नेहरू की स्याह हकीकत – लम्हों ने खता की और शदियों ने सजा पायी-

नेहरू से सम्बंधित रिकार्ड और इतिहास को सत्यतापूर्वक पेश करना आवश्यक है, ताकि स्वर्गीय प्रधानमंत्री का पछ्पन वर्ष बाद सम्यक पुनर्मूल्यांकन संभव हो सके।

नेहरू निर्मम थे। हालांकि भ्रमित वामपंथी उन्हें क्षमाशील मानते रहे। मसलन नेहरू ने राष्ट्रपति डॉ• राजेन्द्र प्रसाद का ऐतिहासिक भाषण मीडिया में प्रकाशन से रुकवा दिया था। बल्कि उसकी प्रतियाँ भी जलवा दीं। बात है 1961 के शरद काल की। दिल्ली के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ लॉ (उच्चतम न्यायालय के सामने) में “राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के अधिकार” पर डॉ• राजेन्द्र प्रसाद का लिखित भाषण वितरित होना था।

नेहरू ने कहा कि “यह विवादास्पद भाषण है।” नेहरू ने उसे मीडिया में प्रसारित होने से रोक दिया| (पृष्ठ 338, न्यू आइडियाज, “इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड ऑफ्टर,” दुर्गा दास 1969, कालिन्स प्रेस)। दुर्गादास हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे। यह सर्वविदित है कि राजेन्द्र प्रसाद के शव-दाह पर नेहरू पटना नहीं गये थे। राष्ट्रपति डॉ• राधाकृष्णन को भी रोकने का प्रयास किया था।

परिवारवाद की नींव :

तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष उच्छरंगराय धेबर के स्थान पर पुत्री इंदिरा गांधी के नामित होने के पूर्व एक महत्वपूर्ण घटना हुई थी। इंदौर के लक्ष्मीनाथ नगर में 5 जनवरी 1957 को हुए कांग्रेस प्रतिनिधियों की बैठक में केन्द्रीय रक्षा उत्पाद मंत्री महावीर त्यागी (देहरादून सांसद) और पार्टी मुखिया धेबर में तीव्र वाद-विवाद हुआ था। त्यागीजी ने कहा था कि आगामी (द्वितीय) लोकसभा निर्वाचन में नेहरू की निजी लोकप्रियता के कारण कांग्रेस विजयी होगी। धेबर ने जवाब दिया कि कांग्रेस की जड़ें काफी गहरी हैं। पार्टी अपने बूते जीतेगी।” (दैनिक हिन्दू : 6 जनवरी 1957)।

बेटी ही रही मन में :

स्वर्गीय वामपंथी संपादक कुलदीप नायर जो गृहमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के सूचना अधिकारी थे, ने लिखा (19 मार्च 2011) कि शास्त्री जी ने यह उन्हें बताया था कि “पंडित जी के दिल में बस उनकी पुत्री ही है।” नायर का प्रश्न था कि नेहरू के बाद प्रधानमंत्री क्या शास्त्रीजी बनेंगे?

कोरी धमकी :

नेहरू कई बार पद त्याग देने की धमकी देते रहे। हालांकि 1946 से 1964 (27 मई) तक उन्होंने प्रधानमन्त्री पद नहीं त्यागा, सिर्फ देह त्यागा। जबलपुर के सांसद सेठ गोविन्द दास द्वारा गोवध पर पूरी बंदी के प्रस्ताव पर नेहरू ने कहा था कि, “मेरी सरकार यह प्रस्ताव पारित होने पर इस्तीफ़ा दे देगी।” (29 अप्रेल 1958 : लोकसभा)। मगर नेहरू के इसी तरह कुछ वर्षों पूर्व त्यागपत्र की घोषणा पर उनके काबीना के साथी रफी अहमद किदवई ने कहा भी था, “पंडित जी आप आराम फरमाइये। मैं संभाल लूँगा।” उनकी पुत्री इंदिरा गांधी ने भी नेहरू को लिखा था, “प्रिय पप्पू, अन्य लोगों को एहसास होने दीजिये कि आपके हटने से क्या होगा।” (संपादक इन्दर मल्होत्रा, इंडियन एक्सप्रेस: 13 नवम्बर 2009)

