संघर्ष, हिम्मत और जज्बा – बेटियों की पढ़ाई के लिए बनी भारत की इकलौती लाइसेंसधारी मछुआरन

शुरू से लेकर आज तक ज्यादातर पुरुष ही नदियों या समुंदर में उतरकर मछलियों को पकड़ने का काम करते आ रहे हैं। लेकिन अब लोगों के मन में बनी यह धारणा भी पूरी तरह से बदल चुकी है, क्योंकि केरल की रहने वाली के.सी. रेखा (KC Rekha) ने सिर्फ़ समुद्र की लहरों का लुफ्त उठाने के बजाए समुद्र की गहराइयों तक उतर कर मछली पकड़ने का काम कर रही हैं और इसी के साथ भारत की पहली लाइसेंस धारी महिला मछुआरन बनकर समाज में महिला सशक्तिकरण का उदाहरण प्रस्तुत कर रही है।

बनी भारत की इकलौती लाइसेंस धारी मछुआरन (KC Rekha)

वैसे तो कई महिलाएँ इस काम से जुड़ी हैं, लेकिन केरल के थ्रिशूर जिले के ‘चवक्कड़’ गाँव की रहने वाली के.सी. रेखा (KC Rekha) की सबसे ख़ास बात यह है कि वह भारत की पहली ऐसी महिला मछुआरन बन चुकी हैं जिनके पास सरकार द्वारा समुद्र में उतर कर मछली पकड़ने का लाइसेंस प्राप्त है। आपको बता दें तो केरल की रहने वाली के.सी रेखा से पहले किसी भी महिला को भारत के अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर समुंदर में उतरकर मछली पकड़ने का लाइसेंस प्राप्त नहीं था।

द सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट’ के द्वारा सम्मानित की गईं

केरल में रहने वाले के.सी. रेखा का परिवार भी इस व्यवसाय में काफ़ी पहले से जुड़ा है लेकिन उन्होंने कभी इस प्रकार से समुद्र में उतरने का प्रयास नहीं किया था। वही आज 45 वर्षीय रेखा कोई छोटी मोटी नदियों या तालाबों में नहीं बल्कि अरब सागर में मछली पकड़ने का काम कर रही है। उनके इस बुलंद हौसले के लिए केरल के स्टेट फिशरीज डिपार्टमेंट ने रेखा को ‘डीप शी फिशिंग लाइसेंस दिया है और इस लाइसेंस के मिलने के बाद प्रिमियर मरीन रिसर्च एजेंसी ‘द सेंट्रल मरीन फिशरीज़ रिसर्च इंस्टीट्यूट‘ के द्वारा रेखा को सम्मानित भी किया गया।

इस काम करने के पीछे का कारण है साल 2004 में आई हुई सुनामी

के.सी. रेखा के इस काम करने के पीछे का कारण है साल 2004 में आई हुई सुनामी। दरअसल उससे पहले रेखा चवक्कड़ में अपने पति पी. कार्तिकेयन और अपने बेटियों के साथ बहुत ख़ुशी के साथ अपनी ज़िन्दगी जी रही थी और उनके पति मछुआरे का काम करते थे। जब 2004 में सुनामी आई, जिससे समुद्र की स्थिति काफ़ी बिगड़ गई और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति काफ़ी खराब होने लगी। इसके बावजूद भी उनके पति मछुआरे के काम को करने की कोशिश करते रहे। लेकिन लगभग 10 साल पहले उनके पति पी. कार्तिकेयन के दोनों साथी जो उनके साथ मछुआरे का काम करते थे, अपनी आर्थिक स्थिति और समुद्र के विकराल रूप के कारण काम छोड़ कर चले गए।

अपने दोनों साथियों के जाने के बाद पी. कार्तिकेयन के लिए अकेले समुद्र में नाव लेकर जाना और जाल फैलाकर मछली को पकड़ना संभव नहीं था। ऐसे में उन्हें मज़दूर की या दूसरे लोगों की आवश्यकता थी। लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी जिससे वह किसी दूसरे को पैसे देकर नहीं रख सकते थे। तब रेखा ने अपने घर की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए अपने पति का साथ देने का फ़ैसला लिया और परिवार के लिए अपनी ज़िन्दगी को दांव पर लगाकर पहली बार समुद्र की गहराइयों में अपना क़दम रखा।

