जागृत अवस्था में मोक्ष की प्राप्ति ही रसशास्त्र का दर्शन है

सच की दस्तक न्यूज डेस्क  वाराणसी

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान संकाय(इतिहास विभाग) द्वारा तीन दिवसीय लेक्चर सिरीज़ का शुभारम्भ किया गया जिसका शीर्षक साइंस एंड टेक्नोलोजी (भारतीय इतिहास के संदर्भ में) है।
व्याख्यान के प्रथम वक्ता के रूप में रसशास्त्र (आयुर्वेद विभाग) बी॰एच॰यू॰ के विभागाध्यक्ष प्रो० देवेंद्र नाथ सिंह जी ने प्राचीन भारत में आयुर्वेद के महत्वों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि रस शास्त्र के प्रणेता के रूप में 7वीं शताब्दी के आस पास जन्म लिए नागार्जुन को माना जाता है।उन्होंने भूमंडल से दरिद्रता को दूर करने की एक प्रकार से प्रतिज्ञा की। उन्होंने बताया कि मर्करी जिसको हम पारे के रूप में भी जानते हैं, को भगवान शिव के वीर्य के रूप में जाना जाता है। नागार्जुन ने लोवर मेटल को हायर मेटल में परिवर्तन करने की विधि का प्रतिपादन किया जिससे व्यक्ति एक दृढ़ देह को प्राप्त कर सके।
अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते हुए प्रो० देवेंद्र जी ने बताया कि वैदिक काल में शास्त्रों के माध्यम से जिन धातुओं की चर्चा की गयी इसे ही हमने वर्तमान में कापर आयरन इत्यादि प्रकार का नाम दे दिया।
उन्होंने बताया कि रसशास्त्र व्यक्ति के आयु को स्थाई कर देने की बात करता है। यदि व्यक्ति की आयु स्थायी हो जाए तो वह रोग विकार से मुक्त हो कर अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। जागृत अवस्था में मोक्ष की प्राप्ति ही रसशास्त्र का दर्शन है।
उन्होंने प्राचीन मध्यकालीन व आधुनिक भारत के कालखण्ड में आयुर्वेद पर लिखी गयी पुस्तकों तथा उसमें वर्णित उपचार की विधियों पर चर्चा करते हुए वर्तमान में उनकी प्रासंगिकता को सिद्ध करने का प्रयास किया।

लेक्चर सिरीज़ के दूसरे व्याख्यान में इतिहास विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो० अजय प्रताप जी ने विज्ञान की व्यक्ति के जीवन में भूमिका एवं उपयोगिता पर अपना विचार रखा। उन्होंने बताया कि किस प्रकार समय की माँग ने विज्ञान को परिभाषित किया।
अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने प्राचीन भारत में लोहे की खोज व उसके गलाने की विधि पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि लोहे को पहाड़ी लोगों ने एक प्रकार से विनिमय के साधन के रूप में प्रयोग किया। शायद यही कारण था कि लोहे की खोज पहाड़ी लोगों के द्वारा किए जाने पर भी वहाँ उसके अवशेष बहुत कम प्राप्त हुए।
अपने व्याख्यान को आगे बढ़ाते उन्होंने हुए भाषाई विकास की बात कही। उन्होंने बताया कि व्याकरण भाषा को नियमो में बांध कर उन्हें स्पष्ट रूप प्रदान करता है। संस्कृत के विकास के क्रम में पतंजलि कात्यायन भर्तहरि जैसे महान विद्वानो ने इसे व्याकरणबद्ध कर इसे एक निश्चित आकार दिया।
प्रो० अजय प्रताप जी ने टेराकोटा कला के साथ साथ लेखैया सहित अन्य स्थानो पर उकेरे गए चित्रों के माध्यम से प्राचीन भारत के विज्ञान व तकनीक को स्पष्ट करने का प्रयास किया।

व्याख्यान श्रृंखला में बी॰एच॰यू॰ इतिहास विभाग की प्रो० अनुराधा सिंह, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफ़ेसर (हिंदी) आमोद प्रकाश चतुर्वेदी जी सहित अनेक छात्रों ने भाग लिया जो बिहार सहित उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश तथा झारखंड के रहने वाले थे व्याख्यान में प्रश्नोत्तर में शृंखला में बहुत लोगों ने विषय पर रुचि प्रकट करते हुए अपनी प्रतिभागिता दर्ज कराई। विद्वान वक्ता ने खेचरी मुद्रा की चर्चा की जिसके माध्यम से अमरत्व को प्राप्त किया जा सकता है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता इतिहास विभाग के कार्यकारी विभागाध्यक्ष प्रो० घनश्याम जी द्वारा की गयी। कार्यक्रम की संयोजक प्रो० ममता भटनागर जी रही व संचालन प्रो० राकेश पाण्डेय जी द्वारा किया गया।
व्याख्यान के दौरान प्रिंस उपाध्याय, अनुराग वर्मा, अनुप्रया चौधरी, सूरज पटेल, रोहित नारायण सिंह व रिशु कुमार सहित अन्य इतिहास विभाग (बी॰एच॰यू॰) के शोधार्थियों ने सक्रियता के साथ भाग लिया।

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