कविता : उत्कर्ष हमारा नववर्ष ✍️लेखक गोपाल कौशल



हे ! नव संवत् तुम्हारा कोटि अभिनंदन

ब्राह्मा जी  ने  किया  चैत्र  में सृष्टि सृजन ।

वर्ष प्रतिपदा का दिन ,चैत्र का महिना 

अयोध्या के राम बने राजा दशरथ नंदन ।।




हे ! नव संवत्  क्या करुं मैं गुणगान 

होय पहले ही दिन शक्ति का आह्वान ।

गुडी पडवा पर चहुंओर विजय ध्वज फहरें 

लिए नव उमंग -ऊर्जा ,नव पल्लव - धान ।।




हे ! नव संवत् तुम -सा नही कोई दूजा

इसी दिन विक्रम संवत् चहुंओर गूंजा ।

मंदिर-मंदिर आरती होय दीप जले अखंड 

माँ दुर्गा,गणगौर माता की घर-घर होय पूजा ।।




हे ! नव संवत् का अभिनंदन फूल-पलास

पेडों की कोंपल चली,नव पल्लव की आस ।

आमों की बगिया फली कोयल करें पुकार 

भौंरा फूलन रस पिये मस्ती भरा चैत्र मास ।।




हे ! नव संवत्  दो जन -जन को बुध्दि 

परहीत के भावों की हो अनंत वृद्धि ।

मंगलमय हो घर - आंगन , भूमंडल

हो भारत की यश -कीर्ति में अभिवृद्वि ।।




   ✍ गोपाल कौशल
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