विश्व का दुर्लभ प्राणी -घुड़खर

[विश्व का अनोखा कच्छ के छोटे रण “घुडखर अभ्यारण” की विशेषता]
बृहद जैव विविधता को दर्शाता हुआ ये विश्व की इस धरोहर  का  संरक्षण करना  हमारी सबकी जिम्मेदारी है lभारत विश्व की कुल जमीन भाग में से 2.4 % हिस्सा बचा है, जिसमे विश्व की 8.1 % जैविविधता का समावेश है, भूमि, पानी, और दरियाइ इकोसिस्टम जिसमें विभिन्न प्रकार के प्राणी, पेड-पौधे  और घुड़खोर की प्रजाति का  समावेश होता है इस तरह की विविधता अलग – अलग भैागोलिक एरिया में है l
ये रन अमूल्य घास- वनस्पति -अजोड़ जीव सृस्टि – अनोखी भू रचना  प्रसिद्ध धरोहर – ” विश्व  विख्यात ” एक मात्र सम्पूर्ण रन यानी एलआरके इस एरिया में  दुर्लभ, विशिष्ट प्राणी घुडखरों  की अच्छी संख्या के कारण इस  एरिया  का नाम “घुडखर अभ्यारण  ” दिया है। आम नजर से यह रण मतलब रेत के ढे़र रेत के दृश्य दूसरा  कोई दृश्य की अपेक्षा ही नहीं होती, लेकिन यह  छोटे रण करीब 4900 चो. की.  खरो पाट है। जिसमे विश्व के दुर्लभ प्राणी जंगली घुडखर आसानी से देखने को मिलते है।
इसका वैज्ञानिक नाम इक्वस हैमीनस खुर एक वन्य पशु है जो दक्षिण एशिया का देशज है।  ‘गुजरात का जंगली गधा’ या ‘बलूची जंगली गदहा’ भी कहते हैं। वर्ष २०१६ के आंकड़ों के अनुसार इस गधे के लुप्त होने का खतरा कुछ सीमा तक है। गुजरात में कच्छ के रण में पाया जाने वाला एक अनोखा प्राणी, जो न गधा है, न घोड़ा है, न दोनों के मेल से बनने वाला खच्चर है।
घुड़खर अभयारण्य, गुजरात के लघु कच्छ रण में स्थित है। यह ४९५४ वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है और भारत का सबसे बड़ा अभयारण्य है। यह अभयारण्य ‘खर’, ‘गधेरा’ या ‘घुड़खर’ (जंगली गधा) के लिये प्रसिद्ध है। इसकी देहदशा मज़बूत होती है;घुडखर की ऊँचाई 110 से 120 से. मी, लम्बाई करीब 210 से. मी वजन 200 से 250 किलो और आयु करीब  20 साल होती है उनकी प्रजनन वर्षा ऋतु में गर्भ काल 11 माह, बहुत  ससक्त,  और बहुत मजबूत 50 से 60 की. मी. की दर से दौड़ सकते हैं।
ये  वन्य प्राणी यहां पर सुरक्षित है l उस रण के एक मात्र अनादि प्रतिनिधि है, आज उनकी संख्या करीब 5000 है l पहले कच्छ छोटा रण सिंघ और काबुल तक बस्ती थी। कुछ समय प्रकृति  परिवर्तन प्राणी में  हॉर्स डिसीज़ जैसे बड़े रोग से उत्तरोत्तर संख्या घटती गयी।
अन्त में 1973 मे सरकार ने ये  छोटे रण को ” घुडखर अभ्यारण ” घोषित किया तबसे वन्य परिस्थिति  में यह घुड़खर अभय रह सकते है l यह प्राणी उन प्राणियों की सूची में है, जो लुप्तप्राय हैं। यही कारण है कि घुड़खर को वन्य पशु सुरक्षा अधिनियम 1972 के अंतर्गत पहली सूची में रखा गया है। अमिताभ बच्चन ने इसी घुड़खर का कैंपेन विज्ञापन किया था, ताकि लोगों की नज़र में घुड़खर आये और उसकी सुरक्षा की गंभीरता को स्वीकार किया जाये, उसपर विचार किया जाये।
