“उत्तरप्रदेश:- सांस्कृतिक सद्भाव से लेकर आज के राजनीतिक अपराधिकरण तक”

लेखक – महेश तिवारी

स्वतंत्र टिप्पणीकार

राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लेखन

किसी समुदाय, समाज और राष्ट्र में रहने वाले लोगों के रहन-सहन, ज्ञान, धर्म, और तौर-तरीकों के आदर्श समन्वय को संस्कृति का रूप दिया जाता है। उत्तरप्रदेश हमारे देश की संस्कृति और विरासत में विराट और अद्वितीय स्थान रखता है। धार्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक सद्भाव का सुंदर इतिहास उत्तरप्रदेश अपने आप में समाहित किए हुए है, लेकिन राजनीतिक विद्रूप ताक़तों के कारण वर्तमान व्यवस्था सामाजिक सद्भाव को खो रही है, जो समाजशास्त्रियों के लिए चिंतन और मनन का विषय होना चाहिए। जो प्रदेश रामराज्य का घोतक था, आज वहीं राजनीतिक अपराधिकरण औऱ साम्प्रदायिक ताक़तों के कारण गंगा- जमुनी तहजीब को क्यों खो रहा है। उत्तरप्रदेश का इतिहास सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण था। संतो-महात्माओं की उर्वरा भूमि उत्तरप्रदेश में ईश्वर के साक्षात स्वरूप श्रीराम और श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। फ़िर संतो की भूमि आज आपराधिक तत्वों की शरणगाह क्यों बनती जा रहीं है। इसका पता लगाने के लिए इतिहास के झरोखों को झांकना होगा। अगर सूबे की संस्कृति औऱ विरासत को समझना है, तो वहां के रीति-रिवाजों को समझना होगा। किसी प्रदेश का सांस्कृतिक आधार कितना दृढ़ है, इसका पता इसी बात से पता चलता है, कि सूबे की आवाम पेड़-पौधे की उपासना के साथ नदियों आदि की भी पूजा-उपासना करते हैं।वास्तुशिल्प, संगीत, चित्रकारी, नृत्यकला और दो भाषाएँ हिन्दी और उर्दू मुग़ल काल के दौरान उत्तर प्रदेश में ही पुष्पित और पल्लवित हुई है। ऐसा माना जाता है, कि गुप्त काल में संगीत कला काफ़ी समृद्धि हुई। इसी दरमियान तानसेन व बैजू बावरा जैसे संगीतज्ञ मुग़ल शहंशाह अकबर के दरबार से विश्व पटल पर अपना शंखनाद करने में सफ़ल हुए। इसके अलावा भारतीय संगीत के दो सर्वाधिक प्रसिद्ध वाद्य यंत्रों सितार और तबले का विकास भी उत्तरप्रदेश में ही हुआ। यह सूबे की मजबूत ऐतिहासिक गौरव का गुणगान करने के लिए काफ़ी है। सूबे की संस्कृति और समाज की जड़ें यहां की परंपरा, साहित्य, कला और इतिहास की जड़ों के रोम रोम में समाई हुई हैं। इसके इतर उत्तर प्रदेश की संस्कृतिक विरासत बहुरंगी है और साथ ही साथ यह बहुत ही समृद्ध है। राज्य में पुराणों में वर्णित दो नदियां गंगा और यमुना प्रवाहित तो होती है, सूबे में प्रयाग ऐसा माक़ूल जगह है, जहां पर तीन नदियों की त्रिवेणी आपस में मिलकर संगम का निर्माण करती हैं। इसके अलावा सूबे की धरा धार्मिक स्थल के रूप में भी काफ़ी धनी है। तो यह सूबे के लिए सोने पर सुहागा होने की स्थिति निर्मित करता है। उत्तर प्रदेश भारत के शीर्ष पर्यटन स्थलों में शुमार है, तो इसका सबसे बड़ा कारण यहां की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत ही है। विश्व के सात अजूबों में शुमार ताजमहल आगरा में स्थित है, जो यह संदेश देता है, कि जीवन में प्रेम औऱ राग का विशेष महत्व होता है। बिना प्रेम के जीवन नीरस औऱ कष्टदायी हो सकता है। सूबे की विरासत हमें यह भी सिखाती है, कि प्रेम सिर्फ़ दैहिक नहीं होता, बल्कि प्रेम वह होता है, जो ह्र्दयतल की गहराईयों तक सुकून औऱ शांति का एहसास दिलाता है, क्योंकि राधा और श्याम के प्रेम का साक्षी भी उत्तरप्रदेश की धरा ही बनी है। सूबे की ख़ास विशेषता यह भी है, कि आज के दौर में जब देश में साम्प्रदायिक सद्भावना बिगड़ रहीं है, हिन्दू-मुस्लिम का राग अलाप कर राजनीति अपना हित साधना चाहती है, तब भी उत्तरप्रदेश सूबे में ऐसे त्यौहार औऱ परम्पराएँ प्राचीन समय से चली आ रही, जो सूबे में सामाजिक सद्भाव को तो अभिव्यक्त करती ही हैं, देश में भी सांप्रदायिक सद्भाव निर्मित करने के लिए उस पथ पर चलने का संदेश देती हैं।

