प्राचीन भारत के विज्ञान एवं तकनीक को समझने के लिए वाग्भट की अष्टांगहृदय व ब्रह्मा गुप्त की खंडखाद्य भी महत्वपूर्ण पुस्तको में से एक

 

सच की दस्तक न्यूज डेस्क वाराणसी
सामाजिक विज्ञान संकाय के इतिहास विभाग (बी॰एच॰यू॰) में  लेक्चर सिरीज़ बुधवार हुए व्याख्यान के क्रम की शुरूवात कार्यक्रम की संयोजक प्रो० ममता भटनागर जी द्वारा की गयी।
अपने व्याख्यान में उन्होंने मध्यकालीन भारत में विज्ञान व तकनीक के विकास एवं उपयोगिता के सार को स्पष्ट किया।
उन्होंने बताया कि मध्यकाल के दौर में भारतीय कृषि व्यवस्था उत्तम स्तर पर थी। बहुत से किसान व कारीगर अपने अनुभवो द्वारा अपने विषयों से सम्बंधित कार्य में निपुणता प्राप्त करते थे।यह वही दौर था जब भारत उत्कृष्ट प्रकार के शिल्पकारों से समृद्ध हुआ करता था।
अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए प्रो० ममता जी ने ‘रहट’के प्रायोगिक प्रसिद्धि की भी बात कही जिसका उल्लेख बाबर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बाबरनामा’ में भी किया है।उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत में गोलकुंडा,कर्नाटक,मैसूर खनन के मुख्य केंद्र हुआ करते थे। बीजापुर के शासकों ने बहुत से कारीगरों को हथियार बनाने के लिए अपने साम्राज्य में आमंत्रित किया था। इस दौरान प्रो० भटनागर ने तत्कालीन विद्वान शिराज़ी व मलिक मर्दान की महत्ता पर भी प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि मध्यकाल में खगोल गणित व ज्योतिष की विद्या अपने उन्नत स्तर पर थी। इस दौरान उन्होंने आमेर के शासक जय सिंह के विषय में बात हुए बताया कि उन्हें खगोल विज्ञान व ज्योतिष का अच्छा ज्ञान था। देश भर के खगोल शास्त्री अपनी समस्याओं के निवारण हेतु जय सिंह के दरबार में जाया करते थे।
उन्होंने तंत्र विद्या के प्रयोग पर प्रकाश डालते हुए बताया कि तत्कालीन समाज में इसके माध्यम से अमरत्व को प्राप्त किए जाने का विश्वास किया जाता था। उन्होंने पारे का उपचार के रूप में प्रयोग किए जाने की बात कही व बताया कि भारत के समृद्ध आयुर्वेदिक ज्ञान की चर्चा व प्रशंसा अरबी विद्वानो ने भी की है।
लेक्चर सिरीज़ के अगले व्याख्यान के क्रम में प्रो० रामप्रकाश शर्मा जी द्वारा
प्राचीन ग्रंथों में रंगमंच की कला से सम्बंधित महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गयी। उन्होंने प्राचीन काल में विज्ञान आधारित नाट्य कला की समस्त विधाओं पर तत्कालीन विद्वानो द्वारा दिए गए मतों का उल्लेख किया। उनके व्याख्यान का मुख्य केंद्र भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित था।उन्होंने कहा कि भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में रंगमंच के वास्तु का उल्लेख करते हुए बताया है कि उसका आकार पर्वत की गुफाओं जैसा होना चाहिए।यदि हम इसका वैज्ञानिक विधि से आंकलन करें तो यह ज्ञात होता है कि इस प्रकार वास्तुकोण से ध्वनि एक स्थान पर स्थिर रहती है। अन्य शब्द में कहे तो इस प्रकार के परिवेश में नाट्य के प्रति अध्यात्म का वातावरण उत्पन्न होता है। वस्तुतः हमारे प्राचीन धर्मशास्त्र पुराणों वेदों में भी कहा गया है कि अध्यात्म की उत्पति एकांत स्थान और मन का स्थिरता से ही सम्भव हो सकती है।
भरतमुनि के नाट्य शास्त्र में 49 प्रकार के भाव, 20 प्रकार की नेत्र मुद्रा, पुतलियों के नौ तथा भौंहों के 7 कार्य बताये गए हैं। प्रो० राम प्रकाश जी ने अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए बताया कि भरतमुनि के इस नाट्यग्रंथ में नासिका,ओष्ठ व हस्त की 134 मुद्रा के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
