अन्याय का वायरस-

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के बाद से लेकर अबतक के, अपने कार्यकाल के, भारत के मान. राष्ट्रीय सर्वोच्च न्यायालय कोलेजियम के मुखिया, न्याय देने वाले समस्त कर्मराजरूपी मान. राष्ट्रीय सर्वोच्च मुख्य अनुशासक मर्यादाशाली स्वविवेकवान न्यायाधीषों ने अपने विलासिता के मूल्य उद्देश्य को पूरा करने के लिए व इस वास्ते सभी की जनजीविका व जनजीवन को हड़पने के निजि स्वार्थ में, जान बूझकर अपने अपमान का भय दिखाकर, अपने भारत के शासक प्रधानमंत्रीजी से अपने दुरभि संधि कर, अपने मतदान व आरक्षण का लाभ उठाकर, अपने मीडिया की ओट में छिपकर भारत के मान. कर्मराजरूपी राष्ट्रीय सर्वोच्च मुख्य अनुशासक मर्यादाशाली स्वविवेकवान न्यायाधीषजी होते हुए भी, अपने शासन करने का शौक पूरा किया है और वर्तमान में भी यह अपना शौक पूरा कर रहें हैं।

इसीलिए शदियों से, पीढ़ियों से भारत के समस्त न्यायालयों में मिलाकर करोड़ों मामले विचाराधीन हैं। यदि भारत के समस्त मान. न्यायालय चौबीसों घण्टें निर्वाधरूप से चलाये जाये, तब भी पचासों साल तक ये मामले निपटने वाले नहीं।

इन्होंने अपने कार्यकाल में, अपने कार्यकाल के, भारत के शासक प्रधानमंत्रीजी से, इन मामलों की बाढ़ दिखाकर, इन्हें निपटाने के लिए अपने भारत के न्याय देने वाले अपने अतिरिक्त राष्ट्रीय न्यायाधीषों की कमी की मांग को पूरा करने की तो मांग सदैव की है। परन्तु इन्होंने अपने उक्त निजस्वार्थ में जानबूझकर, स्वयं संज्ञान लेकर अपने विशिष्ट न्याय संगत कर्तव्यपालन के तहत व अपनी विशिष्ट न्याय संगत मांग के द्वारा, अपने समस्त भारतीय नागरिकों के जनजीविका व जनजीवनहित में, समस्त भारतीय नागरिकों को अपना तत्काल, निष्पक्ष, स्वच्छ, सम्पूर्ण व निःशुल्क न्याय दिलाने वाले, उनके व अपने आत्म सम्मानीय धर्मराजरूपी भारतीय सर्वोच्च मुख्य अनुशासक प्रतिभाशाली विद्वान न्यायाधीषसाहब को पाने की मांग कभी भी और अबतक नहीं की है।

क्या यही इनका न्यायहित व जनहित में कर्तव्यपालन है? क्या यह अन्याय नहीं ? क्या इस विलम्ब व नुकसान के जिम्मेदार यह स्वयं नहीं ? क्या इस अन्याय का भयाभय दुष्परिणाम भारत के साथ पूरे विश्व के समक्ष नहीं ?

अतः, अपने भारत के प्रधानमंत्रीजी से, अपने आत्मसम्मानीय इण्डियन चीफ जस्टिस साहब को, इन मान. चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया को तत्काल हासिल करना चाहिए।

जिससे कि समस्त भारतीय नागरिकों को अपने न्याय दिलाने वाले आत्मसम्मानीय धर्मराजरूपी इण्डियन चीफ जस्टिस साहब व अपने न्याय देने वाले मान. कर्मराजरूपी चीफ जस्टिस ऑफ़ इण्डिया, एकसाथ समान रूप से हासिल हो सकें।

जिससे कि समस्त भारतीय नागरिकों के पहिचान के सभी प्रकार के अभिलेखों में उनके नाम के साथ उनकी आत्म सम्मानीय माता का नाम व उनके मान. पिता का नाम, एकसाथ समानरूप से दर्ज हासिल हो सके।

    जिससे कि इन अभिलेखों को देखकर कोई यह न कह सके कि अंधे का पुत्र अंधा होता है तथा वैश्या किसी की पत्नी व माता नहीं होती। 

     जिससे कि अपने इन आई.डी. प्रूफ के द्वारा समस्त भारतीय नागरिकों के शदियों से व पीढ़ियों से भारत के समस्त न्यायालयों में विचाराधीन करोड़ों मामले, एकसाथ समान रूप से तत्काल, निष्पक्ष, स्वच्छ, सम्पूर्ण व निःशुल्क निपटाये जा सकें। जिससे कि समस्त भारतीय नागरिकों को अपना तत्काल, निष्पक्ष, स्वच्छ, सम्पूर्ण व निःशुल्क न्याय हासिल हो सके।

विश्वशांति व मानवता संचालित हो सके तथा अन्याय का वायरस उन्मूलित हो सके।

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