वह बंद मकान ! ✍️- श्रीमती वीनु जमुआर, पुणे 

कई वर्ष पूर्व इस घर में रहने वाले इस मकान को, गली-मोहल्ले को और क़सबे को  छोड़कर जा चुके थे।अचानक आज उस भुतहा हुए  घर के अंदर से आती  रोशनी देख उत्सुकता वश मैं वहाँ चला गया। दरवाज़ा खटखटाया तो एक सुंदर-सी अधेड़ उम्र की महिला ने किवाड़ खोल कर पूछा- किससे मिलना है भैया ?
 क्या सुधीर भैया आए हैं ? प्रश्न सुनते ही महिला की आँखें भर आईं । भरे गले से उन्होंने ‘नहीं’ कह कर द्वार बंद कर लिए । मेरी जिज्ञासा बढ़ गई- तो क्या उन लोगों ने घर बेच दिया ? या  किराये पर दे दिया है ? सोचता हुआ मैं वापस अपने बरामदे में लगी चौकी पर आकर बैठ गया। बहुतेरे प्रयासों के बावजूद उस रात मैं सो नहीं सका। हर पल कुसुम भाभी का निरीह चेहरा,  जला हुआ तन, आँसू बहाती पलकें और उनके अनकहे शब्दों के कोलाहल की अनुभूति मेरे मन की बेचैनी बढ़ाती रही।
छोटा था मैं, चार या पाँच वर्ष का ! सुधीर भैया के घर का प्यारा एवं कुसुम भाभी का दुलारा बच्चा ! वे मुहल्ले में नए आए थे। किसी के घर का बच्चा या आदमी न तो उनके घर आता ना ही भैया-भाभी किसी के घर जाते। वे किसी से मिलते -जुलते नहीं थे। हाँ, मेरी माँ से मिलने कभी-कभार कुसुम भाभी आती थीं।
माँ की इच्छा थी कि मेरी शिक्षा  अंग्रेजी माध्यम स्कूल में हो।  उनका मान रखा गया और समय पर व्यापारी परिवार के इस बच्चे का दाख़िला क़सबे के एकमात्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में करा दिया गया । अब समस्या यह थी कि हमारे घर न तो किसी ने अंग्रेज़ी  की शिक्षा पाई थी ना ही  किसी का दूर-दूर तक इस भाषा से कुछ लेना-देना था। ऐसे समय में कुसुम भाभी ने पतवार थाम ली। वे पढ़े-लिखे घर से थीं । उन्होंने माँ को आश्वासन दिया कि मुकेश यानी मेरी पढ़ाई-लिखाई की जिम्मेदारी उनकी होगी।
इस प्रक्रिया के तहत मेरा उस घर में प्रतिदिन जाना निश्चित हो गया । भाभी नित्य नए प्रकार के व्यंजन बनातीं, मुझे भी खिलातीं । चाॅकलेट भी देतीं और कहतीं कि ईश्वर ने तुम्हें इस घर से जोड़ा है ताकि इस आँगन को बच्चे की कमी महसूस नहीं हो। मैं कुछ समझता, कुछ नहीं समझता किंतु भाभी को कई बार रोते देखता तो मैं भी रो पड़ता। जिज्ञासा वश पूछता कि वे क्यों रो रहीं हैं, तुरंत चुप हो जातीं वे और कहतीं – रसोई में थी तो मिर्च वाले हाथ आँखों को लग गए इसलिए आँसू आ गए थे और वे मुझे पढ़ाने बैठ जातीं।
मैं देखता, कभी-कभी उनके ललाट पर चोट लगी होती तो कभी हाथों पर लाल निशान होते जैसे हम लड़के आपस में लड़कर सोंटे से एक दूसरे को पीट देते हैं तो कैसे छड़ी का निशान होता है न, वैसे वाला ।
ज्यों-ज्यों उस घर में मेरा आना-जाना बढ़ता गया त्यों-त्यों भाभी के कष्ट भी बढ़ते रहे।  एक दिन तो हद ही हो गई, जब भाभी जल गईं थीं। उस दिन मैं दरवाज़े की साँकल बजाता रहा किंतु द्वार किसी ने नहीं खोले। मैंने वापिस आते ही माँ से कहा कि आज किसी ने दरवाज़ा नहीं खोला, मैं वापस आ गया हूँ पर आप जाकर देखिए , भाभी क्यों ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थीं।
माँ के जाने तक गली के लोगों की भीड़ वहाँ उमड़ पड़ी थी। संभवतः भाभी की चीखें सबों ने सुनी थीं और वे दरवाज़ा  तोड़ कर अंदर पहुँच, भाभी की मदद करना चाहते थे। कई प्रयासों बाद अंततः दरवाज़े की सिटकिनी टूट गई और अंदर के दृश्य देख सभी स्तब्ध हो गए थे !
