Shaheed Diwas 23 March-देश के इतिहास का सबसे दुखद दिन

देश और दुनिया के इतिहास में यूं तो कई महत्वपूर्ण घटनाएं 23 मार्च की तारीख पर दर्ज हैं। लेकिन भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना भारत के इतिहास में दर्ज सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। वर्ष 1931 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च को ही फांसी दी गई थी।

भगत सिंह को फांसी दिए जाने से दो घंटे पहले उनके वकील प्राण नाथ मेहता उनसे मिलने पहुंचे. मेहता ने बाद में लिखा कि ‘भगत सिंह अपनी छोटी सी कोठरी में पिंजड़े में बंद शेर की तरह चक्कर लगा रहे थे.’

‘इंक़लाब ज़िदाबाद!’

उन्होंने मुस्करा कर मेहता को स्वागत किया और पूछा कि आप मेरी किताब ‘रिवॉल्युशनरी लेनिन’ लाए या नहीं? जब मेहता ने उन्हें किताब दी तो वो उसे उसी समय पढ़ने लगे मानो उनके पास अब ज़्यादा समय न बचा हो.

मेहता ने उनसे पूछा कि क्या आप देश को कोई संदेश देना चाहेंगे? भगत सिंह ने किताब से अपना मुंह हटाए बग़ैर कहा, “सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िदाबाद!”

इसके बाद भगत सिंह ने मेहता से कहा कि वो पंडित नेहरू और सुभाष बोस को मेरा धन्यवाद पहुंचा दें, जिन्होंने मेरे केस में गहरी रुचि ली थी. भगत सिंह से मिलने के बाद मेहता राजगुरु से मिलने उनकी कोठरी पहुंचे.

मेहता के जाने के थोड़ी देर बाद जेल अधिकारियों ने तीनों क्रांतिकारियों को बता दिया कि उनको वक़्त से 12 घंटे पहले ही फांसी दी जा रही है. अगले दिन सुबह छह बजे की बजाय उन्हें उसी शाम सात बजे फांसी पर चढ़ा दिया जाएगा.

भगत सिंह मेहता द्वारा दी गई किताब के कुछ पन्ने ही पढ़ पाए थे. उनके मुंह से निकला, “क्या आप मुझे इस किताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?”

भगत सिंह ने जेल के मुस्लिम सफ़ाई कर्मचारी बेबे से अनुरोध किया था कि वो उनके लिए उनको फांसी दिए जाने से एक दिन पहले शाम को अपने घर से खाना लाएं.

थोड़ी देर बाद तीनों क्रांतिकारियों को फांसी की तैयारी के लिए उनकी कोठरियों से बाहर निकाला गया. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने हाथ जोड़े और अपना प्रिय आज़ादी गीत गाने लगे-

कभी वो दिन भी आएगा

कि जब आज़ाद हम होंगें

ये अपनी ही ज़मीं होगी

ये अपना आसमाँ होगा.

फिर इन तीनों का एक-एक करके वज़न लिया गया. सब के वज़न बढ़ गए थे. इन सबसे कहा गया कि अपना आखिरी स्नान करें. फिर उनको काले कपड़े पहनाए गए. लेकिन उनके चेहरे खुले रहने दिए गए.

भगत सिंह बोले, “पूरी ज़िदगी मैंने ईश्वर को याद नहीं किया. असल में मैंने कई बार ग़रीबों के क्लेश के लिए ईश्वर को कोसा भी है. अगर मैं अब उनसे माफ़ी मांगू तो वो कहेंगे कि इससे बड़ा डरपोक कोई नहीं है. इसका अंत नज़दीक आ रहा है. इसलिए ये माफ़ी मांगने आया है.”

जैसे ही जेल की घड़ी ने 6 बजाया, क़ैदियों ने दूर से आती कुछ पदचापें सुनीं. उनके साथ भारी बूटों के ज़मीन पर पड़ने की आवाज़ें भी आ रही थीं. साथ में एक गाने का भी दबा स्वर सुनाई दे रहा था, “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है…”

सभी को अचानक ज़ोर-ज़ोर से ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ और ‘हिंदुस्तान आज़ाद हो’ के नारे सुनाई देने लगे. फांसी का तख़्ता पुराना था लेकिन फांसी देने वाला काफ़ी तंदुरुस्त. फांसी देने के लिए मसीह जल्लाद को लाहौर के पास शाहदरा से बुलवाया गया था.

