भगवान श्रीवराह पर उठे सवाल का वैज्ञानिक जवाब –

सवाल – जब समुद्र पृथ्वी में हैं तो भगवान वराह ने पृथ्वी को किस समुद्र से निकाला?ये कैसे सम्भव? अंतरिक्ष में सागर?

उत्तर – भगवान श्री हरिविष्णुजी ने कुल 24 अवतार लिए हैं। मत्स्य और कच्छप के बाद तीसरा अवतार है वराह।पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्माजी की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सूंघने की शक्ति की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने जल को स्तंभित कर  पृथ्वी को अपनी कक्षा में स्थापित कर दिया था। इसके पश्चात भगवान वराह अंतर्धान हो गए।
इस कथा पर लोगों के कई विवाद थे जिनका अब अंत हो गया। वैसे तो जब श्री रामायण जी में पुष्पक विमान का प्रसंग सुन कुछ लोग बोले होगें कि यह साईकिल तो बड़ी मुश्किल से हासिल है, यह विमान कैसे सम्भव? पर आज हवाई जहाज यथार्थ हैं। देवता दूर से बातचीत कैसे करते हैं? आज मोबाइल और वीडियोचैट है। चाँद पर मंदोदरी अमृत लेने कैसे गयीं? आज मानव चाँद पर कदम रख चुका है। इसी तरह अंतरिक्ष में महासमुद्र भी है जिसे वेदों पुराणों में भवसागर के नाम से परिभाषित किया गया है । बिलकुल सम्भव है । सबकुछ सम्भव है। इस अपार अनंत अपरिमित ब्रह्मांड में सम्भावनाएं भी अनंत हैं पर हम इंसानों के पास उतनी उम्र नहीं है क्योंकि अंतरिक्ष विराट है और एक ग्रह से दूसरे ग्रह की दूरी से ज्यादा दूर तारों की दूरी हैं। पुराणों में दूरी को योजन में बताया गया है।


एक अनुमानित गणना के अनुसार – पृथ्वी से ध्रुव तारे की दूरी चार सौ तैंतीस प्रकाशवर्ष अगर किलोमीटर में देखें तो चार पद्म दस नील चालीस  खरब किलोमीटर यानि 4104(15 शून्य) । ध्रुव लोक के ऊपर 1करोड़ योजन अंतर महारलोक है यानि 12 करोड़ 29 लाख 53 हजार 881 किलोमीटर।महारलोक के दो करोड़ योजन है  जनलोक (245907763 किलोमीटर), जनलोक के ऊपर है तपोलोक यानि 8 करोड़ योजन (983631052 किलोमीटर) इसके 12 करोड योजन  ऊपर है सत्यलोक (एक अरब सैंतालीस करोड़ चौवन लाख छियालिस हजार पांच सौ उन्यासी किलोमीटर (1475446579 किलोमीटर) ।इसके दो करोड़ बासठ लाख योजन यानि बत्तीस करोड़ इक्कीस लाख उन्तालिस हजार एक सौ उन्हत्तर किलोमीटर  (322139169 किलोमीटर) ऊपर है भगवान श्री हरि विष्णु जी और लक्ष्मी जी का वैकुण्ठ लोक यानि मुक्तिलोक/मोक्ष/अंतिमसीमा लोक।अगर मानव अपनी आज की विज्ञान से वैकुण्ठ जाना चाहे तो दूरी करीबन यह होगी जोकि धर्मग्रंथों में योजन के हिसाब से बतायी गयी है। (1 योजन=12किलोमीटर)4104000000000000+122953881+245907763+983631052+1475446579+322139169=4104003150078444,, आज इंसानी विज्ञान 39हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से अंतरिक्ष में दौड़ रही है और अगर इसी रफ्तार से वैकुण्ठ को  जाया जाये तब भी दस अरब बावन करोड़ तीस लाख पचासी हजार घण्टे लग सकते हैं यानि 12 लाख से ज्यादा वर्ष लग सकते हैं।