दौड़ता हुआ मैं भी गया। जब तक लोग मुझे पकड़ते,रोकते, जलती हुई भाभी से मैं लिपट चुका था। उन्हें बचाने का शायद यही तरीक़ा  तब मेरे बाल मन में सूझा होगा। आज भी हाथ-पाँव एवं पेट पर के गहरे जले निशान मुझे उस घटना की भयावहता से विचलित कर देते हैं।
       छह वर्ष की आयु में भोगे गए यथार्थ की टीस इस वय में अधिक गहराने लगती है जब भी मन उस घटना के कारणों को ढूँढ़ने लगता है।
अस्पताल से महीने बाद जब घर लौटा था तो माँ ने भाभी की मृत्यु की ख़बर दी थी। सुधीर भैया का घर-मोहल्ला छोड़कर तुरंत कहीं चले जाने की बात तब भी बहुत अजीब लगी थी, आज भी अनबूझ ही  थी। पुलिस या एम्ब्युलेंस आने के पूर्व ही भैया कहीं चले गए थे। बहुत खोज की गई थी किंतु उनके  न मिलने पर सभी प्रकार के कार्यवाहियों के उपरांत भाभी का क्रिया-कर्म पुलिस ने  मोहल्लेवालों के साथ मिलकर  कर दिया था । मुश्किल से पता  चले भैया के परिजनों से उनके संबंध इतने ख़राब थे कि कोई आने को तैयार नहीं हुआ था। गली वालों का कहना था-मुकेश मुखाग्नि देता तो अच्छा होता पर मुझे तो माँ-पिताजी अस्पताल ले जा चुके थे।
वह औरत कौन है ?.. उस घर की चाबी उसके पास कैसे और कहाँ से आई ?…सुधीर भैया कहाँ हैं आदि दर्जन भर प्रश्न मुझे परेशान कर रहे थे। अंततः मुझसे रहा नहीं गया और मैं पुनः उस दरवाज़े पर जा पहुँचा। जीर्ण-शीर्ण  दरवाज़े की साँकल बजाने ही वाला था कि अंदर से आती अनेक पदचापों के आभास से मैं सावधान हो गया। दो कपाटों के मध्य टूटे हुए भाग से झाँकने का प्रयत्न किया तो तीन-चार नक़ाबपोश दिखे। सामने की चौकी पर रखे बहुत से  डरावने आग्नेयास्त्रों को देख मैं डर गया और उलटे पाँव घर भागने वाला ही था कि वही चिरपरिचित स्वर सुनकर ठिठक गया। साहस जुटा पुनः झाँकने की कोशिश की और जो दिखा वह अकल्पनीय था !!  तो क्या ??..
मुझे घबराया देख पत्नी प्रश्न पर प्रश्न पूछती रही, मैं व्याकुल निःशब्द आकाश को निहारता रहा। माँ कहती थीं अच्छे लोगों की जब  अकाल मृत्यु हो जाती है तो वे चमकते तारे बन जाते हैं। ढूँढ़ता रहा कुसुम भाभी को आकाश के अनगिन तारों के मध्य ! पूछना चाहता था भीतर आलोड़ित होते हुए प्रश्नों के उत्तर !