विदेशी मूल अस्वीकार्य :

नेहरू भी विदेशी मूल के व्यक्ति को भारत में शासक बनाने के पक्ष में नहीं थे। इंदौर के महाराजा यशवंतराव होलकर की विदेशी मूल की पत्नी से जन्में रिचर्ड को इंदौर की राजगद्दी का उत्तराधिकारी बनाने की मान्यता देने से नेहरू सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। रिचर्ड और राहुल में क्या विषमता है? राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद तथा उपप्रधानमंत्री वल्लभभाई पटेल की भी नेहरू जैसी राय थी।

अकेले पड़ गये थे :

नेहरू के पक्ष में राष्ट्रीय अध्यक्ष पद हेतु किसी भी प्रदेश कांग्रेस समिति ने (1946 में) कोई नामांकन नहीं दायर किया था। सरदार पटेल के पक्ष में बहुमत था पर उन्होंने गांधी जी के कहने पर अपना नाम नेहरू के पक्ष में वापस ले लिया। कारण था कि बापू को आशंका थी कि सोशलिस्टों के साथ मिलकर नेहरू कांग्रेस पार्टी को तोड़ देंगे। (दि ट्रिब्यून, 14 नवम्बर 2001: वी• एन• दत्त)| ऐसा ही कदम इंदिरा गांधी 1967 में, फिर दो बार आगे भी, उठा चुकी थीं।

कश्मीर समस्या के सूत्रधार :

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और ब्रिटिश प्रधानमंत्री के अपने तार में नेहरू ने लिखा था, “कश्मीर के भारत संघ में शामिल होने के बावजूद उसके विलय का प्रश्न कश्मीर की जनता ही तय करेगी।” (तार सं• 402, प्रधानमन्त्री-227, 27 अक्टूबर 1947)। इसी बात को संसद में, पत्राचार में, प्रेस सम्मेलनों में नेहरू ने ग्यारह बार दुहराया था। इस वायदे को रक्षा मंत्री वी• के• कृष्ण मेनन ने 24 जनवरी 1957 को सुरक्षा परिषद् की 765वीं बैठक में पुनः कहा था। जनमत संग्रह का वादा नेहरू ने न तो संसद से पूछकर और न काबीना की राय से किया था। निखालिस निजी निर्णय था। अलबत्ता वायसराय माउन्टबेटन का आग्रह अवश्य था।

ब्रिटेन पसंद था :

सोशलिस्ट सांसद मधु लिमये के अनुसार नेहरू प्रारंभ में “भारत छोडो” 8 अगस्त 1942 के प्रस्ताव के समर्थन में नहीं थे। “दरअसल नेहरू उन दिनों चक्रवर्ती राजगोपालचारी के निकट थे जो भारत छोड़ो आन्दोलन के विरुद्ध थे।” (आत्मकथा, प्रथम खंड) स्वर्गीय लिमये के अनुसार आजादी की लड़ाई के दौरान विश्वयुद्ध छिड़ने पर एक वक्त ऐसा भी आया था जब पंडित नेहरू ने जापानी सेना के विरुद्ध छापामार युद्ध करने की घोषणा की। आवेश मैं उन्होंने यहां तक कह दिया कि “यदि सुभाष बोस जापानी सेना की सहायता से भारत में आयेंगे तो उनके विरोध में शस्त्र उठाने से भी नहीं हिचकूंगा।” (यूनी-वार्ता 27 सितम्बर 1998, दैनिक जनमोर्चा)

चुनावी दांव :

