14 मील प्रति घंटे की रफ्तार से तय किया। इस घटना के बाद अनेक देश रेल के इंजन और डिब्बे बनाने में जुट गए।
इस सबके बाद एक खुशी की खबर आयी कि जब 1905 में भारतीय रेलवे बोर्ड की स्थापना हुई फिर 1950 में भारतीय रेल का राष्ट्रीयकरण हो गया। बता दें कि भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में रेल लाइन सबसे अधिक है? और भारतीय रेलवे का सर्वाधिक रेलगाड़ियां चलाने वाला रेलवे स्‍टेशन  कानपुर है जहां (प्रतिदिन 300 गाडि़यों का परिचालन, सबसे अधिक 48 डायमण्‍ड रेल क्रॉसिंग) हैं। वहीं  मुम्‍बई में बान्‍द्रा और अन्‍धेरी के बीच (सात समान्‍तर लाइनें) इन दो रेलवे स्‍टेशनों के बीच सर्वाधिक रेलवे लाइने हैं? यह बात जगजाहिर है कि भारतीय रेलवे विश्व में अपनी कुशलता के लिए टॉप-5 नेटवर्क में गिना जाता है पर आज भारतीय रेलवे अपनी सर्विस के लिए बहुत निचले स्तर पर है चाहे बोतल बंद गंदे पानी की जनसमस्या हो, चाहे बासे और गंदे खाने की अनेकों जन शिकायतें सेे जूझते हम सब आम जन क्यों ना हों। और ऐसी बात नहीं कि रेलवे मंत्री पीयूष गोयल जी ने जन शिकायतों का संज्ञान ना लिया हो। सच तो यह है कि वो एक बेेहतरीन मानवीय संवेदनाओं से ओतप्रोत बेहतरीन रेल मंंत्री साबित हुए।
मैं रेल मंत्री जी और भारत सरकार के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी जी से रेलवे में सीमातोड़ भीड़ की गर्मी और घुटन से होने वाली उन अकाल मौतों की जानकारी देना चाहती हूँ जिनसे प्रतिदिन आमजन जूझ रहा है जो सजग होता है उसकी खबर तो मीडिया दिखा देता व लिख देता है पर बहुत से ऐसे दुखी लोग हैं जिनकी आवाज़ मीडिया तक नहीं पहुंच पाती। हम उन्हीं सब पीड़ितों के दर्द को भारतीय रेलवे को रूबरू कराना चाहती हूँ जिससेे आप इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने में सज्य हो सके। बात 11 जून 2019 की है जब पूरा उत्तर भारत में इन दिनों भयंकर गर्मी की मार झेल रहा है वहीं दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा औऱ राजस्थान समेत कई राज्यों में परा 45 डिग्री के आसपास दर्ज किया जा रहा है।  इस बीच हैरान करने वाली खबर सामने आ रही है। उत्तर प्रदेश के आगरा से कोयंबटूर जा रही केरल एक्सप्रेस में चार(जांच के बाद डॉ. कुशवाह ने गर्मी के कारण एस-8 में में कोन्नूर नीलगिरी तमिलनाडु निवासी पाचीयप्पा के बुंदर पालानी सामी (80) वर्ष निवासी कोन्नूर नीलगिरी तमिलनाडु, बालाकृष्णन रामास्वामी (69) तथा एस-9 में सवार कोयम्बटूर निवासी चिन्नारे की 71 वर्षीय पत्नी धीवा नाई को मृत घोषित कर दिया।
