शक्तिपर्व : लेखक ✍ अनूप सैनी ‘बेबाक़’


कविता –


शक्तिपर्व

हो लगाए बैठी आस अगर तुम
कि कोई नर श्रेष्ठ आएगा
उद्धार करने तुम्हारा
तो तुम्हारा यह मूक इंतजार व्यर्थ है
पीसता रहेगा यह समाज तुम्हें
यूँ ही
सिलबट्टे की चटनी सा
रहेगा घुमाता तुम्हें यूँ ही
घर की चक्की सा
रीति,मर्यादा के नाम पर
तुझे दबाया जाएगा
झूठी आन-बान की खातिर
तुझे जलाया जाएगा
आना है जो बाहर तुझे
इन समाज की जंजीरों से
उठना होगा खुद तुम्हें ही
काटनी होगी बेड़ियाँ
जकड़ रखी है जो समाज ने
तुम्हारे पांवों में ..दासता की
पहचानना होगा तुम्हें
स्वयं अपनी शक्ति को
लाँघ के चौखट घर की अब
चाहरदीवारी से तुम निकलो
अपने हितों की खातिर अब
लड़ने को तुम स्वयं उठो
लक्ष्य जब तक हो न पूरा
तब तक तुम अब मत रुको
फिर उठा खड्ग दोनों हाथों में
तुम धरो रूप रणचण्डी का
समरसता की करो स्थापना
काटो गला पाखंडी का
शक्ति हो तुम शक्तिरूपा
बन काली अट्टहास करो
संतो को तुम दो अभयदान
दुष्टों का विनाश करो,दुष्टों का विनाश करो।

©®मौलिक एवं अप्रकाशित
✍✍ अनूप सैनी’बेबाक़’
हिंदी व्याख्याता, झुंझुनूं, राजस्थान
पदस्थापन-राजकीय आदर्श उच्च माध्यमिक विद्यालय, कोठाज, तह.कोटड़ी,भीलवाड़ा, राज.

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