पृथ्वी से अंतरिक्ष की दूरी का अनुमान आप इस द्वापरकालीन कथा से लगा सकते हैं। 

आपको यह कथा तो याद ही होगी कि महान ऋषि मुचकुंद जी, इक्ष्वाकु नरेश मांधाता जी के सुपुत्र थे। उन्होंने इंद्रलोक जाकर असुरों से युद्ध कर, देवताओं को विजयश्री दिलाई थी। जब वह देवताओं को युद्ध जितवा कर पृथ्वी पर वापस लौटे तब तक एक युग बीत चुका था तब भगवान श्रीकृष्ण जी ने उनसे कहा था हे!महात्मन आपका युग बीत चुका है। यह द्वापर युग चल रहा है। आप इस गुफा में अनिश्चितकालीन निद्रा का सुख प्राप्त कीजिए जो भी आपको जगा दे वह वहीं उसी वक्त भस्म होगा। यह है अंतरिक्ष इंद्रलोक और पृथ्वी की दूरी का पौराणिक वर्णन। बता दें कि आज यह गुफा  बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में स्थित है।यहां पर भगवान श्रीकृष्ण जी ने, ग्राम धौजरी के पास बेतवा नदी के किनारे स्थित मुचकुंद गुफा में निद्रा में लीन ऋषि मुचकुंद से चतुराई के साथ दुरात्मा कालयवन को भस्म करवा दिया था। यही सच है कि आज की विज्ञान नासा ने, अंतरिक्ष में पानी होने की कथा को अपनी रिसर्च से सत्य प्रमाण मान लिया है। उनके शोध के अनुसार दुनिया के सागरों में 1.3 अरब क्यूबिक किलोमीटर पानी है। इसमें अगर कई हजार गुना ज्यादा पानी वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष में मिला है और वह भी सिर्फ 175 प्रकाश वर्ष दूर। एक प्रकाश वर्ष एक हजार अरब किलोमीटर के बराबर होता है। यह पानी टीडब्ल्यू हाइड्रे (TW Hydrae) नाम के तारे के पास है। खगोलशास्त्रियों का मानना है कि सिर्फ यही तारा नहीं है जिसके आस पास इतना पानी है और भी हैं। नीदरलैंड्स में लाइडन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के नेतृत्व वाली टीम को उम्मीद है कि अगले दो साल में तीन और पानी से भरी हुई डिस्क मिल सकती हैं। 

वैज्ञानिकों के अनुसार उन्होंने हर्षल दूरबीन से अंतरिक्ष में पानी का पता चलाया। इसमें बहुत संवेदनशील परा बैंगनी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। इसके जरिए टी डब्ल्यू हाइड्रे नाम के तारे के पास ठंडे पानी की भाप देखी गई। पानी की भाप से पता चलता है कि वहां इतना पानी मौजूद है जिससे धरती के सारे सागर भरे जा सकते हैं। इतना बड़ा सागर जिसे हिंदु धर्मग्रंथों ने भवसागर कहा गया है।डॉयचे वेले के अनुसार इस रिपोर्ट को लिखने में शामिल खगोल विज्ञान के प्रोफेसर कार्स्टन डोमिनिक ने बताया, “जब आप पानी में बर्फ देखते हैं तो आप उसका बहुत छोटा हिस्सा देखते हैं। यही अंतरिक्ष में भी होता है। पानी के भंडार घूमती हुई प्रोटो प्लानेटरी डिस्क में काफी नीचे होते हैं। ” विज्ञान की भाषा में – शोधकर्ताओं का कहना है कि यह पानी बर्फीले धूमकेतू बनाते हैं जो नई दुनियाओं में जा गिरते हैं और अपने साथ इतना पानी लाते हैं कि ये समंदर बना सकते हैं। और इस दौरान वह तारा उस प्रणाली का सौर मंडल बन जाता है।  लाइडन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर एविने फान डिशोएक और जर्मनी के गार्चिंग में एक्स्ट्रा टेरेस्ट्रियल फिजिक्स के लिए माक्स प्लांक इंस्टीट्यूट ने दो सवाल उठाए हैं. “हमारे शरीर और समंदर में पानी आया कहां से और वे धरती जैसे किसी ग्रह पर कैसे पहुंचा?” एविने फान डिशोएक ने डॉयचे वेले से बातचीत के दौरान बताया, “हम जानते हैं कि यह घूमते हुए डिस्क गैस और धूल से बने हैं और एक सवाल जो हमेशा से था वह ये कि इन डिस्कों का पानी कैसा पानी है?”बादलों में धूल के कण तट पर रेत की ही तरह होते हैं लेकिन उनसे करीब 10 हजार गुना छोटे और ये छोटे छोटे कण मिल कर बड़े होते जाते हैं और उनसे एक पूरा ग्रह बना जाता है लेकिन इन डिस्कों में सिर्फ धूल नहीं होती। इनमें पानी के भी अणु होते हैं। ये कण तारे से जितने दूर होते जाते हैं उतने ही ठंडे होते हैं। फान डिशोएक के अनुसार पानी ही सिर्फ नए सौर मंडल का निर्माण नहीं कर सकता। हेटेरोडिन इंस्ट्रूमेंट फॉर फार इन्फ्रारेड यानी हिफी नाम के उपकरण के कारण वह तारों के नजदीक इस ठंडे पानी की भाप को देख सके। फान डिशोएक ने बर्फीले पानी के बारे में कहा, “यह नए ग्रहों के लिए माहौल बनाने जैसा है।टीम ने इस खोज के लिए हिफी उपकरण को श्रेय दिया है। टीम के सदस्य डोमिनिक ने बताया, “हम देख सकते हैं कि कुछ अणु इधर उधर घूम रहे हैं और रेडिएशन का उत्सर्जन कर रहे हैं। अचानक वे एक दूसरे से टकरा जाते हैं और चिपक जाते हैं।अगर ज्यादा टक्कर होती है तो और बर्फीले धूमकेतू बनते हैं।” धरती पर समन्दर के निर्माण के बारे में एक थ्योरी यह भी कहती है कि इस तरह के पानी भरे धूमकेतुओं के कारण ही धरती और नए ग्रहों पर समन्दर का निर्माण होता है। कुछ खगोलविज्ञानियों का मानना है कि इन धूमकेतूओं के कारण धरती पर पानी के भंडार बने हैं। डोमिनिक कहते हैं, “बहुत संभव है कि धरती पर आया पानी बर्फ के रूप में आया लेकिन सवाल यह है कि यह कहां का है?” उनका कहना है कि दोनों तरह की संभावनाएं हैं। क्षुद्रग्रह और बर्फीले धूमकेतू, दोनों से ही पानी आया हो सकता है पर यह सच है कि अंतरिक्ष में महासागरों का भी महासागर मौजूद है।