साथी यात्रियों ने बताया कि दस दिन पहले हम सभी 68 लोग तमिलनाडु से वाराणसी और आगरा घूमने आए थे।) एक रिपोर्ट के मुताबिक जब ये ट्रेन आगरा से रवाना होकर झांसी स्टेशन पहुंची उसी दौरान स्लीपर कोच में बैठे चार यात्रियों की गर्मी के कारण दम घुटने से मौत हो गई। उनके शवों को पोस्टमार्टम के लिए झांसी के अस्पताल में भेज दिया गया है। चार मृतकों में एक महिला और 3 पुरुष यात्री हैं जिनकी उम्र 70 के आसपास थी। शुरुआती जांच के मुताबिक इन सभी की मौत कोच के अंदर भीषण गर्मी के कारण दम घुटने से हुई।  इसके बाद  हमसफर एक्सप्रेस जैसी लग्जरी ट्रेनों में एसी फेल होने की शिकायतें बराबर आ रही हैं। इतना ही नहीं गंदगी, बदबूदार शौचालय, खराब चार्जिंग पॉइंट व दैनिक यात्रियों द्वारा सीटों पर कब्जे को लेकर धक्कामुक्की, मारपीट तक के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं।
जब एक यात्री सुजीत कुमार ने सोशल मीडिया पर शिकायत दर्ज कराई कि 12572 हमसफर एक्सप्रेस की बी-16 बोगी में एसी कूलिंग ठप होने से घुटन के चलते एक यात्री बेहोश हो गया। पानी की छींटे मारने पर काफी देर बाद वह होश में आया। अभिनव श्रीवास्तव ने कहा कि हमसफर के शौचालय इस्तेमाल करने लायक नहीं थे। वहीं 15048 पूर्वांचल एक्सप्रेस के यात्री घनश्याम व एमए अशरफ ने कहाकि बी-1 बोगी में एसी काम नहीं कर रहा था, जिसे शिकायत पर भी ठीक नहीं करवाया गया। 15008 कृषक एक्सप्रेस के यात्री शशिकांत जायसवाल ने बताया कि बी-1 बोगी में एसी कूलिंग नहीं हो रही थी। कोच कंडक्टर ने शिकायत पर भी इसे ठीक नहीं कराया। 15004 चौरी चौरा एक्सप्रेस के यात्री कृष्ण गोपाल पांडेय ने अपना दर्द जाहिर कर कहा था कि बीई-1 बोगी में एसी ठीक से काम नहीं कर रहा था। इसी क्रम में 25 मई 2019 उमस भरी गर्मी और बेतहाशा भीड़ के कारण 25 मई को इलाहाबाद के पास ब्रह्मापुत्र मेल में दम घुटन से एक मासूम बच्ची की मौत हो गई थी। यह सुबह 10.45 बजे का समय था जब भागलपुर से आनंद विहार टर्मिनल जाने के लिए विक्रमशिला एक्सप्रेस प्लेटफार्म संख्या एक पर खड़ी थी। जेनरल कोच में सवार होने के लिए लोग कतारबद्ध थे। रेलवे सुरक्षा बल के जवान सभी यात्रियों को बोगी में प्रवेश करा रहे थे। तब तक 11 बज गया था। बोगी के अंदर बांका निवासी महिला अपने चार महीने के बच्ची के साथ बड़ी मुश्किल से प्रवेश की। वह किसी तरह खड़ा होने की कोशिश कर रही थी। कैरेज स्टैंड पर यात्री बैठे हुए थे। महिला ने बताया कि उसका पति दिल्ली में रोजगार करता है। ट्रेन में खड़ा होने की जगह नही है। सौ सीट वाले कोच में 250 से ज्यादा यात्री सवार थे। गर्मी के कारण कोच में हवा भी नहीं आ रही थी।विक्रमशिला एक्सप्रेस के गुजरने के बाद 11.28 बजे दानापुर से साहिबगंज जाने वाली इंटरसिटी भी प्लेटफार्म संख्या एक पर पहुंची। ट्रेन के कोच में बेतहाशा भीड़ थी। गर्मी के कारण बच्चे काफी परेशान दिखे। बुजुर्ग यात्री भी पसीने से सराबोर थे। सीट के अलावा यात्री फर्श से लेकर शौचालय तक में खड़े होकर यात्रा करने को मजबूर थे। क्षमता से अधिक यात्रियों के बैठने के कारण कोच ओवरवेट था। भीड़ के कारण दर्जनों यात्री कोच में नहीं घुस सके।