नाट्य शास्त्र में विज्ञान के इस प्रकार का समावेशन एवं प्रयोग प्राचीन भारत अतीत को गौरवान्वित करने वाला रहा है।
व्याख्यान के अगले क्रम शुरूवात डा. सीमा मिश्रा जी द्वारा की गयी
डॉ० सीमा मिश्रा जी ने गुप्त काल में विज्ञान और तकनीकी की महत्ता पर प्रकाश डाला। डॉ० मिश्रा जी के व्याख्यान का मुख्य केंद्र गुप्त काल के विज्ञान और तकनीकी से संबंधित पुस्तकों और उनमें संग्रहित ज्ञान पर आधारित था।
उन्होंने बताया कि कालिदास की ऋतुसंहार में छह प्रकार की ऋतुओं के विषय में जानकारी प्राप्त होती है, उनकी पुस्तक अभिज्ञान शाकुंतलम में वर्णित कथा का एक अंश जिसमें बताया गया है कि शकुंतला जब दुर्वासा ऋषि के आश्रम को छोड़ कर जा रही थीं,उस समय वहां के पेड़ पौधों की दशाओं का वर्णन है जिसमें कहीं ना कहीं विज्ञान की झलक दिखाई है।
व्याख्यान के क्रम में उन्होंने बताया कि आर्यभट्ट की पुस्तक आर्यभट्टीयम दशमलव पद्धति के विषय जानकारी देने के साथ साथ पाई का मान 3.149 बताती है जो आज के संदर्भ में भी प्रमाणित है। पृथ्वी गोल है व गतिशील है, ग्रहों का अपना प्रकाश नहीं होता वह सूर्य के प्रकाश से चमकते हैं तथा परिक्रमा करने का मार्ग दीर्घ वृत्ताकार होता है। यह समस्त जानकारियां तत्कालीन समय में आर्यभट्ट के द्वारा दी गई।
प्राचीन भारतीय ग्रंथो पर विमर्श करते हुए डॉ० सीमा मिश्रा जी ने भास्कराचार्य की प्रमुख पुस्तके लीलावती तथा सिद्धांत शिरोमणि के विषय में चर्चा की।उन्होंने बताया कि सिद्धांत शिरोमणि से यह बताया गया है कि पृथ्वी के समीप आकर्षण प्राप्त होता है। यदि हम इस तथ्य का अवलोकन करें तो हम यह सकते हैं कि तत्कालीन समय में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की जानकारी प्राप्त की जा चुकी थी।इस ग्रंथ में यह भी बताया गया है कि यदि दो वस्तुए ऊपर से गिराई जाती हैं तो दोनों ही एक साथ नीचे धरती पर गिरती है।
उन्होंने बताया कि प्राचीन भारत के विज्ञान एवं तकनीक को समझने के लिए वाग्भट की अष्टांगहृदय व ब्रह्मा गुप्त की खंडखाद्य भी महत्वपूर्ण पुस्तको में से एक हैं। धनवंतरि चंद्रगुप्त द्वितीय के नौ रत्नों में से एक थे। सुश्रुत भारत के पहले शल्य चिकित्सक माने जाते हैं। पालकाप्य नामक पुस्तक में पशु चिकित्सा संबंधित जानकारी प्राप्त होती है जिसमें मुख्य रूप से हाथी और घोड़ों का चिकित्सा के उपचार विधि उल्लेख किया गया है। वात्सायन के कामसूत्र में पत्थरों के परीक्षण का वर्णन है। जिसमें रूपरत्न व धातु वेद परीक्षा सम्बन्धी विधियों की जानकारी प्राप्त होती है।
व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने महरौली के लौह स्तंभ की चर्चा की। उन्होंने बताया कि उसके निर्माण में ऐसी विशेष तकनीक का प्रयोग किया गया है जिस कारण वह कभी भी जंग लग कर दुर्दशा को प्राप्त नही हो सकता।उन्होंने तत्कालीन समय में प्रयोग में लाए जाने वाले सिक्कों पर भी चर्चा की। जिसमें उचित धातुओं को मिलाने का साक्ष्य प्राप्त होता है।
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में ब्रजलेप का चर्चा है। मिट्टी के दीवारों को समतल करने के लिए पत्थर का बुरादा, मिट्टी, तथा गोबर का प्रयोग होता था। गोबर जिसे आज भी कीटनाशक मान कर उसका पवित्र स्थानो पर लेप किया जाता है। यह भी कहीं ना कहीं प्राचीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता दिखाई देता है।