 
इस खोज से सिद्ध हो जाता है कि पुराणों में वर्णित हर शब्द सत्य है और सत्य ही सनातन है। हमारी आज की विज्ञान भी भगवान की विज्ञान के सामने नगण्य मात्र है और रही बात हमारी आँखों की तो दिव्यता देखने के लिए श्री मद्भागवत गीता जी में भगवान श्री कृष्ण जी द्वारा अर्जुन को दिव्यदृष्टि का उल्लेख है। परमात्मा की टैक्नोलॉजी सचमुच बहुत विचित्र है अगर वह शूक्ष्म हैं तो इतने कि हमारे शरीर में रहते हुये भी हम उन्हें समझ ही नहीं पाते। विराट हैं तो अंतरिक्ष की तरह जहां हम पहुंच नहीं पाते । 
हम मानव अभी तक मन की रहस्यमयी रफ़्तार के गणित, स्वप्नों की रहस्यमय दुनिया के गणित को समझने में असफल रहे हैं। परमात्मा की साईंस समझने के लिए हम इंसानों की विज्ञान को अभी बहुत समय लगेगा और ईश्वर की कृपा से ही ईश्वर की साईंस और टैक्नोलॉजी से जुड़े अनंत रहस्यों के रेशों को सुलझाया जा सकेगा। मजे की और समझदारी की बात तो यह है कि जिसकी साईंस टेक्नोलॉजी मजबूत है वही सबसे मजबूत माना जाता है । सनातन संस्कृति व हिंदू धर्म ग्रंथों ने यही तो समझाया है कि विकास पर ध्यान दो पर हम इंसान विकास छोड़ कर आपस में ही लड़ चले जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप इंसान अनेकों तरह से कमजोर होता चला जा रहा है।सोचो! अगर हम पृथ्वी पर ही जूझते रहेगें तो अंतरिक्ष को कैसे समझ पायेगें?यह सब हम न भी समझ पायें कोई ग़म नहीं पर कम से कम परमात्मा की बनायी खूबसूरत दुनिया को निजिस्वार्थवश प्रकृति को दर्द देने की हम इंसानों की क्रूर और निरंकुश प्रवृत्ति को हमें जल्द से जल्द त्याग कर हमें प्रेम सहयोग और शांति व विकास मार्ग पर चलना होगा और अपने देश को अपने देश की प्राचीन संस्कृति को बहुत संरक्षित सुरक्षित व सशक्त बनाना होगा। जो सदाचार का मार्ग हमें हमारे वेद पुराण और महानग्रंथों में छपे शब्द रूपी पूर्वजों ने समझाया है हमें उसी मार्ग का अनुसरण करते हुए शांतिपूर्ण विकासशील मर्यादित प्रेमऔरआदर से परिपूर्ण सहयोगात्मक प्रकृतिप्रेमी जीवन-शैली अपनानी होगी तभी हम मानवों का कल्याण और उद्धार हो सकेगा। 

 

__ब्लॉगर आकांक्षा सक्सेना, न्यूज ऐडीटर सच की दस्तक 
0 0 vote
Article Rating
Subscribe
Notify of
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x