अस्पताल से वापसी के कुछ समय बाद लोग कहते थे कि आप भैया के विषय में कुछ ऐसी बातें जान गईं थीं जिसे वे आप से छुपाये हुए थे, भविष्य में भी आप अनभिज्ञ रहतीं उन बातों से तो संभवतः आपकी जान नहीं जाती। आपकी प्रिय सहेली, मेरी माँ से आपने अपनी चिंता व्यक्त की थी। बताया था, आधी रात एक पतली सीटी की आवाज़ सुनते ही भैया घर से निकल पड़ते हैं जैसे कोई जादुई बुलावा हो।  अकसर पूरी रात घर नहीं लौटते। कभी दो-चार दिन तो कभी आठ दिन और कभी-कभी तो पंद्रह दिन भी लग जाते थे वापस आने में। हम सभी जानते थे कि भैया नौकरी के सिलसिले में दौरे पर गए हैं।यही तो आप बताती भी थीं और शायद यही भैया ने आपको बताया भी था। तभी तो राज़ जान जाने के एवज में आपकी जान चली गई थी।
मेरा मन इन अफ़वाहों पर कभी विश्वास नहीं कर पाया।आस लगाए बैठा रहा, इंतज़ार करता रहा- कभी तो इस घर के दरवाज़े खुलेंगे, सुधीर भैया घर लौटेंगे।
भैया इतने वर्षों बाद लौटे भी तो किस रूप में!
पत्नी झिंझोड़ रही थी, क्या हुआ बताइये तो सही ! क्या बताता मैं ? कानों में गूँजते उन शब्दों को कैसे दोहराता ! कैसे दोहराता उन शब्दों को जो मेरे देव-रूप भैया को दानवत्व का चोला पहना रहे थे!  हथौड़े का प्रहार झेल रहा मस्तिष्क कानों सुनी बातों को श्रवण दोष साबित करने पर तुला था।किंतु वह स्वर था कि पुराने ग्रामोफ़ोन पर अटके रिकाॅर्ड की भाँति बजता चला जा रहा था- समक्ष भोजन की थाली लिए खड़ी उन  महिला का चेहरा बार-बार आँखों के समक्ष दिख रहा था। उनके अनुरोध एवं आग्रह को ठुकराते हुए  क्रोध भरा वह  स्वर- तुम्हें कितनी बार कहा और समझाया है, काम में निकलते वक्त खाने की थाली सामने मत लाया करो। कुसुम के पदचिह्नों पर चलने का प्रयास भी मत करना। और हाँ ख़बरदार जो मुहल्ले के किसी भी व्यक्ति को, बड़ा या बच्चा घर के अंदर आने दिया या उन लोगों से बतियायी तो तुम्हारा भी वही हश्र करूँगा जो कुसुम का किया। मत भूलना कि वह अनजान थी, जिस दिन सब कुछ जान गई, स्वर्ग सिधार गई। तुम सब जानती हो, मुँह खोलोगी तो वहीं पहुँचा दूँगा…
पत्नी कभी मेरे चेहरे पर पानी की छींटें डाल रही थी तो कभी  दो बूँद पानी पी लेने की ज़िद कर रही थी।
दर्पण के टूटने की आवाज़ दूर तक सुनाई देती है किंतु विश्वास का दर्पण टूटता है तो कराह केवल मन सुन पाता है। किसी प्रकार कुछ पल बीते,  मन किंचित मात्र शांत हुआ । उथल-पुथल होती भावनाओं पर सच्चाई की जीत होने लगी। एक जिम्मेदार नागरिक के कर्तव्य बोध ने निज भावनाओं पर विजय पाई। निर्णय ले, फोन की ओर हाथ बढ़े ही थे कि पुलिस की गाड़ियों के सायरन सुनाई दिए। हम सभी चौकन्ने हुए, क्या हुआ सोच भी नहीं पाए थे कि भागते-दौड़ते क़दमों की आहट और लगातार चलती गोलियों की आवाज़ें आईं ।  कुछ समय पश्चात् गली में फैला सन्नाटा..केवल चारो ओर पसरा रक्त का लाल रंग और थमें हुए समय की नीरवता को भंग करता गली के कुत्तों का सामूहिक स्वर ! भयावह हो उठा था वातावरण ।
फोन की घंटी बज उठी, सामने वाले चौधरी जी थे। कह रहे थे सुधीर के बंद मकान में कुछ आतंकवादियों के होने की सूचना पुलिस को मिली थी। मुठभेड़  में सभी आतंकी मारे गए। पुलिस उस घर से एक स्त्री को पकड़ कर ले गई है।