इस प्रकार आज के व्याख्यान में प्राचीन भारतीय नाट्य कला व उसकी विधा,वास्तु एवं उसमें उपयोग की जाने वाली विभिन्न प्रकार की मुद्राएं तथा इसके साथ साथ गुप्त काल से संबंधित विभिन्न प्रकार की तकनीकी कला और विज्ञान से संबंधित गूढ़ विषयों समझने का अवसर प्राप्त हुआ।
व्याख्यान के दौरान विभिन्न विश्वविद्यालयों के अध्यापक शोधार्थी व अन्य छात्रगणो की उपस्थिति देखने को मिली।

लेक्चर सिरीज़ की अंतिम कड़ी का आरम्भ प्रो० अनुराधा सिंह जी के द्वारा किया गया। उन्होंने अपने व्याख्यान में मानव जाति की उत्पत्ति के साथ साथ पूर्वी अफ़्रीका से आस्ट्रेलिया होते हुए भारत तक उनके होने वाले प्रसार तथा प्राक्ऐतिहासिक काल में मानव जाति द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले औज़ारों की चर्चा की। उन्होंने काशी व उसके आस पास के अन्य क्षेत्रों में उत्खनन द्वारा प्राप्त धातु व उनसे निर्मित औज़ारों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया। प्राचीन भारत में हो रहे कृषि के विकास के पीछे की तकनीक व वैज्ञानिकता का प्रो० अनुराधा जी द्वारा एक विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने प्राचीन भारत में मूर्तियों पर की जाने वाली पालिशिंग विधि की चर्चा की जिसकी चमक को हम आज भी बी॰एच॰यू॰ के भारत कला भवन व अन्य संग्रहालयो में देख सकते हैं।
प्रो० अनुराधा के व्याख्यान की समाप्ति के साथ इतिहास विभाग सामाजिक विज्ञान संकाय (का०हि०वि०वि०) में चल रहे तीन दिवसीय लेक्चर सिरीज़ का कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

मालूम हो कि इस तीन दिवसीय वेबनार की अध्यक्षता कार्यकारी विभागाध्यक्ष प्रो० घनश्याम जी द्वारा की गयी। कार्यक्रम की संयोजक प्रो० ममता भटनागर जी (इतिहास विभाग बी॰एच॰यू॰) रही व संचालन प्रो० राकेश पाण्डेय जी(इतिहास विभाग बी॰एच॰यू॰) द्वारा किया गया।
सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए लेक्चर सिरीज़ में इतिहास विभाग के साथ साथ मनोविज्ञान विभाग के शोधार्थियों की भी संख्या देखने को मिली। इस अवसर पर प्रिन्स उपाध्याय अनुराग वर्मा, अनुप्रिया चौधरी, श्रेया पाण्डेय,रिशु कुमार,सर्वजीत पाल,संदीप कुमार,मिथिलेश पाण्डेय, साधना पाण्डेय सूरज पटेल के साथ साथ अन्य शोधार्थियों व छात्रों ने भी सक्रियता से भाग लिया।

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