नवरात्री के नौवें दिन पूजी गयी मॉ सिद्धिदात्री

चन्दौली से जितेन्द्र मिश्र की  रिपोर्ट

नवरात्री के अंतिम दिन अर्थात नवमी तिथि को माता सिद्धिदात्री देवी के पूजन का विधान वेदों व देवी पुराण में निहित है। माता सिद्धिदात्री सभी प्रकार की सिद्धियां प्रदान करने वाली है और अपने भक्तां पर सदा प्रसन्न रहा करती है। माता का ध्यान इस मंनत्रोचार के साथ जाता है। ‘‘सिद्धगनं्र् ध्वयक्षायैरसुरैरमरैरपि, सेव्यामान सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।’’ मॉ दुर्गा की नवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लधिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व ये आठ शक्तियां होती हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्रीकृष्ण जन्म खण्ड में इसकी संख्या अठ्ठारह बताई गयी है। मॉ सिद्धिदात्री भक्तों और साधकों को ये सभी अठ्ठारहां सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव ने इनकी कृपा से इन सभी सिद्धियों को प्राप्त किया है। इनकी कृपा से ही भगवान शिव का आधा शरीर देवी का हुआ था। जिन्हे अर्द्धनारीश्वर कहा जाता हैं। मॉ सिद्धिदात्री चार भुजाओ वाली है, इनका वाहन सिंह है, ये कमल पुष्प पर भी आसीन होती है। इनकी दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में चक्र, उपर वाले हाथ में गदा तथा वायी तरफ के नीचे वाले हाथ में शंख और उपर वाले हाथ में कमल व पुष्प सुशोभित होते है। इन सिद्धिदात्री मॉ को उपासना कर लेने के बाद भक्तों और साधको की लौकिक- परलौलिक सभी प्रकार की कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। माता की कृपा से कृपा पात्र भक्त या साधक के भीतर कोई ऐसी कामना शेष नही बचती जिसे व पूर्ण करना चाहता हो । मॉ सिद्धिदात्री को सत् सत् नमन

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