इस ट्रेन के जनरल डिब्बे में पहले से ही जानमारू भीड़ थी। वहीं 1 जून 2019 की खबर ने दिल दहला दिया था जब  मानिकपुर से झांसी की ओर आ रही ट्रेन में सफर करने वाली एक युवती को अचानक तबियत बिगड़ने से घुटन होने लगी। इससे पहले उसे उपचार दिया जाता उसकी मौत हो गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर कार्रवाही शुरु कर दी है। तभी एक और दूसरी खबर ने हम सब को स्तब्ध कर दिया जब यूपी सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में 18 वर्षीय सीता अपनी बहन गीता और मां कमला के साथ सफर कर रही थी। गीता के अनुसार वह दिल्ली में मजूदरी कर पेट पालते हैं। मजदूरी करने के लिए वह दिल्ली जा रहे थे। उसकी बहन सीता बीमार रहती थी। अचानक रास्ते में तबियत बिगड़ने उसे घुटन होने लगी। इससे पहले उसे उपचार मिलता उसकी मौत हो गई। इसी तरह ट्रेनों में जनरल डिब्बों में भीड़ की उमस से लोग मरते रहेे तो यह जनरल डिब्बा मौत के डिब्बे के नाम से जाना जाने लगेगा। एक खबर 2 0जून की है जब बिहार के गया के बलजौरी इलाके के रहने वाले दिलचन्द्र 26 पुत्र बालक जौहरी अपने जीजा मांझी के साथ अंबाला में एक प्लाईवुड फैक्ट्री में काम करते थे। बीते बुधवार को दोनों घर आने के लिए अमृतसर एक्सप्रेस की जरनल डिब्बे में बैठे थे।
मांझी ने पोस्टमार्टम हाऊस पर बताया कि दिलचन्द्र की तबीयत ठीक नहीं थी। ट्रेन में बैठने से पहले ही तीन टाईम की दवा ले ली थी। चूंकि डिब्बे में भीषण भीड़ थी, लोग एक के ऊपर एक लदे हुए थे इसीलिए बैठने के लिए सीट नहीं मिली तो वह नीचे चादर बिछा कर बैठ गए। रास्ते में उनके पैर में दर्द हुआ तो जीजा पैर दबाने लगे। कुछ ही देर में हलचल तेज हो गई और भीड़ ज्यादा होने के कारण उनका दम घुटने लगा। इस बीच दिलचन्द्र को ठीक से सास भी नहीं ले पा रहे थे उनको बहुत पसीना आ रहा था। किसी तरह वह सो गए। काफी देर बाद भी जब वह नहीं जागे तो जीजा ने दवा खाने के लिए उठाया। लेकिन वह नहीं उठे उनकी मौत हो चुकी थी। साले की दिल की धड़कने बंद देख जीजा फूट फूट कर रोने लगे। एक यात्री ने फोन कर जानकारी जीआरपी को दी। सूचना मिलते ही जीआरपी मौके पर पहुंच गई और दिलचन्द्र को फौरन बरेली जंक्शन पर उतार लिया गया। उन्हें डाक्टर के पास ले जाया गया जहां उन्हें उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने मौत की सूचना परिजनों को दे दी। मृतक की पत्नी का नाम रेशमा देवी है और उसकी मां का नाम सरस्वती देवी है। देर शाम तक परिजन बरेली नहीं पहुंचे थे। इसी क्रम में सहारनपुर. भारी गर्मी के दौरान भीड़ के बीच फंसे एक वृद्ध की चलती ट्रेन में मौत हो गई।