महर्षि भारद्वाज, गौतम, याज्ञवल्क्य, विश्वामित्र, वशिष्ठ और वाल्मीकि की तपोभूमि उत्तरप्रदेश का वर्तमान भले ही राजनीतिक स्वार्थों के कारण जाति, धर्म औऱ सम्प्रदायिकता की बेड़ियों में बंधा है, लेकिन उसका इतिहास उतना ही सुंदर और रमणीयता से सराबोर रहा है। इतना ही नहीं हिन्दू धर्म के दो बड़े धर्म ग्रंथो की कथा भी सूबे के सांस्कृतिक इतिहास को अपने-आप में समाहित किए हुए है। आज का उत्तरप्रदेश भले गंगा-जमुनी तहज़ीब को भूला चुका है, लेकिन प्राचीन समय में यह प्रदेश धार्मिक रूप से काफ़ी विविधताओं का जन्मदाता रहा है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर प्रदेश में दो नए धर्मों का विकास होता है , तो यह जगजाहिर करता है, कि उत्तरप्रदेश की भूमि नए विचारों की संवाहक रही है। इन दोनों धर्मों का नाम क्रमशः जैन और बौद्ध धर्म पड़ा। इतना ही नहीं प्रदेश की धरा से सूफ़ी-संतो की परंपरा ही आगे नहीं बढ़ी, बल्कि सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त तात्कालिक विसंगतियों पर इन सूफ़ी-संतों ने अपने विचारों के वज्र से प्रहार करके समाज को नई राह दिखाने का कार्य किया। जो सूबे की संस्कृति को महान बनाते है।

शिक्षा अध्ययन के प्राचीन केंद्रों में सूबे का नाम प्रसिद्ध होने के साथ ही मध्यकाल में उत्तरप्रदेश पर मुस्लिम शासकों की शासन प्रणाली ने ऐसा प्रभाव डाला, कि हिन्दू-मुस्लिम की संस्कृति औऱ रीति-रिवाज मिलकर नई मिली-जुली संस्कृति के प्रस्फुटन में सहायक बने। ऐसे में अगर उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक परिपेक्ष्य को देखा जाए, तो यह प्रदेश लगभग 4000 वर्ष पुराना इतिहास रखता है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है, कि वैदिक सभ्यता के शुरूआत से ही इस प्रदेश का ज़िक्र मिलता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक भगवान राम का कौशल राज्य भी इसी प्रदेश का हिस्सा था, जिसे आज का अयोध्या कहते हैं। इसके अलावा भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण का जन्म भी उत्तरप्रदेश के वर्तमान मथुरा जिले में हुआ था। इन बातों से साक्ष्य मिलता है, कि उत्तरप्रदेश का इतिहास काफ़ी विस्तृत औऱ महान है, जहां पर भगवान के अवतार भी मानव शरीर को धारण किए हैं। जो उक्त धरा और परिवेश को धन्य बनाते हैं। जिस राज्य व्यवस्था पर आज देश चल रहा है, वैसी रुपरेखा प्राचीन समय में भी थी, तभी तो सोलह महाजनपदों में से सात उत्तर प्रदेश की सीमा के भीतर थे। मुक्ति, लिंग और जाति पर आश्रित नहीं होती, का विचार रखने वाले रामानंद और सभी धर्मों के बीच सामूहिक एकता पर बल देने के लिए कबीर ने उत्तर प्रदेश में मौजूद धार्मिक सहिष्णुता के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई केन्द्रित की। जिस लड़ाई ने उक्त समय मे सूबे को नई दिशा और दशा की ओर अग्रसर किया, लेकिन वर्तमान में राजनीतिक सत्ता के पिपासु नेताओं की गोद में आते ही पुनः प्रदेश की छवि धूमिल होने लगी। तो इससे निज़ात दिलाने के लिए किसी को आज का राजनीतिक या सामाजिक परिवेश का श्रीकृष्ण, श्रीराम या कबीरदास बनना होगा।