बेटियों की पढ़ाई के लिए इस काम में उतरना पड़ा

रेखा (KC Rekha) ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि “परिवार की आर्थिक स्थिति के कारण उनकी दोनों बेटियों की पढ़ाई बहुत ज़्यादा बाधित हो रही थी। इसलिए उन्हें इस काम में उतरना पड़ा। उन्होंने कहा कि समुद्र के अंदर जाना मेरी पहली कोशिश थी लेकिन मैं इससे डरी नहीं बल्कि डटकर इसका सामना किया। अगर डर जाती तो मेरा पूरा परिवार बिखर जाता। उन्होंने यह भी कहा कि समुद्र के लहरों का तट तक आना जाना उतना खतरनाक नहीं होता जितना कि समुद्र के भीतर जाकर उसे महसूस करना होता है।”

नाव लेकर जाने से पहले ‘कदल्लमा’ देवी की करती हैं पूजा

रेखा ने बताया कि सभी मछुआरों के परिवार में ‘कदल्लमा’ देवी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। ‘कदल्लमा’ देवी जो नदी की देवी मानी जाती हैं। रेखा पहले भी कदल्लमा देवी की पूजा करती थी और आज भी हर रोज़ नाव लेकर जाने से पहले वह उनकी पूजा करती हैं और उनसे आशीर्वाद लेती हैं। उसके बाद ही वह नाव लेकर समुद्र में उतरती है।

पति ने कहा कि मुझे अपनी पत्नी पर बहुत गर्व है

रेखा ने कहा कि जितनी आसानी से लोग महंगे-महंगे रेस्टोरेंट में जाकर मछली से बने व्यंजनों को बड़े चाव से खाते हैं, उतना ही मुश्किल होता है समुद्र के अंदर जाकर मछली को पकड़ना। रेखा को यह सब कुछ उनके पति ने सिखाया है। इस काम को करने में वह काफ़ी थक भी जाती थी, लेकिन फिर भी उनके पति उन्हें हौसला देते। रेखा के पति पी. कार्तिकेयन ने कहा कि “मुझे अपनी पत्नी पर बहुत गर्व है, जो आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन चुकी है। उसने बिना डरे मेरा पूरा सहयोग किया। अगर वह उस समय मेरे साथ नहीं देती तो आज मेरा पूरा परिवार बिखर चुका होता।”

मछुआरन बनने के लिए आपको बहुत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है

रेखा (KC Rekha) ने कहा कि मुझे इस बात की बहुत ख़ुशी है कि सरकार ने मेरी मेहनत को देखा और उसका फल भी मुझे लाइसेंस के रूप में मिला। एक लाइसेंस धारी मछुआरा या मछुआरन बनने के लिए आपको बहुत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, इसके लिए आपके पास बहुत सारी जानकारियों का होना आवश्यक है। जैसे समुंद्र में मछली पकड़ने के लिए जाने से पहले मछुआरों को मौसम की जानकारी, समुद्री रास्तों की जानकारी और विशेष रूप से देश की समुद्री सीमा की जानकारी होनी ज़रूरी है।

इसके अलावा भी आपके पास मछली की प्रजातियों की जानकारी और सामान्य से लेकर विकट परिस्थितियों में भी समुंद्र में नाव चलाने का अनुभव होना चाहिए, ताकि आप अचानक तूफान आने पर या फिर लहरों की असमानता होने पर सुरक्षित तट तक पहुँच सके। इसके साथ ही और भी कई बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। अगर आपके पास इन सारी चीजों का ज्ञान है तभी सरकारी अधिकारी आपको समुद्र में उतर कर मछली पकड़ने का लाइसेंस दे सकते हैं।

इन सारी बातों से आप अनुमान लगा सकते हैं कि रेखा (KC Rekha) को कितनी परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ा होगा तब जाकर आज उन्हें सरकार द्वारा लाइसेंस प्रदान किया गया है। इस तरह काफ़ी कठिन परिश्रम के बाद ही आज रेखा भारत की पहली लाइसेंस धारी मछुआरन बन सकी हैं। उनके सफ़र में उनके पति का पूरा सहयोग रहा है।

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