कहानी : कर्मफल ✍️डॉ. प्रमोद शुक्ल

पन्नालाल चौरसिया बहुत अधिक पढ़ा-लिखा नहीं था । पारंपरिक व्यवसाय के रूप में वह विरासत में पिता से मिली पान की दुकान चलाता था ।

हालाँकि नागपुर में उसकी दुकान शुद्धता के लिए प्रसिद्ध थी । स्वादिष्ट पान उसकी दुकान की पहचान थी । पन्नालाल की बड़ी बेटी सारिका पुणे के मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रही थी । बेटा अविनाश नागपुर में ही इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था । सबसे छोटी बेटी कोमल अपंग थी । वह भी बारहवीं उत्तीर्ण कर चुकी थी ।

समय के साथ बहुत सारे परिवर्तन हुए । डॉ. सारिका ने अपने विजातीय क्लासमेट डॉ. हर्षद दवे से प्रेमविवाह कर लिया और सास ससुर का विरोध होने के कारण उसने जल्दी ही उन्हें घर से बेदखल कर दिया।

ससुर सरकारी महकमे से रिटायर होने के कारण उन्हें पेंशन मिलती थी सो उन्हें बहुत अधिक तकलीफ नहीं हुई। बहन से हिम्मत पाकर भाई अविनाश ने भी पड़ोसी सुमन राउत से विवाह कर लिया । पन्नालाल और उनकी पत्नी सुशीलादेवी फड़फड़ाकर रह गए पर उनकी न तो बेटी ने सुनी न बेटे ने । अब पन्नालाल, सुशीलादेवी और कोमल की जिंदगी गुलामों जैसी हो गई । घर पर अब सुमन का राज चलने लगा था । पन्नालाल ने बुढ़ापे के कारण पुश्तैनी पान की दुकान भी बेच दी थी । घर में छोटी-छोटी बातों को लेकर लगभग रोज ही वे पति-पत्नी अपमानित होते थे । एकदिन सुशीलादेवी ने सब्जी में कोई नुक्स निकाल दिया तो बात का बतंगड़ बन गया ।

बहू के द्वारा सास का अपमान किए जाने को लेकर पन्नालाल ने पत्नी का समर्थन करते हुए बहू को बातें सुना दीं । बस फिर क्या था बेटे ने माँ-बाप और अपंग बहन तीनों को घर से निकाल दिया । घर से निकाले जाने के बाद उन्होंने अगली गली में दो कमरे का मकान किराए पर ले लिया । कोमल ने पढ़ाई छोड़ दी । वह प्राइमरी क्लास की ट्यूशन करने लगी । चार बच्चे आते थे उसके पास । अपंग कोमल की छोटी-सी कमाई से जैसे-तैसे दो वक्त की रूखी-सूखी रोटी की सोय हो जाती थी ।

पन्नालाल ने बड़ी बेटी से फोन पर बात की पर उसने भी टालमटोल करके फोन रख दिया । मानसिक तनाव के कारण सुशीलादेवी की शूगर काफी बढ़ गई । दवाइयाँ भी बेअसर होने लगीं । पन्नालाल ने मजबूर होकर बेटे को इसकी सूचना दी। बेटे ने साफ शब्दों में कह दिया,”अपने कर्मों का फल भुगतो।” हताश पन्नालाल रुआँसा होकर बैठ गया ।

सुशीलादेवी ने हिम्मत बँधाते हुए कहा,”धीरज धरो भगवान सब ठीक कर देंगे।” कोमल ने भी अपने पापा से कहा,”अभी हमारी परीक्षा की घड़ी है। परीक्षा थोड़ी कठोर जरूर है पर विश्वास रखिए हम इससे पार निकल जाएँगे ।” कोमल ने माँ को भी हिम्मत बँधाई। माँ का हौसला बढ़ाया और तनाव कम करने की कोशिश की ।

सुशीलादेवी सोचने लगी कि पता नहीं इस अपंग बच्ची में इतनी हिम्मत कहाँ से आ जाती है । पहले की तुलना में वे अब बेहतर महसूस कर रही थीं।

जिंदगी की नाव धीरे-धीरे हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ने लगी। पर पन्नालाल बुरी तरह टूट चुका था । उसकी आँखों में तीनों बच्चों का मासूम बचपन घूमने लगा । भैया और दीदी अपनी छोटी बहन को कितना चाहते थे।

उसे इतना-सा भी नहीं रोने देते थे। भयानक दुर्घटना में जब वह अपंग हो गई तो पूरा परिवार कितना रोया था । पन्नालाल की आँखों से सतत आँसू बहे जा रहे थे। माता-पिता की हालत देखकर कोमल बहुत चिंतित हो रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे ।

ऐसे समय याद आई उसे अपनी सहेली निर्मला की सलाह । निर्मला के भाई का इलेक्ट्रॉनिक विज्ञापन का व्यवसाय था। वह विविध आवाजों मे विज्ञापन तैयार करता था और जिसकी आवाज होती उसे मिनिट के हिसाब से पैसे भी देता था । कोमल की आवाज विज्ञापन के लिए बहुत परफेक्ट थी पर कोमल ने उस समय मना कर दिया था। कोमल ने तुरंत सहेली निर्मला को फोन लगाया और विज्ञापन के लिए अपनी सहमति दर्शा दी ।

कोमल का काम जम गया । कमाई भी अच्छी होने लगी। अब उसने माता-पिता का उचित उपचार भी करवा लिया। बस बेचारी स्वयं के लिए कुछ न कर पाई । इनका सुखद जीवन देखकर सुमन को बड़ी अखरदारी होने लगी । वह इसी उधेड़बुन में सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि उसका पैर फिसल गया और वह गिर पड़ी ।

सुमन के कूल्हे की हड्डी बुरी तरह से टूट चुकी थी और गर्भ में बच्चा भी मर चुका था। प्लास्टर भी नहीं बाँधा जा सकता था । पन्नालाल से रहा नहीं गया वह बहू को देखने चला गया लेकिन बहू और बेटा दोनों ने बुरी तरह अपमानित किया । बहू बोली,”ये हमारे जख्मों पर नमक छिड़कने आए हैं ।” बेटा बोला,”यह तुम्हारी ही बद्दुआ का असर है ।” बेचारा पन्नालाल लौट आया । उसके कानों में पिछली दफा कहे गए बेटे के शब्द गूँज रहे थे,”अपने कर्मों का फल भुगतो…..।”

✍️डॉ. प्रमोद शुक्ल

Sach ki Dastak

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