पुर्तगाली उपनिवेश गोवा को भारतीय सेना द्वारा मुक्त कराने का नेहरू शुरू से विरोध करते रहे। प्रधानमन्त्री ने गोवा विमोचन समिति के सत्याग्रहियों को चेतावनी दी थी कि प्रस्तावित (2 अक्टूबर 1955) स्वाधीनता संघर्ष को बम्बई सरकार नहीं चलने देगी। (दि हिन्दू : 29 सितम्बर 1955)। हालांकि इसी नीति को निरस्त कर नवम्बर 1961 में नेहरू ने सेना भेजकर गोवा मुक्त कराया। उनके रक्षा मंत्री वी• के• कृष्ण मेनन तब मुम्बई (उत्तर) में निर्दलीय प्रत्याशी और महान गाँधीवादी आचार्य जे• बी• कृपलानी से तीसरी लोकसभा (फ़रवरी 1962) में पराजय का सामना कर रहे थे। सेना के मार्च से विजय पाकर लहर में रक्षा मंत्री वोट पा गये।

चीन से धोखा:

चीनी आक्रमण (अक्टूबर 1962) के कुछ ही दिनों पूर्व वाईडी गुन्डेविया तथा राजेश्वर दयाल, विदेश सचिव, को सरकार द्वारा बताया गया था कि आक्रमण पाकिस्तान की ओर से आशंकित है। चीन से कोई भी खतरा नहीं है। (के• शंकर वाजपेयी, चीन, पाकिस्तान तथा अमरीका में भारत के राजदूत रहे: इन्डियन एक्सप्रेस 20 नवम्बर 2010)

अजीब नेता :

चीन से पराजय के बाद नेहरू ने सेना कमांडर जनरल एस• पी• पी• थोरट से कारण पूछे। जनरल थोरट ने उस भेंट के दयनीय दृश्य का वर्णन किया, “कैंची से नेहरू सिगरेट के टुकड़े काटकर फेंक रहे थे| ग़मगीन थे।” (दैनिक स्टेट्समैन, कलकत्ता, 16 फ़रवरी 1998)|

चीन से यारी :

किनेमन और मात्सु द्वीप समूह को चीनी (ताइपे) राष्ट्रवादी गणराज्य के जनरल चियांग काई शेक ने सैनिक सुरक्षा केंद्र बनाया था। माओवादी चीन इन्हें कब्जियाना चाहता था। मगर अमरीकी हमले के डर से शान्त रहा। नेहरू ने इन द्वीप समूह को माओवादी चीन को दे देने की माँग की थी। (1 अप्रेल 1955, दि हिन्दू दैनिक) पुराने  राजनीतिज्ञ मानते हैं कि भारत को  वीटो मिलने वाली थी पर नेहरू ने वह चीन को दिला दी  

राजीव का नाम :

राजीव गांधी जो पारसी राजनेता फिरोज जहाँगीर फरीदून घांडी के ज्येष्ठ पुत्र थे, का नाम नेहरू ने “बिरजीस” सुझाया था। अहमदनगर किला जेल से 16 सितम्बर 1944 में पुत्री इंदिरा गांधी को नेहरू ने यह लिखा। सहकैदी मौलाना अबुल कलाम आजाद और आसिफ अली ने यह राय दी थी। (राजीव के सखा मणिशंकर अय्यर : “राजीव स्मृतियाँ”)| पारसी शब्द बिरजीस बृहस्पति का पर्याय है।

 

मुस्लिम महिला सुधार :

ब्रिटिश पत्रकार ताया जिन्किस से नेहरू ने कहा कि उन्हें संतोष है कि वे हिन्दू महिला की कानूनी दशा सुधार सके। पर मलाल रहा कि मुस्लिम महिलाओं की स्थिति सुधार नहीं सके। (इंडियन एक्सप्रेस: इन्दर मल्होत्रा, इंडियन एक्सप्रेस, 25 अप्रेल 2011)

ज्योतिष पर विरोधाभास :