आशंका जताई जा रही है कि भीड़ में फंसकर इस वृद्ध यात्री को सांस नहीं आया और दम घुटने से मौत हो गई। यह दुर्घटना तब हुई जब जनसेवा एक्सप्रेस लक्सर स्टेशन से सहारनपुर की ओर रवाना हो रही थी। बताया जा रहा है कि ट्रेन के लक्सर स्टेशन से रवाना होते ही इस यात्री ने दम तोड़ दिया था और बाद में  ट्रेन के सहारनपुर पहुंचने पर जीआरपी ने शव को  ट्रेन से उतरवाकर पोस्ट मार्टम के लिए भिजवाया। दर्दनाक यह भी घटना रही जब बिहार के माधोपुरा के रहने वाले 56 वर्षीय सुखदेव पासवान अपने भाई फुल्टन पासवान और भतीजे के साथ जनसेवा एक्सप्रेस में सहरसा से जालंधर जा रहे थे। फुलटेन के मुताबिक ट्रेन में काफी भीड़ थी और उनके भाई को सांस लेने में परेशानी हो रही थी।
जब ट्रेन लक्सर स्टेशन पहुंची तो अचानक से बहुत से यात्री ट्रेन में सवार हो गए। पीछे से धक्का लगा तो उनके भाई  सिर नीचे करके बैठ गए और इसी दौरान काफी लोग आ गए। भीड़ अधिक हो जाने की वजह से उनके भाई को सांस लेने में परेशानी होने लगी और वह चिल्लाने लगे पानी मांगने लगे। फुलटेन की मानें तो उन्होंने भीड़ को हटाते हुए अपने भाई को पानी पिलाया, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। उनके भाई की हालत काफी बिगड़ चुकी थी ओर वो सांस नहीं ले पा रहे थे।  ट्रेन के रवाना होने के कुछ ही देर बाद उनके भाई ने दम तोड़ दिया और सहारनपुर स्टेशन तक वह अपने भाई की डेड बॉडी के साथ ही बैठे रहे।
इस  ट्रेन में जानलेवा सफर की हकीकत इतनी भयावह है कि यहां ट्रेन के हर कोच में कपड़े का झूला बनाकर गरीब यात्री 1500 किमी का सफर तय कर रहे हैं? यह स्याह हकीकत जनसेवा एक्सप्रेस की ही नहीं ज्यादातर सभी ट्रेनों के जनरल कोच की  है सके हर कोच में सीट में कपड़े को बांधकर यात्री झूला बना लेते हैं और फिर इसमें लेटकर डेढ़ हजार किलोमीटर से अधिक का सफर रोज तय करते हैं जिससे हजारों वो मजदूर जिन्हें रोज ही यह कष्टकारी सफर करना पड़ रहा है, वे अपनी कमर और रीढ़ हड्डी में भयंकर दर्द व सूजन से तड़पते देखे गये हैं। यह ट्रेन का सफर सचमुच जानलेवा बनता जा रहा है जो असहनीय है।
इन सब हृदय विदारक खबरों और घटनाओं से मेरा मन इतना व्यथित था कि आखिर! सरकार चुप क्यों हैं?फिर हमने जानकारी ली तो पता चला कि भारतीय रेलवे ने इस समस्या को हल करने के लिए  ट्रेनों के डिब्बों की छत पर लगे एसी प्लांट से जाड़े में डिब्बों में गर्म हवा देने के लिए हीटर का इस्तेमाल किया है। हीटर की गर्म रॉड्स के पीछे से पंखे द्वारा हवा आने पर कोच में गर्म हवा मिलती है जिससे डिब्बे में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इसीलिए वृद्धों और सांस के मरीजों को जाड़े में एसी कोच में सांस लेने में असुविधा होती है। इसके अलावा हीटर क्वॉयल की वजह से कभी-कभी शॉर्ट सर्किट भी हो जाता है। इससे डिब्बे में धुआं भरने की समस्या व यात्रियों की सुरक्षा संकट उत्पन्न हो जाता है। अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन (आरडीएसओ) के कार्यकारी निदेशक (प्रशासन एवं जनसंपर्क) ए. के माथुर के अनुसार महानिदेशक केबीएल मित्तल ने पावर सप्लाई एंड