सन्तों और महापुरुषों की जन्मस्थली भूमि उत्तरप्रदेश अगर वर्तमान समय में अपराध और दंगाई क्षेत्र की उर्वरा भूमि बन चुका है। तो यह कहीं एकाएक इस स्थिति में नहीं आया। इसके पीछे राजनीतिक प्राश्रय और संरक्षण देने की वर्षों पुरानी परम्परा रहीं है। 4000 वर्ष पूर्व का इतिहास अपने में समाहित किया हुआ, प्रदेश अगर आज आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का शरणगाह बनता जा रहा है, तो उसके सबसे बड़े जिम्मेदार सूबे का राजनीतिक पृष्ठभूमि रहा है। क्षेत्रीय दल तो क्या रामराज्य की परिकल्पना की भूमि पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय दलों ने भी आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को संरक्षण दिया। आज श्रीराम और श्रीकृष्ण की जन्मस्थली जातिवाद की जकड़न में ही नहीं बंधा हुआ है, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के बंधन में भी लिप्त है। जिस संत-महात्माओं की भूमि से रामराज्य की संकल्पना पूरे देश में फैली, वहीं रामराज्य का जन्मदाता राज्य साम्प्रदयिक खाइयों से पट गया है। आएं दिन अब जातिगत हिंसा, साम्प्रदयिक हिंसा और वैमस्यता समाज का हिस्सा बनता जा रहा है। सूबे में सत्त्तासीन राजनीतिक दल पुनः रामराज्य की लहर लाने की बात करते हैं, लेकिन वास्तविकता में दिखता वही है, ढाक के तीन पात। सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश की भूमि प्राचीन काल में जैसे संतो-महात्माओं की जन्मस्थली में अग्रणी थी, वह आज के बदलते समयचक्र और सियासी दौर में अपराधियों की शरणगाह बन चुका है। कालांतर में जो गंगा-जमुनी संस्कृति, तहज़ीब और अदब की उपजाऊ भूमि रही थी, उसे आज के सियासी हित के लिए इन तौर-तरीकों और तहजीब से बंजर भूमि में तब्दील कर दिया गया। जहां पर सिर्फ़ अपराध का बोलबाला हो गया। जो चिंता का विषय है।