नेहरू ज्योतिष शास्त्र के कट्टर विरोधी बाहर से दीखते थे। जब उनका प्रथम नवासा पैदा हुआ था तो अहमदनगर जेल से नेहरू ने इंदिरा गांधी को लिखा था कि “काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ज्योतिष विभागाध्यक्ष से कुंडली बनवा लेना।” इस पत्र को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बाबू सम्पूर्णानन्द ने जगजाहिर किया था। कारण था कि प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री की आलोचना में टिप्पणी की थी कि, “लोगों को सितारों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।” नैनीताल में राज्य शासन ने 1955 में वेधशाला स्थापित की थी। चित्रकूट में “कश्मीरी बही” संजोकर रखने वाले ज्योतिषी पं• सुरेन्द्र तिवारी (हिन्दुस्तान टाइम्स, लखनऊ 20 जनवरी 2005) ने राहुल गांधी को (18 जनवरी 2008) को बताया था कि उनके पिता राजीव गांधी, दादी इंदिरा गांधी, पं• जवाहरलाल नेहरू आदि उनके यहाँ आ चुके हैं।” पहली बार 12 अक्टूबर 1912 में रतनलाल नेहरू अपने पुत्र मोहनलाल नेहरू के साथ आये थे। मोतीलाल नेहरू के अग्रज वंशीधर नेहरू भी ज्योतिषी थे। राहुल ने पं• तिवारी के पास फिर आने का वादा किया था। अपने काबीना मंत्री तथा भारत साधु समाज के संस्थापक गुलजारीलाल नंदा के द्वारा नेहरू ज्योतिषी हवेली राम से पूछताछ करते रहते थे। उनके पास अरुण संहिता थी।

तुष्टिकरण :

नेहरू ने ही मुस्लिम तुष्टिकरण पनपाया जब हज पर मक्का जाने हेतु सरकारी अनुदान नेहरू सरकार ने देना शुरू किया था। अंडमान द्वीप जानेवाले जहाजों को मक्का के लिये आरक्षित कर अरब की ओर मोड़ दिया गया था। इसमें तमिलनाडु से पोर्टब्लेयर के यात्रियों को अपार असुविधा हुई थी।

भ्रष्टाचार की शुरुआत :

दैनिक नेशनल हेरल्ड के मामले में सोनिया और राहुल आज जमानत पर हैं। “हेरल्ड” के नाम पर धनशोधन नेहरू ने शुरू किया था। नेपाल के महाराजा से पेशगी ली थी और एवज में हिमालयन एयरवेस का ठेका काठमांडू के इन शासकों को दिया था। मुम्बई के उद्योगपति बाबूभाई मणिकलाल चिनाय से बड़ी धनराशि ली और उन्हें दो बार राज्य सभा का सदस्य बनवाया। (जनसत्ता, 21 अक्टूबर 2009 : मस्तराम कपूर)|

 

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की करायी थी ताउम्र जासूसी-

नेताजी की कई फाइलें खुलने पर और छानबीन से यह निकल के आया कि नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की सपरिवार गुपचुप जासूसी करायी थी।

IB हेडक्वार्टर में फोन करते थे जासूस- 

 

इंटरसेप्टिंग और बोस परिवार की चिट्ठियों पर नजर रखने के अलावा, आईबी के जासूसों ने उनकी स्थानीय और विदेश यात्रा की भी जासूसी की. ऐसा लगता है कि एजेंसी यह जानने को आतुर थी कि बोस के रिश्तेदार किससे मिलते हैं और क्या चर्चा करते हैं. हाथ से लिखे गए कुछ संदेशों से पता चला है कि आईबी के एजेंट बोस परिवार की गतिविधियों के बारे में आईबी हेडक्वार्टर, जिसे ‘सिक्योरिटी कंट्रोल’ कहा जाता था, में फोन करते थे.

हालांकि इस जासूसी की वजह पूरी तरह साफ नहीं हो पाई है. आईबी ने नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर कड़ी निगरानी रखी. शरत चंद्र बोस के ये दोनों बेटे नेताजी के करीबी माने जाते थे. नेताजी की पत्नी एमिली शेंकल ऑस्ट्रिया में रहती थीं और शिशिर-अमिय ने उनके नाम कुछ चिट्ठियां भी लिखी थीं. इस खुलासे से बोस परिवार हैरान है. बोस के पड़पोते चंद्रकुमार बोस ने कहा, ‘जासूसी उन लोगों की होती है जिन्होंने कोई अपराध किया हो या जिनके आतंकियों से संबंध हों. सुभाष बाबू और उनके परिवार ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनकी जासूसी क्यों की गई?’