ईएमयू विभाग को जाड़ों में उल्टे वातानुकूलन चक्र के जरिए गर्म हवा की आपूर्ति करने की योजना पर काम करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके पश्चात कार्यकारी निदेशक एके गुप्त व उनकी टीम ने एक एसी डिब्बे के चक्र को उल्टा करके परीक्षण किया। श्री माथुर के मुताबिक महीनों के परीक्षण के बाद रिवर्स चक्र एयर कंडीशनिंग तकनीक सफल साबित हुई है। इस जाड़े में चार अन्य एसी कोच में उक्त तकनीक का परीक्षण होगा। दूसरे चरण के परीक्षण के सफल होने पर रेल डिब्बे या कोच कारखानों में बनने वाले नए एसी कोच में इस तकनीक का उपयोग शुरू किया जाएगा। जबकि पुराने एसी डिब्बों को दीर्घकालिक मरम्मत (पीओएच) के लिए भेजे जाने पर उनके एसी प्लांट में तकनीकी बदलाव किए जायेगें। यह जानकारी मिली तो आगेंं जानने की उत्सुकता बढ़ी कि यह तकनीक आखिर! काम कैसेे करेगी? तो पता चला कि अभी  जिस तरह गर्मी में कम्प्रेशर के जरिए ठंडी हवा कोच के अंदर जाती है, उसी तर्ज पर जाड़े के दौरान कम्प्रेशर का चक्र उल्टा कर दिया जाएगा। हवा में मौजूद गर्मी को पम्प अवशोषित करके कोच में भेजेगा, जिससे कोच में गर्म हवा मिलेगी। गर्मी के मौसम में फिर चक्र को उसी हालत में लाकर ठंडी हवा दी जाएगी। यह सब बातें मेरे साथ आपने भी पढ़ लीं ना।
चलिए अब बताइये इससे क्या भीड़ की गर्मी से घुटन से होने वाली असमय मौतों की समस्या हल हो जायेगी? मेरे हिसाब से तो पूरी तरह नहीं। वो इसलिये कि असली समस्या मई जून की जानलेवा गर्मी उतनी जिम्मेदार नहीं जितनी कि रेल नीति जिम्मेदार है। हाँ जी मैं भारतीय सरकार और रेल मंत्रालय से विनम्र से प्रार्थना करतीं हूं कि आपकी बुलेट ट्रेन लाने का देश को और भी हाईटेक बनायेगा यह भारत को विकासशील से विकसित बनाने की दिशा में सराहनीय कदम हैं,इससे हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। आपके इस महान कदम का दिल से स्वागत है पर इसके साथ ही आपसे करबद्ध निवेदन यह भी है कि उससे पहले आप गरीबों और हम सब मिडिल क्लास को ध्यान में रखते हुए आप प्रत्येक ट्रेन में कम से कम 4-6 जनरल डिब्बे जोड़ने के प्रावधान विचार को मंजूरी दे दीजिए जिससे किसी गरीब को टॉयलेट की जानलेवा बदबू के पास सो कर जमीन पर लेट कर अनेकों यात्रियों की लातों को झेलते हुए यात्रा या कहें इस ‘शोषित सफर’ .. या इस ‘जनरल डिब्बे’ यानि ‘मौत के डिब्बें’ में ‘मौत का भयावह सफर’ के रूप में ‘भयग्रस्त’ होकर यात्रा ना करनी पड़े। वहीं, भारतीय रेल का विश्व प्रसिद्ध श्लोगन है ”राष्ट्र की जीवन रेखा” झूठा साबित ना हो सके और  हमारी रेल जीवन दायनी रेखा से जीवन हरने वाली रेखा बनने से बच जाये और देश का हर गरीब और मध्यमवर्गीय निश्चिंत सुरक्षित यात्रा कर सके तथा  हमारी भारतीय रेल का नाम बड़ी विश्वपटल पर एक बड़ी जगहँसाई से बच जाये। 

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