सुबह उठते ही अख़बार की सुर्ख़ियों में था- लाखों का इनामी आतंकवादी एरिया  कमांडर पुलिस मुठभेड़ में अपने अन्य तीन मुख़्य साथियों समेत मारा गया।  उन नामों में सुधीर चौधरी का नाम न देखकर मेरी उलझन बढ़ गई। मैं सीधा थाने पहुँचा। दारोग़ा जी से सच-सच सभी बातें बता कर उन महिला से मिलने की इजाज़त मांगी। सीख़चों के पीछे बैठी महिला ज़रा भी विचलित नहीं दिखीं। मेरे प्रश्नों के उत्तर वे कल दे सकेंगी कह कर मुस्कुरा दीं ।
दूसरे दिन मेरे पहुँचने के पूर्व उन्होंने मिलने के निर्धारित समय-सीमा से कुछ अधिक  के लिए निवेदन कर संबंधित अधिकारियों से आज्ञा प्राप्त कर ली थी तथा मेरे आने की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब मैं पहुँचा तो शांत, धीर-गंभीर शब्दों में उन्होंने जो कहानी सुनाई वह आप भी सुनिए- हम अपने गाँव में सुखपूर्वक रहते थे। हमारे परिवार को केवल इसलिए ज़िंदा जला दिया गया था कि  मेरे पिता तथा भाई ने आतंकवादियों को पुलिस से बचने के लिए अपने घर में आश्रय देने से इंकार किया था। घाटी की यह घटना कोई पहली या नयी घटना नहीं थी।आए दिन आस-पास के गाँवों में ऐसी घटनाएँ घट रही थीं। बस एक अलग बात यह हुई कि धू-धू कर जलती हुई लकड़ी की छत से निकलती  लपटें जब घर के पीछे की ओर स्थित बकरियों को रखने वाले कमरे की छत तक पहुँची तो वहाँ छुपी मास्टर साहब की चौदह वर्षीय बेटी गुलाबो बचते-बचाते पीछे की चारदीवारी फाँद भागने में सफल हो गई । आतंकियों से वह बच गई, ऐसा उसे लगा था किंतु होनी तो कुछ और थी। कोनें से झाँकते दो आखों ने उसे देख लिया।
संभवतः वह मुखिया था जिसके समक्ष उसे धसीटते हुए लाया गया था। किस क्लास में पढ़ती हो ? कितनी उम्र है तुम्हारी ? एकदम ठहरी हुई सर्द  कड़कती आवाज़ ! पुनःऔर पुनः न जाने कितनी बार पूछा गया प्रश्न जब अनुत्तरित रहा तो उसके साथियों ने बंदूकें तान दीं, पर उस लड़की को न जाने क्यों मौत से डर नहीं लगा। रोषपूर्वक वह सरदार की आँखों से आँखें मिलाकर खड़ी रही । तभी एक अनहोनी घटित हुई- इसे मारना नहीं, यह हमारे संग जाएगी ! और तनी हुई बंदूकें /रायफलें/मशीनगन कंधों पर टंग गईं।समूह का मुखिया, कंमाडर ने उसे टोली में हिफाज़त पूर्वक रखने का हुक्म जो दिया था!
     चार/पाँच वर्षों तक उस व्यक्ति ने मेरी देख-भाल की।जंगल-जंगल भटकते हुए जंगली जानवरों के साथ-साथ नर भक्षकों से भी मेरी रक्षा की। शिक्षित सुसंस्कृत सा उसका व्यवहार रहा।  किंतु प्रथम दिन से ही मैंने इन लोगों से मन ही मन बदला लेने की ठान ली थी। कब, कहाँ और कैसे, यह तो नहीं जानती थी पर उस कच्ची उम्र में भी  मेरा निश्चय दृढ़ था। प्रति पल अवसर तलाशती रहती।
 खूँखार कृत्यों का सरगना जिस दिन मुझसे मेरा साथ माँगने आया, वह शरद पूर्णिमा की रात थी। झील के तट पर उस धवल चाँदनी में मुझे उसके भीतर छिपा एक निरीह व्यक्ति दिखा  जिसे परिस्थितियों ने कुकृत्य की राह पर ढकेल दिया हो। पता नहीं क्यों  उस पल मुझे लगा कि इस पूरी टोली को धीरे-धीरे प्रेमपूर्वक ‘सच’ का आईना दिखा कर इन्हें सही राह पर लाया जा सकता है ,अलबत्ता भविष्य में यह मेरा भ्रम निकला,मेरी धारणा ग़लत साबित हुई ।