यही कारण था कि आज तक नेताजी के परिवार ने भारत रत्न नहीं स्वीकारा ।

रोक सकते थे भगत सिंह की फांसी पर मौन रहे-

स्वतंत्रता सेनानियों के कथनानुसार इतिहासकार बताते हैं कि  चन्द्रशेखर आजादी गांधी जी के पास गये थे कि वह भगतसिंह को बचाने में हमारा साथ दें व नेहरू अंग्रेज सरकार से बात करें पर नेहरू व गांधी दोनों ने यही कहा कि आप सब क्रांतिकारी अंग्रेजी सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दें जिसे सुन कर चन्द्रशेखर आजादी वहां से दुखी होकर लौट आये थे और भगत सिंह को गुपचुप तरीके से फांसी दे गयी। 

 

महिलाओं का आकर्षण :

अमरीकी राष्ट्रपति की सुन्दर पत्नी जैक्लीन कैनेडी ने 1962 में दिल्ली हवाई अड्डे पर नेहरू से देर तक प्रतीक्षा करायी, क्योंकि वे जहाज में अपना श्रृंगार करने में व्यस्त थीं। पूर्व विदेश सचिव ललित मानसिंह के अनुसार प्रधानमन्त्री का हवाई अड्डे जाना प्रोटोकॉल में नहीं आता था, फिर भी नेहरू इस अमरीकी महिला के स्वागत में गए थे| (14 अगस्त 2007, राष्ट्रीय सहारा)

नेहरू के रूमानी पक्ष की कईयों ने आलोचना की। हालांकि उनके घोर आलोचक डॉ• राममनोहर लोहिया ने नेहरू का पुरजोर बचाव किया। लोहिया का तर्क था, यदि दशक भर से विधुर रहा प्रधानमंत्री किसी महिला मित्र की आगोश में सकून पाता है तो अनुचित क्या है? किन्तु आम धारणा यही रही कि अपनी आकर्षक पत्नी एडविना द्वारा वायसराय माउन्टबेटन ब्रिटेन के लाभानुसार आजाद भारत की नीतियों को प्रभावित करते रहे। इसमें कश्मीर भी था। उनकी पुत्री कैथरीन क्लैमां ने अपनी पुस्तक “एडविना एन्ड नेहरू” में एक घटना का जिक्र किया था। इंग्लैंड लौटने के पूर्व एडविना ने नेहरू से पूछा, “कहाँ मिलोगे?” नेहरू का जवाब था: “यही तो सोचना होगा। हुमायूँ के मकबरे पर? अभी भी वहाँ कुछ पंजाबी शरणार्थियों का डेरा है। अपने सरकारी आवास पर ? सुबह–सुबह फरियादियों का रेला वहीँ रहता है। महात्माजी के चितास्थल (राजघाट) पर ? वहाँ हर समय श्रद्धालुओं की कतारें लगी रहती हैं। कोई एकांत स्थल, जहाँ अलविदा कहा जा सके।” अचानक ही उनके दिमाग में कुछ कौंधा गया। “तुगलकाबाद !” एडविना (45 वर्षीया) का चेहरा पोंछते हुए नेहरू (60 वर्षीय) ने कहा,” सुबह पांच बजे आना, क्योंकि छः बजे से मेरी दिनचर्या शुरू हो जाती है। खंडहरों में दाहिनी तरफ, ऊपर, सीढियां चढ़ते समय बंदरों से सावधान रहना।” आखिरी विसाल-ए-यार था। अंत  में यही कहेगें कि नेहरू का यह श्याह रूप है यानि डार्क साइड जिसे आज पूराा देश भुगत रहा है यह वही बात है कि लम्हों ने खता की और शदियों ने सजा पायी। अंत में खुद से सवाल के करें कि  नेहरू  बच्चों के चाचा या आदर्श कहलाने लायक हैंं? 

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