उनके पार्थिव शरीर को फ़िरोज़पुर के पास सतलज के किनारे लाया गया. तब तक रात के 10 बज चुके थे. इस बीच उप पुलिस अधीक्षक कसूर सुदर्शन सिंह कसूर गाँव से एक पुजारी जगदीश अचरज को बुला लाए.

अभी उनमें आग लगाई ही गई थी कि लोगों को इसके बारे में पता चल गया. जैसे ही ब्रितानी सैनिकों ने लोगों को अपनी तरफ़ आते देखा, वो शवों को वहीं छोड़ कर अपने वाहनों की तरफ़ भागे. सारी रात गाँव के लोगों ने उन शवों के चारों ओर पहरा दिया.

अगले दिन दोपहर के आसपास ज़िला मैजिस्ट्रेट के दस्तख़त के साथ लाहौर के कई इलाकों में नोटिस चिपकाए गए जिसमें बताया गया कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु का सतलज के किनारे हिंदू और सिख रीति से अंतिम संस्कार कर दिया गया.

लाहौर की सेंट्रल जेल में अंग्रेजी हुकूमत ने 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह (Bhagat singh) और उनके साथियों को फांसी पर लटका दिया था. अब इस जगह की हालत बहुत खराब है. इस जगह के सामने पाकिस्तान में एक मस्जिद बना दी गई है.

लेखक कुलदीप सिंह नैयर ने अपनी किताब में किया था. कुलदीप नैयर ने “शहीद भगत सिंह पर शहीद भगत सिंह, क्रांति के प्रयोग (The Martyr Bhagat Singh Experiments in revolution) नाम किताब लिखी है. इस किताब की भूमिका में ही उन्होंने यह साफ किया है कि जिस जगह पर भगत सिंह को फांसी हुई, उस जगह की स्थिति अब क्या है.

लेखक के अनुसार, “भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जिस जगह पर फांसी दी गई थी, वह जगह अब ध्वस्त हो चुकी है. उनकी कोठरियों की दीवारें ध्वस्त होकर मैदान का रूप ले चुकी हैं. क्योंकि वहां की व्यवस्‍था नहीं चाहती कि भगत सिंह की कोई निशानी वहां ठीक स्थित में रहे.”

उनकी कोठरियों के सामने खड़ी कर दी मस्जिद, बसा दिया शादमा कलोनी

कुलदीप नैयर की किताब के अनुसार अब पाकिस्तान में लहौर सेंट्रल जेल के उस स्‍थान पर अधिकारियों ने शादमा नाम की एक कॉलोनी बसाने की अनुमति दे दी थी. जबकि भगत सिंह व उनके दोस्तों को जिन कोठरियों में रखा गया था उसके सामने एक शानदार मस्जिद के गुंबद खड़े हैं.

जहां भगत सिंह की फांसी का तख्ता था, उसे चौराहा बना ‌दिया

पाकिस्तानी हुकूमत शायद भगत सिंह की फांसी से संबंधित स्मरकों व निशानियों को मिटा देना चाहती है. किताब के अनुसार जिन जगहों पर भगत सिंह व उनके दोस्तों को फांसी देने संबंधित तख्ता था, वहां अब चौहारा बन गया है. वहां आती-गाड़ियों के धूल में तख्ता कब कहां खो गया किसी को नहीं पता.

आजादी के आंदोलन में बस एक पंजाबी मरा था!

पाकिस्तान में एक बेहद अजीब धारणा बना दी गई है. कुलदीप नैयर लिखते हैं कि अस्सी के दशक में लाहौर में एक विश्व पंजाबी सम्मेलन आयोजित किया गया है. जिस हॉल में यह आयोजित किया गया, उसमें बस एक तस्वीर भगत सिंह की लगाई गई थी. जबकि आजादी के आंदोलन में अगणित पंजाबियों ने महती भूमिका अदा की थी. लेखक के अनुसार जब उन्होंने वहां बस एक तस्‍वीर लगने का कारण जानना चाहा तो बताया गया कि आजादी के आंदोलन में बस एक ही पंजाबी की जान गई.

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