कविता : लेखक ✍️प्रवीण माटी

समझ नहीं आती - 

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लोगों की दोमुही बातें समझ नहीं आती

काफिर है "प्रवीण"
फरेबी मुलाकातें समझ नहीं आती




बैठा हूँ जिनके पास 
उनके इरादे समझ नहीं आते

शतरंज के माहिर हैं लोग 
मुझे पयादे समझ नहीं आते




प्यार मुनकिन नहीं आज तो 
हसरत समझ नहीं आती

दुश्मन सुना आज है 
अब ये नफरत समझ नहीं आती




अभिनय करते सब 
मुझे मेरा किरदार समझ नहीं आता

करने लगूँ नफरत तो 
फिर प्यार समझ नहीं आता




बड़ी-बड़ी गाड़ियों में चलते लोग 
समझ नहीं आते

कोई तरसे रोटी को 
उनके 56 भोग समझ नहीं आते




फुटपाथ पर मुस्कुराते चंद ख्वाब 
समझ नहीं आते

कागज़ पर लिखे झूठे जवाब 
समझ नहीं आते




चमचे देखकर शहर में 
हुजूर समझ नहीं आता

मुठ्ठी भर राख होना है फिर 
ये गुरूर समझ नहीं आता




अँधेरा घना हो तो 
फिर चाँदनी रात समझ नहीं आती

पैसों में बिकता सब है 
तो कोई बात समझ नहीं आती




किसने बनाया 
ये विचित्र संसार समझ नहीं आता

पाखंड के समाज में 
दो लब्ज प्यार समझ नहीं आता




इंतजार करती गीली आँखें 
ये आस समझ नहीं आती

सूखे लब देख रेगिस्तान में 
ये प्यास समझ नहीं आती




हिफाजत करे कौन? 
कोई पहरेदार समझ नहीं आता

देह बेच कर पोषण !!! 
ये कारोबार समझ नहीं आता




खाली हाथ गया 
विश्वविजेता सिकंदर समझ नहीं आता

कितने राज छुपाये बैठा 
ये समंदर समझ नहीं आता




पत्थर के मकानों में बैठा 
भगवान समझ नहीं आता

खाली पेट  बचपन तो 
फिर इंसान समझ नहीं आता




लोगों की दोमुही बातें 
समझ नहीं आती

काफिर है "प्रवीण"फरेबी 
मुलाकातें समझ नहीं आती




-प्रवीण माटी
- गांव नौरंगाबाद

जिला -भिवानी

तहसील-भिवानी
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