इसी गंभीरता और संवेदनशीलता को देखते हुए भारत सरकार ने 2013 में इस घुड़खर पर डाक टिकट भी जारी किया गया था। 
बता दें कि  नैऋत्य दिशा में कच्छ अखात को छू कर सरु होता सुरेंद्रनगर, राजकोट, कच्छ, बनासकाठा और महेसाणा जिल्ला की हद मे छोटा रण फेला हुआ है,रण मे सर्दी के मौसम में  दरियाए हवा  से  बहुत ठंड, ग्रीष्म  (गर्मी के मौसम ) मे अग्नि जल करीब 50 डिग्री तापमान, और बारिस की मौसम में चारो तरफ पानी से भरा रण सागर, वैशाख से अशाढ मास गीष्म ऋतु मे संपूर्ण सूखा रहता ये  विस्तार (रण ) में तेज हवा से उडती धूल  (चक्रवात ), और जहा भी  नजर पडे़ चारों तरफ मुर्ग जल
(मिराज ) देखने को मिलता है।
रण के बीच में खड़े रह कर चारो तरफ देखने से अद्भुद धरती और आकाश का मिलन जैसे दृश्य देखने को मिलता है।
आज रण में घुडखर, उपरांत चिंकारा (इंडियन गेलोज ), काडीयार (ब्लेक बग ) नीलगाय (ब्लू बुल ) जंगली डुककर, वरु (वुल्फ ) शियार , जरख, शहूदि, शानढो जेसे बोहत प्राणी देखने मिलते है, उस रण में  विविध जात के घास, वनस्पति  है, जो और कहीं उपलब्ध न हो?  जैसे की थेग, मोरड, ऊट मोरड, डोलरी, बुकनो, खिजड़ो, पीलू, पीलूड़ी गुंदी, वगेरे.बारिस की रुतु ख़तम होने के बाद रण की हरित धरा से मोहित बने पक्षी विविध जात देखने को मिलती है। सच कहूँ तो कच्छ का यह छोटा रण पक्षी प्रेमियों के लिए स्वर्ग है l 
जैसे – फ्लेमिंगो, घोराड, जो अभी कम नजर आते है –  क्रेन, विविध जात के डुबकीयो -विविध जात बगला, रिवरटर्न -वाबगली -पान बगली -डेजादकोसेट -इंडियन कोर्सेट -बटेर -तेजपर -गड़ेरा -सार्पग्रीवा -हेरोन -चमचा -ढोक -विविध जात  बतक -शकरो  पेन )कजिया – तुतवारी – गजपाव- उल्टी चाच  – भोई चकली – काडो कोशी ( अबाबिल –   सुरखाब-अन्य  लगभग 300 जाति के विविध पक्षी देखने को मिलते है उनमें से   बहुत पक्षी कायमी रहने वाले और प्रजनन भी रण मे करते है।
क़ुदरतकी करामात यह है कि पेन नाम के पक्षी समूह कोई एक गांव  के तालाब में एक दिन के भोजन के मेहमान बने तो तालाब  की मछलिया कम पडे़ पर ऐसे विशिष्ट पक्षियों की बड़े समूह की खुराक और रहने की व्यवस्था रण (विशिष्ट भू सागर ) में प्रकृति की ताकत को दर्शाती है। बता दें कि यहां कि आबोहवा बेहद खूबसूरत है। यह रण विस्तार में भारत का सबसे ज्यादा वास्पीकरण होने वाला एरिया है l
__कृष्णजयसिंह जाडेजा, गुजरात 
वन्यजीवप्रेमी फोटोग्राफर 
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