समय बीत रहा था। पति-पत्नी की भाँति रहते हुए मुझे अनेक बातों की जानकारी मिलती गई।  मैंनें यह भी जाना कि सिर्फ़ परिस्थितियों का मारा नहीं था वह ! पैसे की हवस भी थी जो उसे इन कृत्यों के लिए विवश करती थीं। मानसिक रोगी था वह जिसे गोलियाँ चलाने,रक्त बहाने तथा व्यवस्था के विरुद्ध प्रचार-प्रसार करनें में आत्मिक प्रसन्नता मिलती थी। उसे जन्नत में ह़ूरों की कामना भी थी।अब मेरे समक्ष एक ही मार्ग बचा था। उस योजना के तहत ही मैंने अपनी बीमारी की ख़बर फैलायी और कस्बे के मकान में आकर रहने की जिद़ की। मेरे प्रेम में पागल वह मान गया। पुलिस द्वारा सील किया गया घर इतने वर्षों में टूट-फूट चुका था। गली का अंतिम मकान होने के नाते कोई इधर झाँकने भी नहीं आता था।
पागल स्त्री का रूप धर ताला तोड़ कर मैं यहाँ रहने लगी। मध्य रात्रि में चोरों की तरह जब भी रसूल यहाँ पहुँचता,  मन बेचैन होकर पुलिस को ख़बर करने की युक्तियाँ सोचता किंतु मैं सफल नहीं हो पा रही थी।
हाँ रसूल, यही तो असली नाम था सुधीर चौधरी का!  ख़ैर, इतने वर्षों से माँ-पिता तथा भाई की यादें जो घंटियों सी टुनटुनाती रहती थीं इस बेटी के मस्तिष्क में, उस दिन घनघना उठीं। पहरेदारी के लिए बाहर दरवाज़े के सामने तैनात खोमचावाला, रसूल के शख़्स की आँखों में धूल झोंक मैं घर से निकलने में क़ामयाब हो गई। थाने गई, सभी सच उगल आई। तय हुआ थाने का एक बंदा सामने चौधरी जी की छत से सुधीर चौधरी के घर पर नज़र रखेगा। कल रात रसूल ने अपने बंदे की शिकायत पर (उसने मुझे लौटते हुए देखा था) पहली बार मुझ पर हाथ उठाया, मेरी चीख सिग्नल बनी और मेरी खिलाने की जिद नें पुलिस फोर्स को समय मुहैय्या करवा दी दरवाज़े तक पहुँचने के लिए। मेरे लिए कोई मुसीबत न खड़ी हो, सो मुझे पुलिस हिरासत में लिया गया है। मुकेश, मैंने अपने परिवार को तो न्याय दिलाने की चेष्टा की ही, आपकी निरपराध कुसुम भाभी के जलन की पीड़ा को भी शांत करने का प्रयास किया है। आप कुसुम जी के कितने प्यारे थे,यह मुझे बताया गया था, किसी भी कीमत पर आप से दूर रहने की हिदायत दी गई थी मुझे। मैंने उसी दिन आपको पहचान लिया था जब आप पहली बार आए थे।हाँ मैं जानती हूँ- रसूल के सच का उजागर होना उनके अस्त होने की कहानी बनी थी।
वे शून्य में निहारती पल भर के लिए चुप हो गईं। मेरे प्रश्नवाचक चेहरे को देख बोलीं – पिता शिक्षक थे, उन्होंने हम दोनों भाई-बहनों को सिखाया था-
चौरासी लाख योनियों में से ‘मनुष्य’ योनि में जन्म पाना  बड़े भाग्य की बात होती है।यह श्रेष्ठ है क्योंकि स़िर्फ  इस योनी को ही ‘तत्व’ दर्शन के ज्ञान का वरदान मिला है। अंतस में बसे ब्रह्म द्वारा दिखाया गया मार्ग ही श्रेष्ठ मार्ग है। उसकी दिव्यता का आलोक ही ज्ञान का प्रकाश है। जीवन से भय की समाप्ति अनेक नए मार्गों की निर्मात्री बनती है,भय की समाप्ति से नवीन अंकुरित होता है।मृत्यु अटल है, शाश्वत है। स्वयं को, परिजनों  को, खो कर भी  समाज के लिए, देशहित के लिए अगर कुछ किया जा सके तो वह जीवन सार्थक हो जाता है….एक लंबी गहरी मुक्ति की साँस लेकर वे उठकर अंदर सीख़चों में बंद कोठरी की ओर चल पड़ीं … नमन की मुद्रा में मेरे हाथ जुड़ चुके थे।

Sach ki Dastak

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