मजहबी भेदभाव औऱ द्वेष की भावना से आज उस कबीरदास की जन्मभूमि कराह रहीं, जिनको हिन्दू और मुस्लिम दोनों समान रूप से मानते थे। कबीरदास की जन्मभूमि आज धार्मिक कट्टरता औऱ मजहबी मझधार में अटकी हुई है, जिसके जिम्मेदार आज का रहनुमाई व्यवस्था ही है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और तहजीब और अदब की भूमि अपराध की कड़ी में तत्काल में नहीं जकड़ गई , उसका लेखा-जोखा काफ़ी विस्तृत है। अगर बात इतिहास के झरोखो की करें, तो मई 2002 के बाद से उत्तर प्रदेश में या तो समाजवादी पार्टी की सरकार रही। या फिर बहुजन समाज पार्टी की। इन दोनों क्षेत्रीय दलों ने सूबे में अपनी राजनीतिक वजनदारी बनाए रखने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीतियां झोंक कर रख दी। इन दलों ने न सिर्फ़ समाज को जाति, धर्म के नाम पर लामबंद किया, अपितु अपराधियों को सत्ता का सारथी बनाने से भी नहीं घबराई। आज हम इसकी जांच-पड़ताल करें, कि रामराज्य का वाहक दूसरे राज्यों के मुकाबले कानून एवं व्यवस्था में अपने को कहां खड़ा पाता है, तो स्थिति काफ़ी दयनीय और पतली दिखती है। आज सूबा हत्या, लूट, अपहरण और सम्प्रदायिक दंगों में बीमारू राज्यों बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश से तनिक भी पीछे नहीं है, औऱ राष्ट्रीय आंकड़ों में सूबे का प्रतिवर्ष अपराध के मामले में शीर्षस्थ तीन राज्यों के बीच होना यह साबित करता है, कि लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था प्राचीन रामराज्य को बनाएं रखने में अपने-आप को सक्षम नहीं पाती।

आंकड़ों की बाजीगरी पर अगर सूबे को मापा जाएं, तो पता चलता है, कि 1999 से 2014 तक अपराध में काफ़ी बढ़ोतरी हुई, सिर्फ़ 1999 से 2003 के बीच उत्तर प्रदेश में हिंसक अपराधों के कुल मामलों में कुछ कमी देखने को मिली। वर्ष 1999 में कुल हिंसक अपराधों की संख्या जहां सूबे में करीब 39,000 थी, वह 2003 में घटकर 19,000 के करीब पहुंच गई। उसके बाद अपराध के क्षेत्र में सुबे का नाम क्या आगे बढ़ा, फ़िर उसको नियंत्रित करने में सरकारों की सांसे भी फ़ूलने लगी, या यूं कहें सरकारों ने सही दिशा में प्रयास ही नहीं किया। 2003 में उत्तर प्रदेश में कुल हिंसक अपराधों की संख्या 39,000 थी, जबकि बिहार में यह आंकड़ा 24,000 के करीब था। इसके बाद के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में 2003 से 2014 के दौरान हिंसक अपराधों में भारी इजाफा हुआ , और इन वर्षों में उत्तर प्रदेश में आपराधिक घटनाओं में इतनी तेजी से वृद्धि हुई कि अन्य बीमारू राज्य पीछे छूट गए, और अपराध की ये तस्वीरें उत्तर प्रदेश के चित्र को बदरंग बनाती गई, जो सिलसिला अभी भी बद्दस्तूर जारी है। वैसे उत्तर प्रदेश में आपराधिक प्रवृत्ति की परवरिश सपा और बसपा जैसी क्षेत्रीय पार्टी ने किया, लेकिन पहली बार अपराधी छवि वाले नेताओं को मंत्री बनाने का श्रेय भाजपा को जाता है । जो भाजपा बीते वर्ष न गुंडाराज, न भ्रष्टाचार, अबकी बार भाजपा सरकार के दावे के साथ सूबे की सत्ता में आई है, उसी ने सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने के 1996-97 में कल्याण सिंह के वक्त सूबे की सत्ता तक आपराधिक प्रवृति के 12 विधायकों को मंत्री पद तक पहुँचाया। वर्तमान उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 विधायकों में से 189 के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इनमें से 98 विधायको पर बलात्कार, हत्या, डकैती और अपहरण जैसे गंभीर आरोप है। वहीं 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा के 199 उम्मीदवारों में से 111 आपराधिक प्रवृत्ति के थे। औऱ अगर कासगंज जैसी घटनाएं अभी भी सूबे में हो रहीं है, तो उसको रोकने के लिए रहनुमाई व्यवस्था को आगे आना होगा, क्योंकि ऐसे में रामराज्य की परिकल्पना पूरी नहीं हो सकती। आख़िर में बस इतना-लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में। ऐसे में अगर सच्चे अर्थों में सूबे में रामराज्य लाना है, तो साम्प्रदायिक ताकतों का दामन राजनीतिक औऱ सामाजिक स्तर पर करना होगा। तभी सन्तों और महापुरुषों की विरासत बची रह पाएंगी।

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