कोरोना के साथ जल की लड़ाई –

जिस गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने की कसमें हमारे हुक्मरान आएं दिन खाते हैं। दुर्भाग्य देखिए वह श्मशान घाट में तब्दील हो चुकी है। कोरोना काल से पहले व्यक्ति के मृत्यु के बाद अस्थि की राख गंगा में प्रवाहित करने की हमारी परंपरा थी, लेकिन शासन-प्रशासन की नाकामी देखिए कि कोरोना काल में गंगा मैया के आंचल को ही श्मशान में तब्दील कर दिया गया है। माँ के आंचल से सिर ढ़ककर लेटने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन अब तो माँ गंगा को ही श्मशान में तब्दील करके उनकी पवित्रता को  ठेस पहुंचाई जा रही है। ऐसे में एक प्रश्न तो यही क्या गंगा को श्मशान में तब्दील करके स्वच्छ बनाया जाएगा? देश में वैसे भी स्वच्छ जल की काफ़ी कमी है। ऊपर से गंगा जैसी पवित्र कहलाने वाली नदियों की अनदेखी और अब कोरोना काल मे श्मशान में तब्दील होता उनका किनारा कई सवाल खड़ें करता है, लेकिन उनका जवाब कौन देगा? इसका पता नहीं।
कोरोना महामारी भले कितनी भी विकराल क्यों न हो, लेकिन यह तो स्पष्ट है इस धरा क्या हमारे देश से भी मानव जीवन का अस्तित्व तो मिटने से रहा। ऐसे में जल तो जीवन का आधार है। फ़िर उसकी बर्बादी किसलिए? पानी की ज़रूरत कोरोना महामारी से पहले भी थी, आज भी है और बाद में भी होगी। फ़िर उसके स्रोतों को सहेजने की सार्थक कोशिश क्यों नहीं दिखती? रामायण में कहा गया है कि क्षिति, जल, पावक, गगन समीरा, पंच तत्व का बना शरीर… इस चौपाई का अर्थ है हमारा शरीर पंचतत्व से मिलकर बना है। इसमे सबसे महत्वपूर्ण जल ही है। जल के बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। लेकिन हमारा दुर्भाग्य देखिए कि जो जल हमारे जीवन के लिए सबसे उपयोगी है आज हम उस जल को ठीक से सहेज नही पा रहें है। यूं तो समूचा विश्व ही जल संकट के भयाभय दौर से गुजर रहा है। भारत में भी ऐसे कई राज्य है जो गहरे जल संकट के दौर से गुजर रहे हैं। आये दिन जल संकट की तस्वीरें मीडिया जगत की सुर्खियां बन रही है। फिर भी हम जल संरक्षण के प्रति कोई कारगर उपाय आज़तक नही कर पाए है। नीति आयोग की रिपोर्ट की माने तो भारत में 60 करोड़ लोग जल की कमी झेल रहे है। देश में 70 प्रतिशत जल दूषित है। यही वजह है कि पानी गुणवत्ता सूचकांक में भारत 122 देशों की सूची में 120 वें स्थान पर पहुंच गया है।
    यह जल संकट की भयावह तस्वीर हमें आईना दिखाने के लिए काफी है। वर्तमान समय में हम जिस ढंग से जल को दूषित कर रहे है निश्चय ही अपने वर्तमान और भविष्य के विनाशक हम स्वयं बन रहे है। देश के जल स्त्रोत प्रदूषण की भेंट चढ़ रहे है। देश मे 86 प्रतिशत जल स्त्रोत, सीवेज प्लांट से भी ज्यादा प्रदूषित है। पृथ्वी पर ताजे पानी का स्त्रोत भी 1 प्रतिशत के निम्नतम स्तर पर पहुंच गया है। आज हम इतने स्वार्थी हो गए है कि हमें भविष्य की कोई चिंता नही रही है। देश का भूजल स्तर लगातार गिरता जा रहा है। देश की एक अरब आबादी ऐसे स्थानों पर निवास करती है जहां पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं रहता है। 60 करोड़ लोग न्यूनतम पानी मे गुजारा करने को मजबूर है। इन सबके बावजूद हम कोरोना जैसे कठिन दौर में भी नदियों की आत्मा को प्रदूषित ही कर रहें हैं। फ़िर वह चाहें नदी को श्मशान के रूप में तब्दील करने की बात हो या अन्य।
 कबीर दास जी ने कहा था कि रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। पानी गए न उबरे, मोती, मानस, चून।।लेकिन वर्तमान समय मे इसका उल्टा होते दिखाई दे रहा है। पृथ्वी पर समस्त भू भाग के दो तिहाई भाग में जल है। लेकिन वही पीने के पानी की बात करे तो मात्र तीन प्रतिशत ही जल पीने लायक रह गया है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में धरती को माँ का दर्जा दिया गया है। इस धरा में मौजूद संसाधन सभी प्राणियों को समान रूप से मिले है। प्रकृति में उपलब्ध संसाधन जल, नदी, पहाड़, खनिज सम्पदा और वन पर सभी का समान अधिकार है।
बिना किसी संवैधानिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के हम इन संसाधनों का उपयोग करके अपना विकास तो कर सकते है पर चाहे भी तो इन प्रकृति प्रदत बहुमूल्य संपदाओं में वृद्धि नहीं कर सकते है। फिर क्यों हम इनका संरक्षण नही कर पाते है। आज ब्लू प्लेनेट मानवीय लालसा और लापरवाही के कारण विनाश की कगार पर खड़ा है। वहीं सरकारी तंत्र की लापरवाही और संवेदनहीनता इस दर्द को औऱ बढ़ा रहा है। जिसे तत्काल प्रभाव से कम करने की आवश्यकता है। वरना हम आज कोरोना से लड़ रहें, कल हमारी आने वाली पीढ़ी पानी के लिए लड़ेंगी!

_सोनम लववंशी

स्वतंत्र लेखिका एवं टिप्पणीकार
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